एंटीबायोटिक की खोज किसने की, एंटीबायोटिक कैसे तैयार किया जाता है

आधुनिक चिकित्सा के बढ़ते कदमों में एंटीबायोटिक की खोज निस्संदेह एक लंबी छलांग है। सबसे पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलीन थी, जिसकी अलेग्जेंडर फ्लेमिंग ने सन्‌ 1928 में खोज की थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम यह देखा था कि स्टेफिलोकीकाई नामक बैक्टीरिया की कल्चर प्लेट में जब हरे रंग की फफूंद उग जाती है, तो बैक्टीरिया की वृद्धि रुक जाती है लेकिन पेनिसिलीन को इसके फंफूद से सन्‌ 1940 मे अलग किया गया और उसके गुणों का विस्तार से अध्ययन किया गया।प्रारंभ पेनिसिलीन इतनी दुर्लभ थी कि रोगी को दिए जाने के बाद यह औषधि उसके मूत्र से वापिस निकाल ली जाती थी, ताकि उसका पुनः प्रयोग किया जा सके। आज पेनिसिलीन बहुत ही कम मूल्य पर उपलब्ध हो जाती है।

 

 

एंटीबायोटिक की खोज किसने की थी

 

बैक्टीरिया एक कोशकीय वनस्पति वर्ग से संबंध रखने वाला जीव होता है। कुछ बैक्टीरिया रोग पैदा करते हैं। इनके आधार पर एंटीबायोटिक दो मुख्य भागो में बांटे जा सकते हैं। एक तो वे, जो केवल कुछ प्रकार के बैक्टीरिया पर ही प्रभाव डाल सकते हैं। इनको नैरो स्पैक्ट्रम एंटीबायोटिक कहते हैं। इस वर्ग में पेनिसिलीन मुख्य है। दूसरे जो विभिन्‍न प्रकार के बहुत से बैक्टीरिया पर प्रभाव डालते हैं, इनको ब्रॉड स्पैक्ट्रम एंटीबायोटिक कहा जाता है, जिनमें टेट्रासाइक्लन और क्लोरोमाइसिटीन मुख्य हैं।

 

 

एंटी’ का अर्थ होता है किसी के विरोध में तथा ‘बायोट’ का अर्थ जीवन है। इन दोनों को मिलाकर एंटिबायोटिक कहा जाता है। ये दवाएं कुछ विशेष प्रकार के जीवाणुओं के जीवन को नष्ट करने के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। एक वैज्ञानिक ने इसकी परिभाषा यों दी हैः-‘एंटीबायोटिक वे औषधियां हैं, जो अपनी जीवन-रक्षा के लिए दूसरों का जीवन नष्ट करती हैं।

 

 

वैक्समैन नामक वैज्ञानिक के कथनानुसार ये वे रासायनिक पदार्थ हैं जो जीवाणुओं से बने हैं और इनमें बैक्टीरिया या जीवाणु की वृद्धि रोकने की शक्ति है। परंतु यदि हम चाहें कि किसी भी जीवाणु के कारण हुए रोग में हम कोई भी एंटीबायोटिक प्रयोग करें, तो यह संभव नहीं है। इनका कार्य क्षेत्र बडा ही सीमित होता है। एक विशेष प्रकार का एटीवायोटिक किसी विशेष रोग के लिए ही उपयोगी होगा। ऐसा नहीं होता कि वह किसी भी बैक्टीरिया से हुए रोग को ठीक कर दे।

 

 

यह आश्चर्यजनक सत्य है कि बैक्टीरिया द्वारा जनित रोग का इलाज भी बैक्टीरिया से ही बने एंटीबायोटिक द्वारा होता है। बैक्टीरिया द्वारा अनेक खतरनाक बीमारियां फैलाई जाती हैं। इनके कारण गंभीर बीमारिया हो जाती हैं, जिनसे मृत्यु भी हो सकती है। बैक्टीरिया द्वारा फैलाई जाने वाली मुख्य बीमारियां
हैं-टी. बी. अथवा क्षयरोग, टायफाइड, हैजा, डिप्थीरिया, न्यूमोनिया और पेचिश। इनके अतिरिक्त भी अनेक बीमारियां इसके द्वारा फैलती हैं।

 

एंटीबायोटिक
एंटीबायोटिक

 

