कजरी की नवमी कब और कैसे मनाते है – कजरी पूर्णिमा का व्रत और कथा

कजरी की नवमी का त्योहार हिन्दूमात्र में एक प्रसिद्ध त्योहार है। श्रावण सुदी पूर्णिमा को कजरी पूर्णिमा कहते है। इसी को श्रावणी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन श्रावणी कर्म होता है और रक्षाबंधन भी होता है। किन्तु बुन्देलखण्ड की श्रावणी पूर्णिमा मे कुछ विशेषता है। वह यह कि, वहाँ श्रावणी पूर्णिमा को संध्या के समय कजरी का जुलूस निकलता है। पूर्णिमा से एक सप्ताह पूर्व यानी श्रावण शुक्ला नवमी को कजरी बोई जाती है। सात दिन तक बराबर सन्ध्या को धूप और आरती हुआ करती है। गेहूँ या जौ पानी में फुलाकर दोने मे बो देते हैं ओर उनको ऐसी जगह रखते हैं जहाँ हवा न लगने पाये। हवा न लगने से कजरी का रंग पीला रहता है। कजरी के रंग का सगुन-असगुन भी माना जाता है। जिस नवमी को कजरी बोई जाती है, उसे कज़री की नवमी कहते हैं।

 

 

कजरी की नवमी को जिनके यहाँ कज़री बोई जाती है, लड़के वाली स्त्री व्रत रखती है। उसी दिन गाँव की स्त्रियाँ किसी नियत स्थान पर कजरी बोने की मिट्ठी लेने जाती हैं। वहाँ भी एक छोटा सा मेला जैसा हो जाता है। मिट्टी को घर में लाकर दोनों या खप्परों में भरती है। पुनः जिस कोठे में कजरी को रखना होता है, उस कोठे में दीवार पर नवमी लिखी जाती है। भगवती की प्रतिमा सूचक एक पुतली लिखी जाती है। उसी के समीप एक मढ़ो या मकान, लड़के समेत एक पालना, एक नेवले का बचा और एक स्त्री की आकृति हल्दी से बनाई जाती है। इसी अनगढ़ चित्रकारी को नवमी कहते हैं। इसी नवमी की पूजा करके स्त्रियाँ कजरी बोती हैं। तब फिर नवमी के व्रत के सम्बन्ध की कथा कहती है। कथा के बाद कजरी बोने का गीत गाया जाता है।

 

 

 

कजरी पूर्णिमा की कथा – कजरी की नवमी की कहानी

 

एक स्त्री जन्म-बन्ध्या थी। उसने एक ऐसे नेवले के बच्चे को पाला जिसकी माँ मर गई थी। स्त्री को बाल-बच्चा कुछ तो था ही नही, इस कारण वह नेवले का लड़के की तरह पालन-पोषण करतो थी। दैवयोग से उस सत्री को गर्भ रह गया और नौ महीने बाद एक सुन्दर बालक पैदा हुआ। स्त्री नेवले को अपने पुत्र का बड़ा भाई करके मानती थी।

 

 

श्रावण सुदी नवमी की बात है। स्त्री लड़के को पालने पर लिटाकर आप जल भरने चली गई। चलते समय उसने नेवले से कहा –“जब तक में न आऊँं, तू भाई की रक्षा करना। स्त्री चली गई। नेवला लड़के के पालने के चारों ओर फेरा लगाता हुआ पहरा देने लगा। उसा समय एक सर्प पालने की तरफ झपटा। नेवले ने उसे काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया।

 

 

