कजरी तीज कब मनाते हैं – कजरी के गीत – कजरी का मेला

कजरी तीज पूर्वांचल का सबसे प्रसिद्ध त्यौहार है, कजरी पर्व के अवसर मिर्जापुर और आसपास के जिलों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। कजरी तीज के अवसर पर जगह जगह मेले भरते है।

 

कला जीवन की अनिवार्यता है तो लोककला लोकजीवन की। चौसठ कलाओ में अधिकतर लोककलाए ही है। काव्यकला ललित होने के कारण उत्तम कला है। कजरी लोक-काव्य-कला है। इसमे साहित्य, संगीत और कला तीनो की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। अत कजरी को उत्तम कोटि की कला विधा माने तो कह सकते है कि कजरी लोकजीवन की अनिवार्यता है अथग लोक जीवन कजरी तीज भी अनिवार्यता है। क्योकि प्रत्येक लोककला में जीवन की अभिव्यक्ति होती है और वह सत्य तथा यथार्थ पर आधारित होता है। चूंकि इसका उद्भव और विकास लोक से लोक मे होता है, अत लोक मंगल की शाश्वत कामना इसमें निहित रहती है।

 

कजरी तीज की उत्पत्ति

 

कजरी तीज तो उत्पत्ति ही लोक से हुई है। किवदन्तियो में राजकुमारी का रोचक प्रसग तथा माँ विन्ध्यवासिनी के उपनाम “कज्जला देवी’ से सबंधित कथा का उल्लेख विशेष रूप से होता आ रहा है। कहते है कि यह विशेष गीत छद मा विंध्यवासिनी को प्रसन्‍न करने के लिए किसी मुसलमान शायर द्वारा रचा गया था। कजरी शैली मे रचे गये इस गीत को सुनकर मां ने भक्त शायर को वरदान दिया था कि जो भी इस शैली में गीत रचकर उन्हे सुनायेगा, उसे उनकी भक्ति सहज मे ही प्राप्त हो जायेगी। तभी से हिन्दू हो चाहे मुसलमान, अमीर हो चाहे गरीब, किसी भी जाति-धर्म का क्यो न हो, किसी भी अखाडें का क्यो न हो, जब भी वह किसी अखाड़े मे सम्मिलित होगा, पहला कजरी गीत वह मां विंध्यवासिनी के प्रति ही लिखेगा। वह मां के झरोखे से उनका दर्शन करेगा उन्हे प्रसाद चढाकर बांटेगा और काजल का टीका लगाकर मां को शीश झुकायेगा। इन सभी प्रसंगो में लोकजीवन की ही अभिव्यक्ति मिलती है। कवि श्रीकृष्णताल गुप्त की मां विन्ध्यवासिनी के प्रति रची गयी कजरी की पक्तियां प्रस्तुत हैं–

 

कजरी तीज
कजरी तीज

 

 

कजरी के गीत

 

“हमरे माई के बखरिया, रतन छतरी।
चनन केवरिया कलस देहरी।।
अचरा के छहिया अमिय रस बरसे।
तपर्सी सिवनर्वां अमर फल परसे।
सुरज चनरमा रहेन प्रहरी।
हमरे माई के बखरिया रतन छतरी।।

 

स्नेह, दया, करुणा, प्रेम, सहानुभूति, परोपकार, परहित-रक्षा, सत्य, अहिंसा, सद्भावना, सदाचार, सद्व्यवहार, सहृदयता, यो-ब्राह्मण बाल-स्त्री रक्षा, राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, त्याग बलिदान, जनकल्याण आदि शाश्वत्‌ मानव-मूल्य है। आज के मूल्यो मे अस्पृश्यता निवारण साक्षरता, पर्यावरण, परिवार नियोजन, स्त्री-शिक्षा, परिश्रम, अनुशासन, अधविश्वासों का निवारण, जन-जागरण आदि मुख्य है। कजरी गीतो मे इन तमाम मूल्यो-मान्यताओ की स्थापना का सार्थक, उपयोगी और व्यावहारिक प्रयास कजरी के रचयिताओं द्वारा आरंभ से ही किया जाता रहा है। गोदना भी लोकजीवन की एक अनिवार्यता थी। एक विश्वास के अनुसार गोदना ही अगले जन्म का साथी है, बाकी चीजे तो यही धरी की धरी रह जाती है। मोहनलाल ने कजरी धुन मे राष्ट्रीय भावना का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है-

 

“कर में हमरे गोदनहारिन सुधर गोदनवा गोदो।
नेहरू आनन्द भवनवा गोदो ना।
खिला हो मुखडा कमला नेहरू का।
सुधर रूप रगवा गोदो।
गये हो नेहरू अमेरिका
कनेडी के सगवा गोदी।
घहर-घहर कर लडत वीर हो,
काश्मीर के सीमवा गोदो।।