पहले तो पेनिसिलीन को द्रव के रूप में प्राप्त किया गया। पर शीघ्र ही वैज्ञानिको का यह प्रयत्न सफल हुआ कि वे प्रयोगशाला मे इसे सिन्थेटिक माध्यम मे बना सके। सिन्थेटिक शब्द मानवीकृत अथवा कुत्रिम के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। पेनिसिलीन के आरंभिक दिनों मे अनेक कमियां सामने आयी। एक तो यह कि यह दवा मुर्दो द्वारा शीघ्र ही शरीर के बाहर निकाल दी जाती है। जब अपने पूरे समय तक औषधि शरीर में उपस्थित ही नहीं रहेगी, तो उसे अपनी क्रिया करने का अवसर ही नहीं मिलेगा। अत: इसकी खुराकें जल्दी-जल्दी देनी पड़ती थी। इसके अतिरिक्त एक अवगुण यह है कि घोल के रूप में पेनिसिलीन एक अस्थाई यौगिक का कार्य करती है। अम्लों के कारण भी इसकी क्रियाशीलता जाती रहती है। पेनिसिलीन अस्थाई होती है। अतः इसे शुद्ध करने में अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ा क्योकि यह ठीक प्रकार से शुद्ध हो ही नहीं पाती थी। बाद में इसमे कुछ सफलता मिली। अंत मे नई विधियो से शुद्ध और अधिक मात्रा मे पेनिसिलीन बनाई गई। इस सफलता ने अनेक वैज्ञानिकों तथा अनुसंधान केन्द्रों का ध्यान अपनी ओर खीचा, उस समय द्वितीय विश्व-युद्ध हो रहा था। ऐसी विशेष परिस्थितियो के कारण, जबकि इस प्रकार की दवाये बडी आवश्यक सिद्ध हो सकती थीं, सब का ध्यान उधर उठना स्वाभाविक ही था। उन दिनो पेनिसिलीन को बड़े व्यापारिक स्तर पर बनाने के प्रयत्न आरंभ किए गए। इस तरह के प्रयत्न ब्रिटेत और अमेरिका ने सम्मिलित रूप से किए थे

 

 

व्यापारिक स्तर पर बनाई जाने वाली पेनिसिलीन में शुद्ध पेनिसिलीन के लवण ही रहते हैं। ये विशुद्ध रूप से हानिरहित होते हैं। इस प्रकार बिकने वाली पेनिसिलीन मैं केवल पेनिसिलीन ही नहीं होती। यो तो अनेक विधियों से पेनिसिलीन बनाई जा रही है। पर बडे पैमाने पर बनाने के लिए मुख्यतः तीन विधिया प्रयोग में लाई जाती हैं।

 

 

1. इस विधि से पेनिसिलीन बनाने मे इसके बैक्टीरिया, जिनका पूरा नाम पेनिसिलीन नोटेटम है, एक बर्तन में इनके खाद्य पदार्थ की ऊपरी सतह पर उगाए जाते है। पूरी तरह से उगाने के बाद यह जीवाणु या फफूदी जो कि हरे रंग की होती है, एक मोटी चटाई की भांति मालूम पड़ती है। लगभग एक सप्ताह बाद यह पूरी तरह से उग आती है। इस विधि द्वारा बनाने पर अन्य विधियों की अपेक्षा पेनिसिलीन अधिक मात्रा में बनती है। किन्तु इसे बनाने में परिश्रम बहुत लगता है, जिससे लागत बढ़ जाती है। अतः बड़े पैमाने पर बनाने के लिए यह विधि अधिक उपयोगी सिद्ध नही हो पाई है।

 

 

2. इसमें पेनिसिलीन बड़ी-बड़ी टंकियों में या बड़े बर्तनों मे उगाई जाती है। टंकियों का उपयोग तब किया जाता है जबकि चीनी मे खमीर उठाकर उसे बैक्टीरिया के खाद्य के रूप में प्रयोग किया गया हो और बर्तनों में तब, जब कि साइट्रिक अम्ल को खाद्य बनाया गया हो। यह फफूंदी सास लेने के लिए बहुत बडी मात्रा मे ऑक्सीजन का प्रयोग करती है। अतः यदि खाद्य इसके ऊपर छा जाएगा तो कठिनाई होगी। इससे बचने के लिए खाद्य को बराबर हिलाते रहना पड़ता है। इसमें एक अन्य सावधानी भी रखनी पड़ती है, जो हवा इसमें पहुंचाई जाती हैं उसे बडी सावधानीपूर्वक शुद्ध कर लिया जाता है, अन्यथा अन्य बैक्टीरिया भी, जो हर
समय वायुमंडल में रहते हैं, उगना आरंभ कर देगे। यह फफूदी या तो गुच्छों के रूप में उगती है या लंबे तन्तुओ के रूप मे। इस विधि से दो दिनों में पेनिसिलीन तैयार हो सकती हैं। इस प्रकार इसमें समय की काफी बचत होती है। परंतु दूसरी ओर यह तरीका कभी-कभी असफल भी हो जाता है। बड़े पैमाने पर बनाने के कारण बड़े-बड़े गुच्छे उग आते है। इसके स्थान पर यदि कम-कम खाद्य लेकर, थोडा-थोडा पेनिसिलीन एक बार मे बनाया जाए, तो कम हानि रहती है।