सर्प को मारकर नेवला माता को अपनी कृतज्ञता या बहादुरी दिखलाने के लिये बाहर दौड़ा गया। उघर से माँ सिर पर भरे हुए घड़े रखे चली आ रही थी। उसने नेवले के मुख पर रक्त लगा देखकर समझा कि यह लड़के को मारकर अब भागा जा रहा है। इसी कारण क्रोध मे आकर उसने नेवले के ऊँपर घड़ा पटक दिया। नेवला तत्क्षण मर गया। स्त्री दौड़ी हुई घरके भीतर गई, तो देखती क्या है कि लड़का पालने में पड़ा खेल रहा है। उसी के समीप एक बड़ा भयानक सर्प टुकड़े-टुकड़े हुआ पड़ा है। अब उसने जाना कि नेवला सर्प को मारकर मेरे पास दौड़ा गया था। वह अपनी मूर्खता पर पछताने लगी कि मेंने सहसा क्रोध करके बड़ा अनर्थ किया है। बड़े लोगों का यह मत है कि आँखो देखी बात सहसा न मान लेनी चाहिये। हर बात का निर्णय कर लेना चाहिये। हाय ! “मैंने न मानो, तो कौन सुने मेरी विपति कहानी।

 

कजरी की नवमी या कजरी पूर्णिमा
कजरी की नवमी या कजरी पूर्णिमा

 

वह स्त्री सारे दिन रोती रही। दोपहर बाद पड़ोस की स्त्रियाँ उसे नवमी की मिट्टी लाने के लिये बुलाने आई। परन्तु उसको रोते देखकर और उसका कार्य कारण समझकर उन्होने कहा —बीती बात पर पश्चात्ताप करने से क्‍या होता है ? तू ने अब तक खाना नहीं खाया। यह तेरा नवमी का व्रत हो गया। अब चलकर मिट्टी लाओ ओर जहाँ नवमी लिखी जाय उसी जगह इस घटना का चित्र लिखकर पूजा करो। हम लोग भी इस नेवले की कृतज्ञता को चिर – स्मरण रखने के लिये प्रति नवमी को इसकी पूजा किया करेंगे।

 

 

निदान उस स्त्री सब पड़ोसिनो के साथ-साथ नवमी का पूजन किया। कहा जाता है कि उसी दिन से नवमी के व्रत की परंपरा चली है, क्योंकि अब भी सिर्फ लड़के वाली स्त्रियाँ ही कजरी की नवमी का व्रत करती है। कजरी पूर्णिमा को भगवती की आराधना और पूजा भी होती है। कजरी पूर्णिमा के संबंध में एक दूसरी कथा भी प्रचलित है।

 

 

कजरी की नवमी की दूसरी दंतकथा

 

एक स्त्री का नाम बारीबहू था। कजरियों की नवमी को उसने पड़ोसियों से पूछा — आज क्या करना चाहिये। उन्होने कहा कि आज व्रत रहना चाहिये तथा शाम को नवमी की पूजा करनी चाहिये और जो मन आवे सो दान-पुण्य करना चाहिये। तब वह घर मे आकर चादर ओढ़कर लैटी रही। दोपहर को जब उसका आदमी आया और उसने पूछा कि आज रसोई क्यों नही बनाई, वह बोली कि आज तो मेंने व्रत रखा है। तब पति ने कहा– खैर, तूने व्रत रखा है, मैने तो व्रत नही रखा। क्या में योही भूखों मरूँ? स्त्री ने जवाब दिया — चाहे जो हो, में तो नवमी का पूजन किये बिना कोई भी काम नहीं करूँगी। तब पुरुष बोला — अच्छा, तो जो तेरी मर्जी आवे सो कर, मैं तो दूसरे गाँव को जाता हूँ। मुझे जरूरी काम है।

 

 

यह कहकर वह स्त्री के देखते तो बाहर चला गया। परन्तु इधर-उधर करके स्त्री की नजर बचाकर वह कोठिला के भीतर छिपा रहा। अब पति को गया हुआ जानकर स्त्री उठी और बाजार से दो गन्ने लाकर उनको चूस गई। फिर उसने रोटियाँ बनाई और खूब घी लगाकर खाई। थोड़ी देर बाद उसने सिवाई बनाई और घी शक्कर के साथ उसे खा गई। इतने पर भी उसे सन्‍तोष न हुआ। तब उसने खिचड़ी पकाई और घी डालकर इसे भी खा लिया।

