ईस्टर द्वीप की दैत्याकार मूर्तियों का रहस्य – ईस्टर द्वीप का इतिहास

ईस्टर द्वीप दैत्याकार मूर्तियां

प्रशांत महासागर की विशालता में खोया हुआ ईस्टर द्वीप और उस पर खड़े हुए ये विशालकाय पथरीले चेहरे आज सारे विश्व का ध्यान अपनी ओर बरबस खींच लेने में सफल है। आधुनिक शोधकर्ताओं ने नई नई तकनीकों का सहारा लेकर तथा अथक प्रयास करके यह तो साबित कर दिया कि ईस्टर द्वीप वासियों ने इन विशाल प्रस्तर मूर्तियों को कैसे बनाया होगा लेकिन वे यह नहीं बता पाएं है कि इन विशाल मूर्तियों को क्यों बनाया गया था। इनके पीछे क्या उद्देश्य था ? इनके निर्माता इन मूर्तियों को छोड़ कर अचानक क्यो भाग गए? क्या कभी इस द्वीप पर किसी समृद्ध समाज की बस्तियां थीं?

 

 

 

ईस्टर द्वीप पर स्थित दैत्याकार पत्थरों की खोज किसने की? यू तो इस द्वीप पर उनसे भी पूर्व कई लोग आए और गए पर सही अर्थों में ईस्टर द्वीप की खोज का श्रेय एक अंग्रेज महिला कैथरीन राउटनज (Katherine Routledge) को दिया जाता है। इन्होंने सन 1914-15 में प्रशांत महासागर में स्थित ईस्टर द्वीप की यात्रा की और संसार को इसकी विचित्रता से परिचित करवाया। यह द्वीप सन्‌ 1888 से चिली के कब्जे में है। इस पर 3 ज्वालामुखी पर्वत हैं। द्वीप को देख कर लगता है कि किसी युग में इस द्वीप पर अवश्य हरियाली रही होगी तथा लकड़ी देने वाले वृक्ष खड़े रहे होंगे। आजकल इस पर न तो वृक्ष दिखाई देते है और न ही बहते हुए पानी के स्रोत। हां बड़े-बडें गड्ढों में बनी झील अवश्य दिखाई पड़ती हैं। दक्षिणी समपतापीय मंडल के उत्तरी किनारे पर स्थित 45 वर्ग मील लम्बे चौडे इस द्वीप का तापमान 72° फा° रहता है तथा इस पर 50 इंच औसत वार्षिक वर्षा होती है। ईस्टर द्वीप के प्राचीन निवासी इसे पृथ्वी की नाभि कहते थे।

 

ईस्टर द्वीप की दैत्याकार मूर्तियों का रहस्य व ईस्टर द्वीप का इतिहास हिंदी में

 

ईस्टर द्वीप को आज अपनी इन विशेषताओं के कारण नही जाना जाता वरन् इस द्वीप पर खडे हुए 2 से 5 फुट तक ऊंचे तथा 20-20 टन वजनी ज्वालामुखी पत्थरों को तराशकर बनाए गए विशालकाय चेहरों के कारण जाना जाता है। इन चेहरों को माआई (Moi) कहा जाता है। 1000 से भी ऊपर इस तरह के विशाल चेहरे खोजें जा चुके है जो कभी वेदियों पर जिन्हें वहां की भाषा में आहु (Ahu) कहते हैं। अधीष्ठित रहते थे। इनमे सबसे बडा 32 फुट लम्बा और 90 टन भारी है। इस द्वीप पर इससे भी दोगुने बड़े पत्थर के अधबने अनेकों चेहरे पाए जा चुके हैं। आखिरकार ये चेहरे किसके प्रतीक हैं? इन्हे किसने बनाया? इनका क्या उद्देश्य था? इनकी विशालता का क्‍या रहस्य है? इतने बडे-बडे पत्थर कैसे खडे किए गए होगे? इन्हे खड़ा करने के लिए लकड़ी कहा से आई होगी? इन प्रश्नों का उत्तर आज तक नहीं मिल सका है। यही ईस्टर द्वीप का रहस्य है। जो आज तक अनसुलझा है।