 

 

3. इस विधि से पेनिसिलीन बनाने मे पेनिसिलीन की सर्वाधिक प्राप्ति होती है। इसमें ये बैक्टीरिया एक निश्चित तापक्रम पर बडे-बडे बर्तनों मे उगाए जाते हैं। इसमें कुल चार दिन का समय लगता है। जीवाणु समस्त वातावरण में सदा उपस्थित रहते हैं। अत जब तक पेनिसिलीन पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाती अर्थात्‌ इसका चूर्ण निकाल कर अलग नही कर लिया जाता, सदा दूसरे जीवाणुओं से इसके प्रभावित होने का भय बना रहता है। इसलिए इसे बनाने में अधिक सावधानी शेष वस्तुओ से अलग निकालने मे रखनी पड़ती है। इस दिशा में हुई थोडी-सी असावधानी भी इसके बनाने के समस्त परिश्रम पर पानी फेर देती है। अतः इसके खाद्य पदार्थ को शीघ्रता से छान कर पेनिसिलीन से अलग कर दिया जाता है। इसके उपरान्त अनेक रासायनिक क्रियाएं होती हैं, तत्पश्चात्‌ हमें पेनिसिलीन के क्रिस्टल मिलते हैं।

 

 

एंटीबायोटिक केवल पेनिसिलीन को ही नहीं कहा जाता। अन्य एंटीबायोटिक कुछ बीमारियों मे पेनिसिलीन से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुए है। आज सैकडो एंटीबायोटिक मानव ने खोज निकाले हैं। जैसे पेनिसिलीन, पेनिसिलियम नोटेटम
नामक बैक्टीरिया से, ग्रामिसाईडन वेसिलस क्वेविस से, टाइटोश्राईसन भी बेसिलस ब्रेविस से, स्ट्रेप्टेमाइसिन स्ट्रेप्टोमाइसीज ग्रीसियस से, बेसिट्रासिन बेसिलस सबटिलिस से तथा औरियोमाइसिन स्ट्रेप्टेमाइमीज नामक जीवाणु से
प्राप्त होता है। पहला सिंथेटिक एंटीबायोटिक क्लोरमफेनिकाल था। एंटीबायोटिक की खोज से चिकित्सकों को संक्रामण (Infaction) रोकने मे बडी सहायता मिली है। इनकी मदद से शल्य चिकित्सा को और अधिक सुरक्षित बनाया जा सका है।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े

 

 