 

प्रेमधन बदरी नारायण चौधरी, उपाध्याय और भारतेंदु बाबू हरश्चिद्र को साहित्यिक कजलियो का जनक माना जा सकता है। उन दिनों सावन-भादो मे साहित्य के ये दोनो अन्तरग मित्र और
महारथी मिर्जापुर-वाराणसी एक-दूसरे के यहां आते-जाते थे। कजरी की समस्या पूर्तिया होती थी। दरबार लगता था। कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए कजरहवा, पोखरा, त्रिमुहानी, ओझला पुल, पक्काघाट, बजडे पर गंगा की धारा, लोहदी महाबीर, टाडापाल आदि मे मेलो-ठेलो का आयोजन किया जाता था। कजरी लडाई की जाती थी। कजरी में सवाल-जवाब होता था। इन सबका चित्रण कजली गीतो में हुआ है। जैसे-

 

हरि-हरि मिर्जापुर की कजरी लागेै प्यारी रे हरी।।
हर मगल त्रिकोण का मेला, होला अजब रसीलारामा।
हरि हरि जगल में है मगल की तैयारी रे हरी।।

 

और मिर्जापुरी लोकमस्ती देखिये-

 

काली खोंह छानि के बूटी, गुण्डे तान उडावै रामा-
हरि हरि अष्टभुजा पर भयलीं भिरिया भारी रे हरी।’

 

इसी प्रकार सीख की बाते भी बतायी गयी है। सीताराम द्विवेदी ‘समन्वयी’ की एक कजरी की कुछ पक्तियां देखिये जो नशाबदी के महत्व पर प्रकाश डालती है। शराबी पति घर बर्बाद कर
देता है। जनकवि दूध और शराब का अतर स्पष्ट करता हुआ कहता है-

 

 

“हरि-हरि बिगड गयल मोर घरवा,
मिलल शराबी रे हरी।
काम धाम सब छोड छाड़ के,
भट्ठी पर जुट जाला रसामा।
हरि हरि छोड सरबिया,
पियल दूध मनमाना रे हरी।

 

इसी प्रकार भाई-बहन के प्रेम का वर्णन देखिये- कजरी-तीज पर भाई की याद, नैहर के अन्य सदस्यों की याद आनी स्वाभाविक है। ननद-भौजाई के बीच के वार्तालाप की पक्तिया है–

 

“साझे कइह भउजी खिचरी फकउतिउ, सबेर अड्डे ना।

मोरा भैया अलबेलवा सबेर अइहै ना।”

 

और उत्तर कि —

“सांझे क खिचडी जुडाई ननदी,
तोर भइया फडेबजवा, नाही हो अड्डहैँ ना
साझे कहड् भउजी जलवा भरउतिउ,
सबेर अइहै ना।
मोर भइया अलबेलवा सबेरे अइहै ना।।

 

और फिर इसी प्रकार मिर्जापुरी ठाठ तो देखिये। वर्षा के दिन भी क्या दिन है। रिमिझिम फुहारो के संग या बाद में पति-पत्नी बाहरी तरफ निकल जाते है और क्या-क्या देखल है-

 

“प्रिया हमके घुमावै कई मील सखी
चढके साइकिल सखी ना।
देखा खजुरी क बाघ,
बहुत दिन से रहा साथ।
जल अगाध भरा जैसे,
लगे झील सखी।
चढके साइकिल सखी ना।”

 

कजली लोकजीवन की अनिवार्यता है और लोकजीवन कजरी की भी अनिवार्यता है। क्योकि उसमे सब कुछ लोकपरक लोकोउयोगी और लोकानुरंजन के लिए होता है। उसमे एक साथ राष्ट्रीय चेतना, प्रेरक प्रसंग, सस्कृति-दर्शन, प्रकृति-चित्रण, झूलावर्णन, श्रूयार, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, गरीबी, पौराणिक आख्यान, समाज-सुधार ,त्याग, समर्पण, पारिवारिक जीवन की सूक्ष्म बातों का भी चित्रण रहता है। गरीबी मे सुख की सच्ची अनुभूति का चित्रण इन चार पक्तियों मे देखिये–

 

 

“गोरिया कहै दुलराय, पियवा के गले लगाय,
हमके बेसर दे गढ़ाय, लहरेदार बलमू ।
लेवे झुलनी बुलाक, झुमका टीका बुन्दाबाक,
छू छ किलिया बिना नाक बा हमार बलमू।।

 