 

 

 

सन्‌ 1722 के इस्टर रविवार को इस द्वीप पर एक होलैंड वासी अन्वेषक जेकब रॉगीवीन (Jacob Roggeveen) ने अपने कदम रखे और इसीलिए इसका नाम इस्टर द्वीप पड गया। जेकब का ख्याल था कि ये विशाल चेहरे चिकनी मिट्टी से बनाए हुए बुत है। उसने देखा कि इस द्वीप के निवासी थोडी बहुत खेती करके अपना गुजारा कर लेते हे। वे झोपड़ियों में रहते हैं तथा उन्होंने अपने कानों को छेद करके अपने कधों तक लटका लिया है।

 

ईस्टर द्वीप दैत्याकार मूर्तियां
ईस्टर द्वीप दैत्याकार मूर्तियां

 

सन्‌ 1770 मे स्पेनवासी फलिप गाजालेज (Felip Gonzalez ) ने ईस्टर द्वीप की यात्रा की। 4 साल बाद विख्यात अंग्रेजी अन्वेषक जेम्स कुक भी इस द्वीप पर पहुंचे तथा सन्‌ 1768 में फ्रांसीसी एडमिरल जीन फ्राकाइस ला पराउस (Jean Francois La Perouse) के जहाज इसके तट पर आकर रुके। इन अन्वेषकों ने द्वीप पर बहुत कम दिन बिताए और इस विषय में उनका अनुसंधान भी बहुत अपर्याप्त रहा। 18वी शताब्दी में इन अन्वेषकों को द्वीप पर 3 से 4 हजार के बीच जनसंख्या मिली जिसमें नर-मास का भक्षण करना सामान्य था। ईस्टर द्वीप के कबीले लगातार एक दूसरे से लडते रहते थे। शायद इसी काल मे युद्धरत द्वीप वासियों ने बहुत-सी दैत्याकार प्रतिमाएं अपनी वेदियों से गिरा दी होगी तथा इनके पत्थरो को
तोड-फोड डाला होगा। 19वी शताब्दी का मध्य होते-होते द्वीपवासियों ने लगभग सभी प्रतिमाएं जमीन पर गिरा दी थी।

 

 

 

19वी शताब्दी में ही यूरोपियना ने इस्टर द्वीप पर आ कर यहां के पिछड़े निवासियों को दास बनाना प्रारम्भ किया। सन 1805 में नेंसी (Nancy) नामक अमेरिकन जहाज में 22 द्वीप वासी दास बना कर ले जाए गए। फिर सन्‌ 1859 व 1862 के बीच 1000 द्वीपवासियों को दास बना कर ले गए। इनमें कई द्वीपवासी
अपने दशीय कलाकौशल में निपुण हाने के कारण द्वीप में गणमान्य थे। उन्ही के साथ उनका ज्ञान भी चला गया। इनमे से कुल 100 द्वीप वासी बचाए जा सके, जिनमें से 15 जीवितावस्था में द्वीप वापिस पहुंच गए। वे अपने साथ चेचक जैसी बीमारियां भी लाए थे जिससे द्वीप की जनसंख्या और भी कम हो गई। सन्‌ 1877 तक द्वीप पर कवल 111 मूल निवासी बच पाए थे। भयानक गरीबी में रह रहे इन मूल निवासियों का उद्धार करने के लिए कुछ समय बाद ही चिलीवासी तथा ईसाई मिशनरी इस द्वीप पर पहुंचे। तभी से यह द्वीप चिली के प्रभुत्व में माना जाता है।

 

 

 

