करण खेड़ा मंदिर जालौन – करण खेड़ा का इतिहास व दर्शनीय स्थल

करण खेड़ा वर्तमान में जालौन जिले में नवगठित माधौगढ़ तहसील के ग्राम जगम्मनपुर के उत्तर पूर्व में लगभग 3 किलोमीटर दूर में स्थित है इस करण खेड़ा के उत्तर में लगभग 2 किलोमीटर दूर यमुना की कल कल करती जल धारा बहती है। यह स्थान श्री श्री 1008 बजरंगदास महाराज के स्थान के लिए जाना जाता है। करण खेडा का इतिहास देखने से पता चलता है कि इस क्षेत्र के राजा को राजा कर्ण के नाम से जाना जाता था। यह करण खेड़ा उरई से पश्चिम की ओर 67 किलोमीटर दूर स्थित है।

 

 

करण खेड़ा का इतिहास

 

जनश्रुति के अनुसार इस क्षेत्र का राजा कर्ण था जो स्वयं बहुत बड़ा दानी था तथा इसी कारण उसे दानवीर की उपाधि से सम्बोधित किया जाता था तथा उसकी कुल देवी कर्णी देवी थी और शायद इसी कारण इस क्षेत्र का नाम उसके नाम पर करण खेडा पड़ा। यह राजा कर्ण महाभारत के दानी दुन्ती पुत्र कर्ण नहीं थे अपितु सेंगर वंश के थे जिनको चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के समकालीन कहा जाता है। करण खेड़ा में एक बहुत विशाल टीला है जहाँ से यमुना का विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है तथा साथ ही साथ किसी बड़े किले की प्राचीर भी दृष्टिगोचर होती है जो कि उसके अतीत की कहानी कह रही है। राजा कर्ण बहुत बड़े दानी थे और उनके दान की कथायें यहाँ के जन मानष में बहुत लोक प्रिय है लोग उन्हें बड़े गर्व के साथ सुनते और सुनाते हैं।

 

 

ऐसा कहा जाता है कि राजा कर्ण प्रतिवर्ष विन्ध्याचल (मिर्जापुर) जाकर सवा मन स्वर्ण का दान करते थे और इसी कारण उसे दानवीर की उपाधि से विभूषित किया गया था और उसे दानवीर कहा जाता था। प्रतिवर्ष सवा मन स्वर्ण प्राप्त करने हेतु राजा कर्ण अपनी कुल देवी कर्णी की उपासना किया करता था तथा निश्चित तिथि पर अनुष्ठान करके पूजन में अपना स्वयं का शीर्ष कुलदेवी कर्णी को समर्पित कर देता था जिससे कर्णी देवी प्रसन्न होकर उसे जीवन दान देती थी और स्वर्ण भी देती थीं। राजा कर्ण विन्ध्याचल में जाकर इस स्वर्ण का दान किया करता था। राजा कर्ण का वास्तविक नाम राजा सिंह भूमि था तथा वह प्रतिदिन भी स्वर्ण मुद्रायें दान किया करता था। उसके इसी दानी स्वभाव के कारण उसकी तुलना कुन्ती पुत्र कर्ण से करके यहाँ लोग उसे राजा कर्ण कहने लगे।

 

 

ऐसी भी लोकोपत्ति है कि मालव नरेश विक्रमादित्य ने जब राजा सिंहभूमि अर्थात्‌ कर्ण की दान वीरता की बात सुनी तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि दान करने के लिए इतना स्वर्ण राजा सिंह भूमि के पास कहाँ से आता है और इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए राजा विक्रमादित्य ने रामदास का वेश बनाकर राजा कर्ण के यहाँ सेवक का कार्य करके कर्ण के पूजा अनुष्ठान आदि का भेद लेकर देवी कर्णी से स्वर्ण का अक्षय पात्र प्राप्त कर उसे राजा कर्ण को सौंप कर स्वयं वापिस चले आये थे। इस कथा की पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि विक्रमादित्य का समय काल ईसापूर्व 57 था तथा इस स्थान से प्राप्त उत्तरीय श्याम पालिश युक्त मिट्टी के बर्तनों के अवशेषों को भी पुरातत्ववेतागण ईसा से 600 वर्ष पूर्व का मानते हैं छत्रसाल कालीन लाल कवि ने अपने ग्रन्थ छत्र प्रकाश में इस क्षेत्र में महाराज छत्रसाल की विजय यात्रा का उल्लेख करते हुए कोंच तथा कनार की ओर कूच करने का वर्णन किया है।

