इंदौर राजवाड़ा का इतिहास – इंदौर राज्य का इतिहास

इंदौर राज्य

इंदौर राजवाड़ा का इतिहास — सभी पाठक जानते है कि औरंगजेब के भीषण अत्याचारों के खिलाफ़ महाराष्ट्र में एक महाप्रबल शक्ति का उदय हो रहा था। इस शक्ति के अलौकिक और दिव्य प्रकाश ने तत्कालीन भारत वर्ष को चकाचौंध कर दिया था। औरंगजेब ने अपनी अमानुषिक निष्ठुरता ओर प्रबल धर्मांधता के कारण हिन्दू संसार के हृदयाकाश में जो काला और अन्धकार पूर्ण मेघमंडल उपस्थित कर दिया था, उसको इसी शक्ति की प्रकाशमान किरणों ने छिन्न-भिन्न कर दिया। कहना न होगा कि इस शक्ति के उदय ने समस्त निराश हिन्दू ह्रद॒यों में नवीन ज्योति, नवीन आशा, नवीन स्फूर्ति और नवीन बल का अद्भुत संचार कर दिया था। इस शक्ति ने मृतप्राय हिन्दू-धर्म में चैतन्य और सजीवता की अद्भुत ज्योति प्रकट की थी। इस शक्ति के अन्तर्गत महामना साधु रामदास सरीखे महान तपस्वी ओर महान्‌ योगी-जनों की लोकोत्तर प्रेरणा काम कर रही थी। यह शक्ति हिन्दू संस्कृति और हिन्दूधर्म के अभ्युदय के लिये ईश्वरीय प्रेरणा से प्रकट हुई जान पड़ती थी। इस दिव्य शक्ति का उदय महाराष्ट्र देश में शिवाजी नामक एक युवक के शरीर में हो रहा था। महामना शिवाजी ने हिन्दू धर्म-द्रोही और हिन्दू सभ्यता तथा हिन्दू राष्ट्र का नाश करने पर कमर बाँधे हुए औरंगजेब के खिलाफ उठ कर हिन्दूधर्म, हिन्दू सभ्यता और हिन्दू संस्कृति की रक्षा के लिये एक महान्‌ हिन्दू साम्राज्य की जिस प्रकार नींव डाली थी, उस पर लिखने के लिये यहाँ विशेष स्थान नहीं है। इस संबंध में केवल इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि बड़ी बड़ी शक्तियां इस महान साम्राज्य से आतंकित थीं। स्वयं औरंगजेब ने इस महान साम्राज्य के संस्थापक महाराज शिवाजी के बारे में लिखा था-“वह (शिवाजी) एक महान सेनानायक है ओर वही ऐसा एक पुरुष है जो नया साम्राज्य स्थापित करने की प्रतिभा रखता है। में भारत वर्ष के प्राचीन राज्यों को नष्ट करने का प्रयत्न कर रहा हूं, मेरी फौजें गत 19 वर्षों से शिवाजी की शक्ति का नाश करने में लगी हुई हैं, पर उसका राज्य दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। मतलब यह कि शिवाजी की शक्ति को घमंडी औरंगज़ेब ने मुक्त-कण्ठ से स्वीकार किया था या दूसरे शब्दों में यूं कहिये कि इस शक्ति के सामने औरंगजेब की रूह कांपती थी, क्योंकि उस समय उसने देखा था कि शिवाजी के उदय के साथ साथ देश में राष्ट्रीय आत्मा का अद्भुत रूप से विकास हो रहा है और हिन्दू हृदय में हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने के विचार का संचार हो रहा है। हिन्दूधर्म के उदय के चिन्ह प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होने लग गये थे और महाराष्ट्र शक्ति की प्रबलता के