स्पष्ट है कि सुख धन-सम्पत्ति से नहीं, सुख पारिवारिक जीवन से मिलता है। छोटा, सुखी, हँसता-खेलता परिवार ही धरती का असली स्वर्ग है। तमाम काण्ड करके, अरबों एकत्र करके भी क्या यह सहज सुख देश-समाज के उन गददारो को मिल सकता है ? कदापि नही, यह तो जंगल, पहाड, गाव-गिरांव में सीमित साधनो मे जीवन जीने वालों को ही नसीब हो सकता है। एक गरीब आदिवासी के उस सुख को क्या महलों का आदमी बादशाह पा सकता है जो दिन भर श्रम करने के बाद वह अपनी राम मडैया मे आते एक ही मोटी लिटटी या एक थरिया भात पूरे परिवार के साथ माल बांट के खां लेता। कथा कहानी कहते सुनते मेरा पर कजरी, बिरहा, लोरिकी, विजयमल के गीत गाते काठ की चारपाई या तख्त पर सो जाता। पत्नी भी पाव दबाते वही लुढक जाती।

 

 

तात्पर्य यह कि कजरी मे सब कुछ लोकपरक है। उसकी लय धुन भाषा, भाव, विषयवस्तु सब कुछ लोक से उद्भूत है, लोक के लिए है, लोकानुरंजन के लिए है और लोक का पुराणोतिहास है। कजरी लोकजीवन की आत्मा ओर कजरी की आत्मा भी लोकजीवन है। यह इस बात से ही स्पष्ट है कि कजरी की धुने भी लोक से ही ग्रहण की गयी हैं। जैसे- अरे रामा, हे हरी, सावरिया, सावर गोशिया, ना, बलमू, जिरवा, झालरिया, पडेला झीरजीर बुनिया, ललना, विर्नवा, लोय आदि।

 

 

इसमे खादी, लिट्टी-बाटी, लोक रंग, लोक ढंग, लोक रुचि, लोकवार्ता को ग्रहण किया गया है। स्वतत्रता आन्दोलन के प्रसंग मे गांधी जी के खादी आन्दोलन तक को समेट लिया गया है। स्वतत्रता आन्दोलन में कजरी गीतों के माध्यम से जन-जागरण में मदद मिली थी। तात्पर्य कि कजरी पर्व लोक-मानस की अक्षय निधि है। उसके गायन, अखाड़े और दंगल की परपरा समाप्त होने की कगार पर है। किन्तु आज भी लोककण्ठ का श्रृंगार बनी कजरी के बडे पैमाने पर संग्रह की आवश्यकता है। उसे प्रोत्साहित कर जन-जागरण का काम लिया जा सकता है।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े:—-

 

 