 

 

करण खेड़ा मंदिर जालौन
करण खेड़ा मंदिर जालौन

 

श्री श्री 1008 बजरंगदास महाराज

 

वर्तमान में इस स्थान पर राजा राजेन्द्र शाह ने श्री श्री 1008 स्वामी महाराज बजरंग दास जी को पूजा हेतु अधिकृत किया है। श्री श्री 1008 बजरंग दास ने बतलाया कि इस स्थान में पहले अन्य कोई रुकने में असमर्थ था क्योंकि इस स्थान में केवल सेंगर वासियों का ही निवास हो सकता है। श्री श्री 1008 महाराज बजरंग दास जी की माता सेंगर एवं पिता तोमर थे। इस कारण से यह यहाँ पर रूके, यह स्थान राम भक्त तुलसीदास जी के समय में शान्त हो गया। इसके पूर्व में यह स्थान काफी विकसित था। यहाँ के प्रचलित लोक गीतों के अनुसार यह तथ्य सामने आया है कि जब रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी यमुना नदी में जलमार्ग से जा रहे थे तब इस करण खेड़ा के स्थान पर आवाज लगाई कि कोई है जो मुझे पानी पिलाये। गोस्वामी तुलसी दास जी की आवाज का कोई प्रति उत्तर न होने से गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस स्थान को खेड़ा हो जायेगा कहा अर्थात्‌ यह स्थान शान्त हो जाये। तबसे ये स्थान शान्त हो गया। अभी महाराज श्री श्री 1008 बजरंग दास जी ने इसे पुनः आबाद किया।गोस्वामी तुलसीदास जी की उपर्युक्त कथा विषयक लोकगीत इस प्रकार है।

 

 

कब तुलसी कहत पुकार जमुन विच, प्यास की त्रास बुझाये देना।
भादीं में जब बाठी धार, तुलसी लई आसनी डार ॥
बैठ गये वे पन्‍थी मार, चले आ रहे माँझी धार ।
फिर मन में सुमिरन राम आधार, ग्रन्थ रचो उनमुक्त द्वार ॥
पढ़े हो जाये बेड़ा पार, कोई जानत होय सुनाय देय ।
मेरी प्यास की त्रास बुझाये देना।

 

इस स्थान के राजा कर्ण सेंगर वंशीय थे और उनका यहां पर किला भी था। इस वंश की कुलदेवी कर्णी थी। उज्जैन में स्थित हरसिद्ध मन्दिर में माँ कर्णी देवी का धड़ आज भी विराजित है। जिसको राजा विक्रमादित्य वरदान स्वरूप ले गये थे और राजा कर्ण ने देवी के चरण पकड़ लिये थे अस्तु यहाँ पर सिर्फ कर्णी देवी के चरण रह गये जिनकी पूजा की जाती है | इस करण खेड़ा टीले पर एक मन्दिर स्थित है एवं इसके पश्चिम में प्राचीन किले के भग्नावशेष है। इस करण खेड़ा के राजा के वंश के विषय में निम्नवत्‌ जानकारी मिलती है।

 

 

वाहन नृप से छटी साखा, भये नृप करन महावार साखा ।
तिन सोलंखी दानव मारो उनहि करनगढ़ जाय संभारो ॥
दर पं सो री सो नो दाना , दिन पति करत रहे परवानता।