साथ साथ हिन्दू भावनाओं में एक प्रकार के बिलक्षण बल का आविर्भाव होने लग गया था। मि० रेसजे म्यूर अपने Making of British India नामक ग्रन्थ में लिखते हैं:— “आर्थर वेलेस्ली की यह बात बिलकुल सच है कि महाराष्ट्र शक्ति ही एक ऐसी शक्ति थी जिसका बल राष्ट्रीय भावनाओं से बढ़ा था। धार्मिक दृष्टि से वे हिन्दू थे और यही कारण है कि उनकी ताकत बिजली की गति की तरह सारे देश में फेल गई थी। उनके उदय के पहले सब बड़ी शक्तियां मुसलमान थीं।” महाराष्ट्र इतिहास के सर्वोपरि जानकर श्रीयुत राजबाड़े महोदय लिखते हैं:— “हिन्दूधर्म की प्रस्थापना, गो ब्राह्मण का प्रतिपाल, स्वराज्य की स्थापना, मराठों का एकीकरण और उनका नेतृत्व आदि महाराष्ट्र धर्म के मुख्य तत्व ओर उनके प्रतिबिम्ब जिस प्रकार शिवाजी महाराज की युवावस्था में दृष्ठिगोचर होते हैं, वैसे ही खरड़ा की लड़ाई के बाद नाना फड़नवीस ने निज़ाम के साथ जो सन्धि की उसमें भी उसका दिग्दर्शन होता है।” इन सब बातों से पाठकों को ज्ञात हुआ होगा कि महाराज शिवाजी करोड़ों हिन्दुओं के हिन्दुत्व की रक्षा करने की पवित्र भावनाओं से प्रेरित होकर एक महान साम्राज्य की नींव डालने में प्रवृत्त हुए थे। कहना न होगा कि इसकी नींव महाराज ने सफलता पूर्वक डाली और उस पर वीर शिरोमणि बालाजी विश्वनाथ, बाजीराव प्रथम, बालाजी बाजीराव और महान माधवराव बल्‍लाल ने एक जबरदस्त साम्राज्य रूपी इमारत खड़ी कर दी। इंदौर राज्य के होल्कर इसी महान महाराष्ट्र साम्राज्य के एक अत्यन्त प्रकाशमान रत्न थे। होल्कर राज्य के मूल संस्थापक मल्हारराव होल्कर का उदय महाराष्ट्र साम्राज्य के प्रकाशमान दिनों में ही हुआ था। नवयुवक मलहार राव ने महान पेशवा बाजीराव से महाराष्ट्र धर्म का पवित्र मन्त्र सीखा था। इसका यह प्रभाव था कि होल्कर राजवंश हमेशा से स्वतन्त्रता और आत्म-सम्मान आदि उच्च गुणों का पुजारी रहा है। अगर सूक्ष्म दृष्टि से होल्कर राज्य के सच्चे इतिहास का अवलोकन किया जाये तो यह प्रतीत हुए बिना न रहेगा कि भारत वर्ष के इतिहास में इस गौरवशाली राजवंश ने स्वतन्त्रता, स्वाधीनता ओर राष्ट्र सम्मान की रक्षा के लिये जो जो महान कार्य किये थे, वैसे कार्य बहुत कम राजवंशों ने किये होंगे। राष्ट्रीय दृष्टि से, साम्राज्य संगठन की दृष्टि से, तथा समय सूचकता और राजनीतिज्ञता की दृष्टि से, होल्कर राजवंश का इतिहास प्रायः अद्वितीय है। हम तो बड़े अभिमान के साथ यों कहगें कि मल्हारराव, तुकोजीराव प्रथम, प्रात:स्मरणीया अहिल्याबाई तथा तुकोजीराव द्वितीय-इनके नाम भारतवर्ष के इतिहास के पन्नों को तब तक शोभायमान करते रहेंगे जब तक कि संसार में हिन्दू वीरत्व, स्वदेश भक्ति, राज्य-संगठन का अद्भुत ससामर्थ्य तथा उच्च श्रेणी की राजनीतिज्ञता का आदर और पूजा होती रहेगी।