यही से इस्टर द्वीप की रहस्यमय प्रतिमाओं के बारे में शेष विश्व की रुचि प्रारम्भ हुई। अमेरिका के डब्ल्यू ज थामसन (W J Thompson, 1886), इंग्लैंड की केथरीन राउटलज (Katherine Routledge, 1914-15) फ़्रांस के अल्फ्रेड मेट्राक्स (Alfred Metraux) व बेल्जियम के हेनरी लवशरी (Henri Lavachery, 1934-35 ) जर्मन मिशनरी सबाशियन एगलेट (Sabastian Englert, 1935-39) नार्वे के थार हरदाल (Thor Heyrdahl, 1955-56) तथा अमेरिकी मानव विज्ञानी विलियम मुलाय (William Mulloy) ने ईस्टर द्वीप की विलुप्त सभ्यता के बारे में अध्ययन करके काफी जानकारी एकत्रित की है। इन्ही के प्रयासों सं जमीन पर लुढ़के हुए तमाम चेहरों को अपनी जगह खडा किया गया।

 

 

द्वीप के दक्षिणी भाग पर स्थित राना राराक (Rano Raraku) नामक ज्वालामुखी के ढलानों पर लगभग 3 सौ ऐसी दैत्याकार मूर्तियां पड़ी हुई है जो या तो चेहरों की आकृति प्राप्त कर चुकी थी या करने वाली थी। इन्ही के पास पत्थर की खादनी (Picks) और गतियां (Adzes) पड़ीं हुई हैं जो यह बताती है कि द्वीप के
शिल्पकारों को जल्दबाजी में अपना काम छोड़कर वहा से भागना पडा होगा। इसी जवालामुखी के आस-पास 100 दैत्याकार मूर्तियां खडी हुई है। इनमे से कुछ के ऊपर शरीर पर किए जाने वाले गोदने (Tatoo) जैसे प्रतीक चिहन है। जाहिर हैं कि ये 100 बुत ईस्टर द्वीप की शिल्पकला की अंतिम उपलब्धियां हैं। इन 100 मूर्तियों की आंखे पूरी तरह नही बनाई जा सकी है, इसलिए इन्हे ‘अंधा मोआई कहा जाता है। द्वीप के रहस्यमय शिल्पकार अपनी कृतियों की आंखें तब बनाते थे. जब उन्हें वेदियों पर खडा कर दिया जाता था। द्वीप पर 300 से अधिक प्रतिमाएं शिल्प की दृष्टि से सम्पूर्ण हो चुकी है। इन्हें विभिन्न शैलियों में बनाया गया है।

 

 

द्वीप पर पुजारी का घर, रिहायशी गूफाए तथा लकड़ी के खुदे हुए आभूषण भी मिलते हैं। समझा जाता है कि ईस्टर द्वीप के आरजो नामक ग्राम में किसी युग में पक्षी-मानव (Bird Man) चुनने की प्रथा भी चलती थी। साल में एक बार सभी कबीले वाले यहां एकत्रित होते और अपने सबसे शक्तिशाली युवक की कठोर
परीक्षाएं लेकर उसे ‘पक्षी-मानव’ चुनते थे।

 

 

प्रश्न यह है कि वे लोग कौन थे, जिन्होंने इन तमाम शानदार और दर्शनीय चीजों का निर्माण किया। कुछ लोगों का कहना यह है कि खोई हुई सभ्यता का प्रतीक है। कुछ अन्य का कहना है कि एक युग में इस द्वीप पर बाह्य अंतरिक्ष के प्राणी बसे थे तथा कुछ व्यक्ति इसका संबंध मिस्रियों से जोड़ते हैं। आधुनिक विद्वानों का निष्कर्ष यह है कि इन दैत्याकार मूर्तियों के निर्माता पोलीनेसियन (Polynesian) लोग थे।

 

 

 