मीरान शाह बाबा दरगाह विजयगढ़
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद का विजयगढ एक परगना है। यहां एक ऊची पहाडी के ऊपर विजयगढ का किला बना है। Read more
काशी के मेले
काशी ()(वाराणसी) पूर्वांचल की सबसे बडी सांस्कृतिक नगरी है। कहते है यह शिवजी के त्रिशूल पर बसी है तथा अक्षय Read more
चुनार शरीफ दरगाह
मिर्जापुर  कंतित शरीफ का उर्स और दरगाह शरीफ का उर्स हिन्दुस्तान भर मे प्रसिद्ध है। दरगाह शरीफ चुनार के किले Read more
कंतित शरीफ
साम्प्रदायिक सद्भाव, हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल के समीप ओझला से पश्चिम कंतित मे ख्वाजा Read more
शिवपुर धाम मिर्जापुर
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में विंध्याचल धाम से एक किमी पश्चिम मे शिवपुर नामक स्थान है। जिसके बारे मे कहा Read more
विंध्याचल नवरात्र मेला
विंध्याचल नवरात्र मेला यह जगत प्रसिद्ध मेला मां विंध्यवासिनी धाम मिर्जापुर जिले में लगता है। यूं तो नवरात्र के अवसर पर Read more
पक्का घाट मिर्जापुर
गंगा-तट पर जितने नगर बसे है, उन सबमे मिर्जापुर का पक्का घाट और घण्टाघर बेजोड है।ये दोनो वास्तुशिल्प के अद्भुत नमूने Read more
लोहंदी महावीर मंदिर
श्रावण मास के प्रत्येक शनिवार को लोहंदी महावीर का मेला लगता है। वैसे प्रत्येक मगलवार को भी सैकडो दर्शनार्थी भक्तगण Read more
ओझला पुल
ओझला पुण्यजला का बिगड़ा हुआ रूप है। यह एक नाला है जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर नगर से पश्चिम विंध्याचल Read more
सुरियावां का मेला
सुरियावां उत्तर प्रदेश राज्य के भदोही जिले में एक नगर है। यहां भोरी महजूदा में हल षष्ठी व्रत के अवसर पर Read more
देवलास मंदिर
उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद में लगने वाला देवलास का मेला बहुत मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि देवलास नामक स्थान Read more
सेमराध नाथ का मेला
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में जगीगंज-शेरशाह सूरी मार्ग से गंगा-घाट पर सेमराध नाथ का मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान Read more
मगहर का मेला
संत कबीरदास के बारे मे जनश्रुति है कि वे अपनी भक्ति पर अटूट विश्वास के फलस्वरूप काशी छोड़ कर मगहर Read more
भदेश्वर नाथ मंदिर
बस्ती , गोरखपुर, देवरिया तीनो एक स्वभाव के शहर है। यहां की सांस्कृतिक परपराए महत्वपूर्ण और अक्षुण्ण रही हैं। सरयू Read more
कल्पा जल्पा देवी मंदिर सिकंदरपुर
सिकंदरपुर उत्तर प्रदेश राज्य के बलिया जिले में एक नगर पंचायत व तहसील है। इस नगर को सिकंदर लोदी ने बसाया Read more
बलिया  जिले का रसड़ा एक प्रमुख स्थान है। यहा नाथ संप्रदाय का प्रभाव है, जिसके कारण यहां नाथ बाबा का Read more
असेगा का मेला
असेगा एक स्थान का नाम है जो बलिया जिले के सुखपुरा थानान्तर्गत पड़ता है। असेगा में शिवरात्रि के अवसर पर सात Read more
ददरी का मेला
सरयू का तट पर स्थित बलिया जनपद अपनी अखंडता, निर्भीकता, बौद्धिकता, सांस्कृतिक एकता तथा साहित्य साधना के लिए प्रसिद्ध है। इसका Read more
बरहज का मेला
बरहज देवरिया का एक प्रमुख स्थान है जो पवित्र सरयू जी के तट पर स्थित है। यहां कार्तिक पूर्णिमा के दिन Read more
बांसी का मेला
बांसी एक नदी का नाम है जिस के तट पर क्वार माह की पूर्णिमा को मेला लगता है। इस मेले Read more
कुलकुला धाम मेला
कुलकुला देवी मंदिर कुशीनगर जनपद मे कसया नामक तहसील के एक कुडवा दीलीपनगर गांव है। यहा से चार किलोमीटर पूरब की Read more
दुग्धेश्वर नाथ मंदिर
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में रूद्रपुर नामक एक नगर पंचायत है। रूद्रपुर बाबा दुग्धेश्वर नाथ मंदिर के लिए जाना जाता Read more
सोहनाग परशुराम धाम
देवरिया  महावीर स्वामी और गौतमबुद्ध की जन्म अथवा कर्मभूमि है। यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भी है, अत कला और संस्कृति Read more
लेहड़ा देवी मंदिर
उत्तर प्रदेश राज्य में एक प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर जिसे लेहड़ा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है और इसकी Read more
बांसगांव का मेला
बांसगांव भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोरखपुर जिले का एक कस्बा और नगर पंचायत है। यह नगर यहां बसे श्रीनेत Read more
तरकुलहा का मेला
गोरखपुर  जिला मुख्यालय से 15 किमी0 दूर देवरिया मार्ग पर एक स्थान है तरकुलहा। यहां प्रसिद्ध तरकुलहा माता का तरकुलहा Read more
गोरखनाथ का मेला
उत्तर प्रदेश का गोरखपुर बाबा गुरु गोरखनाथ के नाम से जाना जाता है। नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक तथा प्रथम साधु गुरु Read more
शेख शाह सम्मन मजार
गाजीपुर  जिले मे सैदपुर एक प्रमुख स्थान है। यहा शेख शाह सम्मन की मजार है। मार्च और अप्रैल में यहां Read more
जमदग्नि आश्रम मेला
गाजीपुर  जिले में जमानिया एक तहसील है जिसका नामकरण जमदग्नि ऋषि के नाम पर यहा उनका आश्रम होने के कारण Read more
कामाख्या देवी मेला
गाजीपुर  जिला वाराणसी के प्रभाव-क्षेत्र में आता है। बलिया, आजमगढ़ उसके समीपवर्ती जनपद है।अतः गाजीपुर की सांस्कृतिक परंपरा भी बड़ी Read more
बाबा गोविंद साहब का मेला
आजमगढ़  नगर से लगभग 50 किमी. पश्चिम फैजाबाद मार्ग पर बाबा गोविंद साहब धाम है। जहां बाबा गोविंद साहब का Read more
भैरव जी मेला महराजगंज
आजमगढ़  जिला मुख्यालय से 22 किमी0 उत्तर-पश्चिम की ओर महराजगंज के पास एक स्थान है। जहां भैरव जी का प्रसिद्ध Read more
दुर्वासा धाम मेला
आजमगढ़  बहुत पुराना नगर नही है, किंतु तमसा के तट पर स्थित होने के कारण सांस्कूतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा Read more

write a comment