 

 

इंदौर रजवाड़ा का इतिहास – इंदौर राजपरिवार का इतिहास -इंदौर रियासत का इतिहास- इंदौर स्टेट हिस्ट्री इन हिन्दी

 

इंदौर का होल्कर वंश बहुत पहले वीरकर-वंश के नाम स प्रसिद्ध था। होल्कर वंश की उत्पत्ति के लिये भिन्न भिन्न इतिहासवेत्ताओं के भिन्न भिन्न मत हैं। कुछ लोग इन्हें प्रख्यात राठौड़ वंश से इनकी उत्पत्ति मानते हैं। पर इस संबंध में ओर अधिक ऐतिहासिक अनुसन्धान की अभी आवश्यकता है। अतएव हम इसके निर्णय का भार भावी इतिहास वेत्ताओं पर छोड़ कर आगे बढ़ते हैं।होल्कर राजघराने के पूर्वज गोकुल ( मथुरा ) के रहने वाले थे। उनकी जाति धनगर थी। मथुरा से आकर वे पहले पहल चित्तौड़ में बसे। चित्तौड़ से वे दक्षिण के औरंगाबाद जिले में जा बसे ओर कुछ अरसे तक वहाँ रहे। इसके बाद वे पूना से 40 मील पर पुल्टन परगने में, नीरा नदी के किनारे बसे हुए होलगाँव में रहने लगे। होलगाँव में बस जाने ही के कारण इस वंश का नाम होल्कर पड़ा । पहले इस वंश का नाम जैसा हम ऊपर कह चुके हैं वीरकर था। होल्कर राज्य को जन्म देने का यश मल्हारराव को है। इनका जन्म 1694 के अक्तूबर मास में हुआ। इनके पिता का नाम खण्डूजी था। खण्डूजी होलगांव के चौगुले अर्थात् सहायक पटेल थे। वे खेती आदि से अपनी गृहस्थी चलाते थे। मल्हराराव उनके एकलौते बेटे थे। वे मल्हारराव को चार पाँच वर्ष की अनजान अवस्था में छोड़ परलोकवासी हुए। इसके बाद मल्हारराव की माता अपने भाई बन्धुओं के झगड़ों से तंग आकर अपने भाई भोजराज बारगल के यहाँ चली गई। भोजराज खानदेश के तल्लोदा नामक गाँव के जमींदार थे। जब मल्हारराव कुछ बड़े हुए तब उनके मामा ने उन्हें भेड़ें चराने का काम सौंपा। मल्हारराव कई दिन तक यह काम करते रहे। इसी बीच में एक चमत्कारिक घटना हुईं जिससे मल्हारराव के समुज्ज्वल भविष्य पर प्रकाश पड़ा। कहा जाता है कि एक समय सूर्य की कड़ी धूप से घबराकर मल्हारराव रास्ते में सो रहे थे। ऊपर से सूर्य भगवान अपनी सहसू किरणों से अग्नि बरसा रहे थे। इतने में एक भुजंग वहाँ आया और उसने मल्हारराव के मुखमण्डल पर अपने फन से छाया कर दी। जब मल्हारराव उठे तब उन्होंने देखा कि एक वृहदाकार भुजंग सूर्य की धूप से उनकी रक्षा कर रहा हैे। यह अनूठा हाल भोजराज के कानों तक पहुँचा। उन्होंने इन्हें भाग्यवान समझ इनसे भेड़ व बकरियाँ चराने का काम लेना बन्द कर दिया। उन्होंने अपनी 25 सवारों की सेना में, जो सरदार कदमबांड़े की सेवा में तैनात रहती थी, इनको भी भर्ती कर लिया। इन्होंने फौज में भर्ती होने पर बहुत जल्द अपने में सिपाहियों के गुण सिद्ध कर बताये। इन्होंने एक लड़ाई में निजाम-उल-मुल्क के एक सरदार का सिर बड़ी ही वीरता से काटा। इस वीरता से उनका नाम बहुत बढ़ गया। इनके मामा भोजराज ने प्रसन्न होकर अपनी लड़की गोतमाबाई का विवाह इनके साथ कर दिया।

 

होलकर साम्राज्य का इतिहास

 

इसके कुछ समय बाद प्रथम बाजीराब पेशवा ने इनको सरदार कदमबांडे से माँगकर 500 घुड़सवारों का सेना-नायक नियुक्त किया। इसी समय निजाम उल मुल्क दिल्ली के बादशाह से स्वतन्‍त्र होकर अपने राज्य की स्थिति मजबूत करने में लगा हुआ था। दिल्ली के तत्कालीन मुगल सम्राट ने इससे भय खाकर मालवे का चार्ज राजा गिरधर को सौंप दिया था। इसी राजा गिरधर से मराठों का किस प्रकार मुकाबला हुआ और विजयी मराठों ने किस प्रकार मालवा पर अपनी राज-सत्ता कायम की इसका विस्तृत वर्णन आगे दिया जाता है।

 

इंदौर राज्य
इंदौर राज्य

 

 

मराठों का मालवा विजय

 