अर्थात्‌ वाहन नृप की छठी शाखा में कर्ण नाम के राजा हुए जिन्होंनेसौलंखी दानव को मारकर ‘करनगढ़’ को सम्भाला। एक तथ्य यह भी है कि महराज कर्णदेव ने सन 936 में यमुना के दक्षिण तट पर कर्णावती राजधानी बसाई और कर्ण गढ़ दुर्ग बनवाया। इसी को फिर कनार कहा जाने लगा, यह कनार सूबै कनार यमुना तट का प्रान्त इटावे से लेकर बाँदे तक कहाता था और सूबे राजधानी कालपी थी। सन 1528 ई० में फतेहपुर सीकरी के मैदान पर मेवाड़ के राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूतों ने बादशाह बाबर से भारी लड़ाई ली तब राणा की सहायता में कनार’ से भी फौज गयी थी। बाबर विजयी होकर पहले चन्देरी तथा बाद में कनार पर चढ़ आया और कनार के प्राचीन गढ़ को उड़वा दिया।

 

 

करन खेड़ा मन्दिर एवं उसका स्थापत्य

 

 

इस करण खेड़ा टीले पर एक मन्दिर है जो कि मठिया के आकार में वर्गाकार स्वरूप का है जिसकी प्रत्येक भुजा 15 फीट लम्बी है । यह मन्दिर बड़ा साधारण सा है। इसमें एक गर्भगृह है तथा गर्भगृह के मामने डाट की छत है जिसके ऊपर कलश स्थापित है। इस मन्दिर के विषय में अनुमान है कि यह हैं कि मन्दिर लगभग 13 वीं 14 वीं शताब्दी का होगा। इस मंदिर के अन्दर संगमरमर की सिंह वाहिनी की मूर्ति तथा इस मन्दिर में सिंह वाहिनी की मूर्ति से आगे पहले लाल बालू पत्थर के सिर्फ (चरण) विराज मान है। चरणों के ऊपर का भाग टूटा हुआ है। यहाँ के लोगों की मान्यता है कि यह चरण कर्णी देवी के हैं परन्तु इन चरणों पर कोई भी चिन्ह स्त्री श्रंगार का नहीं है। इन चरणों के अगल-बगल में दो और छोटे -छोटे चरण है। अस्तु ये चरण विष्णु के प्रतीत होते हैं। मन्दिर के ऊपर छत के चारों कानों पर महात्माओं की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित है। यह मठ उत्तराभिमुख है।

 

 

इस मंदिर के बाहर दरवाजे पर एक 20इंच 24 इंच का अंकित पाषाण खण्ड है। इस पाषाण खण्ड पर नग्र मुद्रा में एक पुरूष आकृति अंकित है। जिसके पैरों व हाथों पर लताएं चढ़ी हुई है। इस पुरुष आकृति के केश उध्वाकार जूड़ा के रूप में है। तथा कानों में बड़े बड़ें कुंडल है। जोकि उसके राजघराने के परिचायक है। इस आकृति के दोनों ओर त्रिभंग मुद्रा में एक अप्सरा अंकित है। तथा ऊपर की ओर विद्याधर अंकित है। इसी शिला खण्ड पर एक नतमस्तक मुद्रा में गज भी अंकित है। इस शिलाखण्ड के सम्पूर्ण अंकन को देखने से यह स्पष्ट होता है कि यह अंकन बाहुबली का है जो कि भगवान ऋषभदेव के द्वितीय पुत्र थे। इस अंकित शिलाखण्ड के इस क्षेत्र में होने से यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इस क्षेत्र में जैन प्रभाव था तथा बाहुबली का पूजन अर्चन होता था। यमुना के साथ जैन धर्म का प्रचार प्रसार था इस आशय की पुष्टि होती है।

 

 

किले का वर्णन

करण खेड़ा में एक किला भी है जो कि सम्वत्‌ 1107 में वीरान हो गया था। यह किला यमुना की ऊँची कगार पर दक्षिण पूर्व में बना हुआ था। जिसका क्षेत्रफल काफी विस्तृत था। इसके भग्नावशेष से जो ईंटें प्राप्त हुई है उन ईंटों की नाप के मुताबिक ऐसा लगता है कि यह किला लगभग 9वीं शताब्दी के आसपास आबाद रहा होगा।