अंकगणित
जो अंकगणित प्रणाली आज संसार में प्रचलित है, उसे विकसित और पूर्ण होने मे शताब्दियां लगी है। यद्यपि इसका आविष्कार Read more
प्लास्टिक
प्लास्टिक का अर्थ है- सरलता से मोड़ा जा सकने बाला। सबसे पहले प्लास्टिक की खोज अमेरिका के एक वैज्ञानिक जान बैसली Read more
रबड़
रबड़ आधुनिक सभ्यता की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यदि हम रबर को एकाएक हटा लें, तो आज की सभ्यता पंगु Read more
उल्कापिंड
हवार्ड वेधशाला (अमेरिका) के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री ह्विपल ने उल्कापिंड की खोज की तथा उन्होंने इसके प्रकुति-गुण, आकार, गति पर अनेक खोजें Read more
निऑन गैस
निऑन गैस के बढ़ते हुए उपयोग ने इसकी महत्ता को बढा दिया है। विज्ञापन हेतु भिन्न रंग के जो चमकदार Read more
ध्वनि तरंगें
हमारे आसपास हवा न हो, तो हम किसी भी प्रकार की आवाज नहीं सुन सकते, चाहे वस्तुओं में कितना ही Read more
धातुओं
वास्तव में वर्तमान सभ्यता की आधाराशिला उस समय रखी गई जब धातु के बने पात्र, हथियार तथा अन्य उपकरणों का Read more
रेडियो तरंगों की खोज
हम प्रतिदिन रेडियो सुनते है लेकिन हमने शायद ही कभी सोचा हो कि रेडियो सैकडों-हजारो मील दूर की आवाज तत्काल Read more
अवरक्त विकिरण
ब्रिटिश खगोलविद सर विलियम हर्शेल ने 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक प्रयोग किया, जिसे अवरक्त विकिरण (infra red radiation) की Read more
अंतरिक्ष किरणों की खोज
अंतरिक्ष किरणों की खोज की कहानी दिलचस्प है। सन्‌ 1900 के लगभग सी.टी,आर. विल्सन, एन्स्टर और गीटल नामक वैज्ञानिक गैस Read more
प्रकाश तरंगों
प्रकाश तरंगों की खोज--- प्रकाश की किरणें सुदूर तारों से विशाल आकाश को पार करती हुई हमारी पृथ्वी तक पहुंचती Read more
परमाणु किरणों
परमाणु केन्द्र से निकली किरणों की खोज- कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि यदि उन्हें साधारण प्रकाश या अन्य प्रकार Read more
एक्सरे
सन्‌ 1895 के एक सर्द दिन जर्मनी के वैज्ञानिक राण्ट्जन (Roentgen) फैथोड किरण विसर्जन नलिका (Cathode ray discharge tube) के साथ Read more
इलेक्ट्रॉन
इंग्लैंड के वैज्ञानिक जे जे थाम्सन ने सन्‌ 1897 में इलेक्ट्रॉन की खोज की। उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया कि Read more
धूमकेतु
अंतरिक्ष में इधर-उधर भटकते ये रहस्यमय धूमकेतु या पुच्छल तारे मनुष्य और वैज्ञानिकों के लिए हमेशा आशंका, उलझन तथा विस्मय Read more
पेड़ पौधों
इस समय हमारे भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीशचंद्र बसु ने यह सिद्ध किया कि पेड़ पौधों में भी जीवन होता हैं, सारे Read more
मस्तिष्क
सन्‌ 1952-53 में अमेरिका के मांट्रियल न्यूरॉलॉजिकल इंस्टीट्यूट में एक 43 वर्षीय महिला के मस्तिष्क का आपरेशन चल रहा था। उसके Read more
तेल
धरती की लगभग आधा मील से चार मील की गहराई से जो गाढा कीचड़ मिला पदार्थ निकलता है, उसी को Read more
प्लूटो ग्रह
प्लूटो ग्रह की खोज किसने की और कैसे हुई यह जानकारी हम अपने इस अध्याय में जानेंगे। जैसा हमने पिछले Read more
नेपच्यून ग्रह
नेपच्यून ग्रह की खोज कैसे हुई यह हम इस अध्ययन में जानेंगे पिछले अध्याय में हम यूरेनस ग्रह के बारे Read more
यूरेनस ग्रह
बुध, शुक्र, बृहस्पति मंगल और शनि ग्रहों की खोज करने वाले कौन थे, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया Read more
बुध ग्रह
बुध ग्रह के बारे में मनुष्य को अब तक बहुत कम जानकारी है। मेरीनर-10 ही बुध ग्रह की ओर जाने Read more
बृहस्पति ग्रह
बृहस्पति ग्रहों में सबसे बड़ा और अनोखा ग्रह है। यह पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है। अपने लाल बृहदाकार धब्बे Read more
मंगल ग्रह
मंगल ग्रह के बारे में विगत चार शताब्दियों से खोज-बीन हो रही है। पिछले चार दशकों में तो अनंत अंतरिक्ष Read more
शुक्र ग्रह
शुक्र ग्रह तथा पृथ्वी सौर-मंडल में जुड़वां भाई कहे जाते हैं, क्योंकि इन दोनों का आकार तथा घनत्व करीब-करीब एक-सा Read more
चांद की खोज
जुलाई, सन्‌ 1969 को दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों नील आर्मस्ट्रांग और एडविन आल्डिन ने अपोलो-11 से निकलकर चांद पर मानव Read more
सौर वायुमंडल
सूर्य के भीतर ज्वालाओं की विकराल तरंगे उठती रहती हैं। सूर्य की किरणों की प्रखरता कभी-कभी विशेष रूप से बढ़ Read more
सूर्य की खोज
दोस्तों आज के अपने इस लेख में हम सूर्य की खोज किसने कि तथा सूर्य के रहस्य को जानेंगे कहने Read more
अंतरिक्ष की खोज
अंतरिक्ष यात्रा के बारे में आज से लगभग 1825 वर्ष पूर्व लिखी गई पुस्तक थी-'सच्चा इतिहास'। इसके रचियता थे यूनान Read more

Add a Comment