हम ऊपर कह चुके है कि छत्रपति महाराज शिवाजी ने संसार में
हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म का विजयी डंका बजाने के लिये भारत वर्ष में एक महान हिन्दू साम्राज्य की नींव रखी थी और उन्हीं के वीर वंशज इसका विस्तार करने में तन, मन, धन से लगे हुए थे। यहाँ यह दुहराने की आवश्यकता नहीं कि तत्कालीन मुगल शासन के वीभत्स अत्याचारों से लक्षावधि हिन्दू जनता में त्राहि त्राहि मची हुई थी। हिन्दू जनता बे तरह हैरान थी और वह मुगल शासन से अपना छुटकारा करना चाहती थी। मालवा की जनता भी मुगल शासन के अत्याचारों से बहुत दुखी थी। इससे वीर मराठों को हिन्दू साम्राज्य की कल्पना को मृत स्वरूप देने में विशेष सफलता हुई। अन्य प्रान्तों की तरह उन्‍होंने आर्य सभ्यता और आर्य संस्कृति के मुकुटमणि कहलाने वाले तथा महाराजा विक्रमादित्य और महाराजा भोज का वास स्‍थान मालव देश को मुगल शासन से छुड़ा कर महाराष्ट्र साम्राज्य में सम्मिलित करने का निश्चय किया। उन्होने मालवा के महत्वपूर्ण प्रवेशद्वारों पर सहज ही में अधिकार कर लिया। यह कार्य वीरवर मल्हारराव होल्कर तथा पँवार आदि सरदारों ने किया।

 

 

सर जॉन माल्कम महोदय कहते हें कि औरंगजेब के साथ युद्ध शुरू होते ही उस तंग करन के उद्देश्य से मराठों ने मालवे पर आक्रमण करने शुरू कर दिये। सन् 1690 के एक पुराने पत्र से मालूम होता है कि मराठों के आक्रमण के कारण उस साल मालवे की पैदावार में बहुत कमी हो गई थी। औरंगजेब के अत्याचारों से तंग आकर कई राजपूत राजा उसके शत्रु को मदद करने लगे थे, और यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इन्हीं राजपूत राजाओं की सहायता और प्रेरणा से मराठों ने मालवे में प्रवेश किया था। सन् 1698 में ऊदाजी पवाँर ने मालवा में प्रवेश कर माण्डवगढ़ में मराठों का विजयी का झंडा फहराया था। पर उस समय वे वहाँ राज्य कायम न कर सके थे। जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह का मुगल दरबार सें बड़ा प्रभाव था। पर उस समय हिन्दुओं पर जो अत्याचार होते थे उन्हें उनका अन्तः करण सहन नहीं कर सका था। वे भीतर ही भीतर बड़ी चतुराई के साथ मुगल शासन की नींव उखाड़ देने का पड़यन्त्र रच रहे थे। उनकी प्रेरणा से मालवे के जमींदार व बुन्देल राजपूत औरंगजेब के अत्याचारों को स्मरण कर मराठों के अनुकूल हो गये थे। बाजीराव का अतुलनीय पराक्रम देखकर लोग उन्हें अपना नेता मानने लगे थे और बाजीराव के प्रधान सहायक होल्कर, सिन्धिया और पवार की बहादुरी और राजनीतिज्ञता के कारण मालवा विजय में बड़ा सुभीता हुआ। दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि मालवा विजय का श्रेय प्रधान रूप से मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिन्धिया और ऊदाजी पँवार को था। मुगल बादशाही के पतनकाल में जुदा जुदा प्रान्तों के शासक किसी न किसी उपाय से स्वतन्त्र होने का प्रयत्न कर रहे थे। इस परिस्थिति का लाभ बाजीराव तथा मल्हारराव होल्कर आादि महानुभावों ने बहुत ही अच्छी तरह उठाया। मालवे के तत्कालीन शासक गिरघर बहादुर व दया बहादुर का उद्देश भी स्वतन्त्र राज्य स्थापित करने का था, पर इसमें वे सफल न हो सके। इसका कारण यह था कि वे बड़े अत्याचारी थे। प्रजा उनसे बहुत तंग थी। राजजपूत और मराठों से उनकी तनिक भी नहीं पटती थी। उनकी ओर जनता का मनोबल ( Moral force ) बिलकुल नहीं था और यह एक राजनीति का सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जिस शासन के खिलाफ संगठित जनमत है वह एक न एक दिन बालू की दीवाल की तरह गिर पड़ता है। महाराज जयसिंह जी भी इनसे बड़े नाराज थे और उन्हें यह बात बहुत बुरी लगी थी कि ये लोग हिन्दू होकर हिन्दुओं पर अत्याचार कर रहे हैं। इसलिये उन्होंने खास तौर से मराठों को मालवा में निमन्त्रित किया। मालवे के प्रधान जमीदार नन्दलाल मण्डलोई दया बहादुर के अत्याचारों से तंग आ गये थे। इसलिये उन्होंने भी मराठों को खुले हाथ से सहायता दी। सुप्रख्यात इतिहास लेखक श्रीयुत देसाई का मत है कि नन्दलाल को वश करने का काम मल्हारराव होल्कर ने प्रधान रूप से किया था। नन्दलाल के साथ जयपुर के महाराज जयसिंह जी का भी अच्छा स्नेह था। सन् 1720 के बाद मल्हारराव होल्कर और नन्दलाल के बीच जो पत्र-व्यवहार हुआ था उससे प्रतीत होता है कि होल्कर ने मालवा विजय करने का प्रयत्न बालाजी विश्वनाथ की मौजूदगी में शुरू कर दिया था। वे इसके लिये अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न कर रहे थे। मुगल शासन तथा मुगल सम्राट के हाकिमों के खिलाफ़ जितनी शक्तियाँ थी उनका उन्‍होंने बड़ी अच्छी तरह संगठन कर लिया था। इन शक्तियों से मल्हारराव ने मैत्री का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। इस समय मल्हारराव तथा उनके अन्य कुछ सहयोगियों ने जिस नीति का अवलम्बन किया था उससे यह स्पष्ट प्रकट होता था कि वह न केवल ऊँचे दर्जे के वीर ही थे पर राजनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने प्राप्त अवसर से बड़ी ही स्फूर्ति के साथ लाभ उठाया जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं। जयपुर के महाराज सवाई जयसिंह जी तथा इंदौर के तत्कालीन प्रभावशाली व्यक्ति नन्दलाल जी मण्डलोई तो इनकी ओर थे ही पर इनके द्वारा उन्होंने मालवा के अन्य छोटे मोटे जागीरदारों को भी अपने पक्ष में मिला लिया था। इससे मालवा-विजय में उन्हें सफलता हुईं। अब हम
उन युद्धों का थोड़ा सा वर्णन करते है जो मालवा विजय के लिये मराठों को करने पड़े थे।