 

 

प्राप्त सामग्री के आधार पर करण खेड़ा का मूल्याकन

 

 

इसी करण खेड़ा क्षेत्र में बालू पत्थर का एक सिर भी प्राप्त हुआ है
जो कि त्रिनेत्री भगवान शंकर का है। यह शंकर शीर्ष अद्भुत है। जटा मुकुट धारण किये हुए भगवान शिव का पार्श्वकन है जो कि चक्र कुण्डल पहने हुए है। यह शीर्ष चन्देल कला का घ्योतक है जो कि 12 वीं 13 वी शताब्दी में काफी उन्नत थी। यही पर एक सिंह मुख भी प्राप्त हुआ है जो कि मुख खोले हैं तथा उस पर केशों का विन्यास लगा स्वरूप में अंकित है। यह सिंह मुख बैठी मुद्रा मे है। इस स्थान से उत्तरीय श्याम पालिश युक्त कुछ टुकड़े भी मिले हैं। इन उत्तरीय श्याम पालिश युक्त ठीकरों का चलन 600 वर्ष ईषा पूर्व से 200 वर्ष पूर्व ईसा तक मिलता है तथा गंगा यमुना सोन नदी की घाटी में हरियाणा से उत्तर प्रदेश होते हुए इस प्रकार की एन०वी०सी० पात्रों का चलन उस समय था। इन एन०बी०सी० का करण खेड़ा क्षेत्र में प्राप्त होना इस बात का प्रतीक है कि करण खेड़ा में 600 वर्ष ईषा पूर्व से 200 वर्ष ईसापूर्व के काल की सभ्यता रही होगी। इसके -अलावा इसी क्षेत्र से सहायक बर्तनों के रूप में एक मिट्टी के घड़े का ऊपरी भाग (टूटा हुआ ) भी प्राप्त हुआ है। जिसका मुँह बाहर की ओर निकला हुआ है तथा गर्दन पर दो धारियों अन्दर की ओर धँसी हुई एवं इन दोनों धारियों के नीचे उठे भाग पर कुछ त्रिशंकु के आकार की धँसी डिजाइन है। मिट्टी के पात्रों पर कुछ गड़ाकर डिजाईन बनाने की कला तीसरी चौथी शताब्दी का संकेत देती है। एक और मिट्टी के किसी पात्र का टुकड़ा प्राप्त हुआ है जिस पर खोद कर वृत्ताकार डिजाईन अंकित की गयी है। किसी धारदार वस्तु द्वारा ऊपर से खोदकर बनी हुई डिजाईन को इन साईज्ड डिजाईन कहते हैं।

 

 

इस प्रकार की कला गुप्तकाल में देखने को मिलती है। अस्तु ये मृण पात्र हमें गुप्त काल का संकेत देते हैं। किसी गडुआ अथवा लोटे की एक टोंटी भी प्राप्त हुई है जो कि उस समय की कला एवं जन जीवन की अभि रूचि को प्रदर्शित करती है। हो सकता है कि यह टोंटी दार पात्र किसी पूजन जैसे करवा चौथ आदि में अथवा घी तेल जैसी वस्तु रखने के काम में आता हो। यह 12 वीं 13वीं शताब्दी का संकेत देता है। एक मिट्टी का गोल पहिया भी प्राप्त हुआ है जो कि सम्भवतः किसी खिलौना गाड़ी का होगा। इसी क्षेत्र से एक ताँबे का सिक्का भी प्राप्त हुआ है जो कि मोइज्जुद्दीन जुटी वहरमः शाह का है जिसका कार्यकाल सन्‌ 1240 से 1242 तक था तथा रजिया सुल्ताना (1236से1240) के बाद दिल्ली के तख्त पर बैठा था। इससे यह बात प्रमाणित होती है कि सन्‌ 1240 में इस क्षेत्र पर दिल्‍ली तख्त का प्रभाव था । उपर्युक्त सभी प्राप्त वस्तुयें बुन्देलखण्डसंग्रहालय, भरत चौक , उरई में संग्रहीत है।

 

 

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