 

 

इस प्रकार की पूजा से निवृत्ति लेकर अब उसने नवमी की पूजा की तैयारी की। वह फूहड़ तो थी ही, नवमी लिखना जानती नहीं थी। इसलिये गोबर घोलकर दीवार पर पोत दिया। इसके बाद स्नान करके उसने नवमी की बिढ़ई बनाई और तब पूजा करने बैठी। जैसी नवमी बनाई थी वैसी ही मनमानी पूजा करके वह बोली — “नवमो बाई बिढ़ई खायगी ? पुरुष ने कोठिला से से उत्तर दिया — “हूँ! उसे इस पर आश्चर्य हुआ कि मेरी नवमी बोलती क्‍यों है। फिर उसने कहा–“नौ बासी नौ ताती नौ के चूरे खायगी? पुरूष ने कहा “ हूँ! तब तो उसने गाँव मे जाकर स्त्रियों से कहा— मेरी पूजा से प्रसन्न होकर मेरी नवमी तो बोलती है। यह सुनकर सब स्त्रियों को आश्चर्य हुआ। उन्होने पूछा— तुमने ऐसी कैसी नवमी लिखी है जो बोलती है? उसने उत्तर दिया— मैं नवमी लिखना तो जानती ही नहीं थी— इस कारण मैने गोबर से पोत दिया था।

 

 

गाँव की स्रियाँ फूहड़ की नवमी की बोली सुनने दौड़ी आई। उन्होने फूहड़ के कहे अनुसार वही सवाल किया— नवमी बाई नौ बिढ़ई’ खायगी? पुरुष ने फिर भी पहले जैसा कह दिया। इस पर स्त्रियों को बड़ी ईष्या हुई कि हम लोग जो इतनी श्रद्धा-भक्ति से व्रत और पूजन करती है, हमारी नवमी कभी बोलती ही नहीं। इस फूहड़ की नवमी बोलती है। यह बड़े आश्वर्य की बात है। परन्तु देवताओं की गति देवता ही जाने।

 

 

स्त्रियों के चले जाने पर फूहड़ ने बिढ़ुई भी खाई। फिर वह चारपाई पर बिछौना बिछाकर लैटी रही। संध्या को पुरुष कोठिला से निकलकर खाँसता-खखारता बाहर से घर मे आया। उसने स्त्री को पुकारकर कहा— अरी! किवाड़ तो खाल दे। उसने करवट बदलते हुए कहा— मेरा तो जी अच्छा नहीं है। उठे तो कौन उठे? करवट बदलने मे चारपाई चरचराई, तो वह बोली– देखो मेरी पसलियाँ चरचरा रही हैं, मे उठ नहीं सकती। तब पुरुष किसी तरह किवाड़ खोलकर भीतर आया।

 

 

स्त्री ने पूछा— तुम जिस गाँव को जाने को कहते थे, वहाँ तक गये ही नहीं क्‍या? उसने कहा— हाँ, ऐसी ही बात है। रास्ते मे एक बड़ा सर्प मिल गया, इसीलिए लौट आया हूँ। स्त्री ने पूछा— सर्प कितना बड़ा था?। पुरुष ने कहा— जितना बड़ा गन्ना होता है। वह सरकता कैसे था? जैसे खिचड़ी मे घी सरकता है? यह कहकर उसने झोंटा पकड़कर पीटना शुरू किया। यहाँ तक ठोका कि वह बदहोश हो गई। उसकी पुकार सुनकर पड़ोस की स्त्रियाँ दौड़ आई। पुरुष निकल कर बाहर चला गया। स्त्रियों ने पूछा— अरी ! हुआ क्या? वह बोली— क्या बताऊँ, क्‍या हुआ ? कजरी की नवमी की पूजा हुईं और क्या हुआ।

 

 

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