 

 

सारंगपुर का युद्ध ( सन् 1724 )

 

मालवा विजय के लिये मराठों को जो सब से पहला युद्ध करना पड़ा वह सारंगपुर का युद्ध था। यह युद्ध मालवा के तत्कालीन मुगल प्रतिनिधि राजा गिरधर के साथ हुआ था। यहाँ पर राजा गिरधर के विषय में दो शब्द लिख देना अनुचित न होगा। तत्कालीन मुगल सम्राट के दरबार में स्वपराक्रम से जिन थोड़े से हिन्दू मुसद्दियों ने प्रख्याति प्राप्त की थी उनमें से राजा गिरधर भी एक था। यह अलाहाबाद का निवासी था। इसने मुगल सम्राट की बड़ी बड़ी सेवाएँ की थीं। जब सम्राट ने यह देखा कि निज़ाम-उल मुल्क की लोभी दृष्टि मालवा पर गिरना चाहती है तब उन्होंने राजा गिरधर को मालवे का सूबेदार नियुक्त कर दिया। इस नियुक्ति में पहले पहल जयपुर के महाराज सवाई जयसिंहजी तथा जोधपुर कि महाराज अजीत सिंह जी का भी हाथ था। अव्र्हिन लिखता है कि “वास्तविक रूप से तो सम्राट ने मालवा और आगरा प्रान्त की व्यवस्था जयसिंह के ही सिपुर्द की थी पर आगरा प्रान्त जयपुर के पास होने से वहाँ की शासन-व्यवस्था तो स्वयं महाराज जयसिंह जी देखने लगे ओर मालवा की शासन-व्यवस्था के लिये उन्होंने राजा गिरधर को भिजवाया। पर गिरधर जयसिंह जी की मंशा के खिलाफ आचरण करने लगा। जयसिंहजी को पहले पहल यह आशा थी कि गिरधर हिन्दू होने से हिन्दुओं पर अत्याचार न करेगा, पर उनकी यह आशा निराशा में परिणत हो गई। राजा गिरधर ने हिन्दुओं पर जुल्म करना शुरू किया। उसके जुल्मों से हिन्दू प्रजा और हिन्दू जागीरदार सब के सब तंग आ गये। यह बात हिन्दू-धर्म प्रेमी महाराजा जयसिंह जी को अच्छी न लगी। उन्होंने नन्दलाल मण्डलोई की माफ़त बातचीत कर मराठों को मालवा में निमन्त्रित किया। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि महाराष्ट्र फौजों ने मालवे पर कूच किया। सन् 1724 में राजा गिरधर और मराठों के बीच सारंगपुर मुकाम पर एक भीषण युद्ध हो गया। इसमें मल्हारराव होल्कर और चिमाजी आपा का प्रधान हाथ था। इसमें राजा गिरधर मारा गया, मराठों की विजय हुईं ओर मालवा-विजय का प्रथम दृश्य समाप्त होकर दूसरे दृश्य का आरम्भ हुआ।