ईस्टर द्वीप की ही एक दंतकथा के अनुसार लडाई में हार कर भागे हुए होतु मुता (Hotu Muta) नामक पोलीनेसियन कंबीले का मुखिया नए राज्य की तलाश मे इस द्वीप पर आया था। होतु मुता अपने साथ कई तरह की वनस्पतियां वृक्ष तथा जीव-जंतु लाया। पोलीनेसिया तथा नई दुनिया के बीच संबंध को स्थापित करन के लिए थोर हेरदाल ने पोलीनेसिया के पेरू स्थित टुआमाटो (Tuamato) द्वीप समूह से एक साधारण बजरे पर तैरते हुए ईस्टर द्वीप तक यात्रा करके दिखाई। थोर के विचारो और निष्कर्षों से बहुत लोग असहमत हैं। हां, अब इतना अवश्य मान लिया गया है 690 ईस्वी मे पश्चिम से समुद्री यात्रा करके आए हुए यात्री ही ईस्टर द्वीप के पहले वासी बन थे।

 

 

अब इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि 1110-1205 ईस्वी के बीच तथा 1650 ईस्वी तक द्वीपवासी विशाल दैत्याकार मूर्तिया और उनकी वेदियां बनाते रहे। उस समय द्वीप पर हानाऊ ईपे (Hanau Epe) के नेतृत्व वाला गुट राज्य करता था। जब इस गुट के अत्याचारों से उकता कर हानाऊ मोमोको (Hanau Momoko) के गुट ने विद्रोह कर दिया तो शासकों का दल पोइक (Poike) ज्वालामुखी के ढलान पर भाग गया। और वहां एक बंकर (Trench) खोद कर मोर्चा बांध लिया। बंकर के अवशेष आज भी यहां मिलते हैं।

 

 

द्वीपवासियों ने उन विशालकाय दैत्याकार पत्थरों को सरकाया कैसे होगा। इसका पता इस अनुमान से लगाया जा सकता है कि उस समय द्वीप की जनसंख्या कम से कम 20000 अवश्य रही होगी। यिलियम मलाय के अनुसार इन दैत्याकार पत्थर की मूर्तियों को लकड़ी का तना काट कर बनाई गई सेज पर रखकर इधर उधर किया गया होगा। इस सेज को धीरे-धीरे घास की ढकी सड़क पर रस्सियों की सहायता से खिसकाया गया होगा।

 

 

 

मलाय ने यह सिद्धांत रचने के अलावा भी ईस्टर द्वीप की मूर्तियों के बार में वही के बचे खुचे निवासियों के साथ कई प्रयोग किए जिससे उन्हें इन मूर्तियों के पीछे छिपी हुई शिल्पकला की जानकारी हो सकी। उन्होंने अनुमान लगाया कि एक भारी कृति को द्वीपवासी लकड़ी की सेज की सहायता से प्रतिदिन 1000 फुट सरका पाते होगे और लकडी के फ्रेमों की सहायता से उन्हें वेदियों पर चढाते होगे।

 

 

 

कुल मिला कर अभी तक इतनी जानकारी मिलने के याद भी यह पता नहीं चल पाया है कि द्वीपवासियों को इतनी बड़ी बड़ी मूर्तियों की क्या आवश्यक्ता थी? ईस्टर द्वीप की सभ्यता कैसे नष्ट हुई? क्‍या उसके कबीलों में गृह-युद्ध होने के कारण ऐसा हुआ था? क्‍या जनसंख्या अधिक बढ़ जाने के व आर्थिक संकट के कारण इन दैत्याकार मूर्तियों के निर्माता नष्ट हो गए? चूंकि कोई संस्कृति बिना दो सभ्यताओं में सांस्कृतिक आदान-प्रदान के विकसित नही हो सकती, इसलिए यह भी प्रश्न उठता है कि प्रशांत महासागर के इस एकांत द्वीप की संस्कृति कैसे विकसित हुई होगी। ईस्टर द्वीप के रहस्यमय और विशालकाय चेहरे उदास निगाहों मे आज भी क्षितिज की ओर देख रहे है। उनकी उदासी की वजह है उनका अनखूुला रहस्य! पुरातत्वशास्त्रियों का सतत्‌ प्रयास यह आशा जगाता है कि एक न एक दिन इन पत्थर प्रतिमाओं की सही-सही परिभाषा विश्व को जरूर मिलगी।

 

 

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