 

 

तिरला की लड़ाई

 

राजा गिरधर के पतन के बाद अगले दो वर्ष तक बाजीराव पेशवा तथा मल्हारराव होल्कर प्रभृति महानुभावों का ध्यान निजाम की ओर झुका। पेशवा ने मालवा से अपनी सेना वापस बुला ली। दिल्ली के तत्कालीन मुगल सम्राट ने दया बहादुर को गिरधर के स्थान पर मालवा का शासक नियुक्त किया। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इन सब युद्धों में नवयुवक मल्हारराव ने असाधारण वीरता और अलौकिक चतुरता का परिचय दिया। उन्होंने अपनी अद्भुत कारगुजारी से पेशवा को बहुत ही प्रसन्न कर लिया। पेशवा ने खुश होकर सन् 1728 में इन्हें मालवा के 12 जिले जागीर में दिये। सन 1731 में पेशवा की इन पर और भी कृपा हुईं और अबकी बार उन्होंने इन्हें मालवे का बहुत सा मुल्क दे डाला। इस समय मल्हारराव मालवे में 82 जिलों के मालिक हो गये।

सारंगपुर के युद्ध के तीन वर्ष बाद पेशवा ने अपने भाई चिमाजी और मल्हारराव के संचालन में फिर मालवे में सेना भेजी। इस समय मुगल सम्राट की ओर से दया बहादुर मालवा का शासन करता था। यह भी बड़ा जुल्मी था। मालवे के लोग इससे भी बड़े अप्रसन्न थे। सर जॉन माल्कम साहब को नन्दलाल मण्डलोई के किसी वंशज से दया बहादुर के शासन समय की जो जानकारी प्राप्त हुई थी उसके आधार से उन्होंने अपने Memories of central India part 2 में लिखा है:— “सम्राट मुहम्मदशाह के शासन काल में जब मुगल साम्राज्य के टुकड़े टुकड़े हो रहे थे और दिल्ली सम्राट की शक्ति बड़ी शीघ्रता से क्षीण हो रही थी उस समय मालवे में दया बहादुर नाम का एक ब्राह्मण सूबेदार था। उस समय मुगल साम्राज्य में जो महान अन्धाधुन्धी और भ्रष्टता फेल रही थी, उसका शान्तिमय किसानों और मजदूरों पर बड़ा ही बुरा प्रभाव हो रहा था। वे हर एक छोटे छोटे अधिकारी के अत्याचारों से बुरी तरह पिसे जा रहे थे। मालवा के ठाकुर, किसान ओर छोटे छोटे मातहत रइसों पर दयाबहादुर और उसके एजन्टों के बड़े बड़े जुल्म हो रहे थे। उन पर कई प्रकार के अमानुषिक कर लगा दिये गये थे और वे बुरी तरह लूटे जा रहे थे। इन लोगों ने दिल्ली के सम्राट के पास अपनी फ़रियाद भेजी और अपने दुःख मिटाने के लिये उनसे प्राथना की। उस समय का सम्राट मुहम्मदशाह बड़ा कमज़ोर ओर विषय-लम्पट था। वह दिन रात ऐशो-आराम में अपने आपको भूला हुआ रहता था। जब इस फ़रियाद का कोई नतीज़ा नहीं हुआ तब मालवे के राजपूत राजाओं ने अपनी आँख जयपुर के सवाई जयसिंहजी की ओर फेरी ओर उनसे अपना दुःख मिटाने की अपील की। जयसिंह जी उस समय उन अत्यन्त शक्तिशाली राजाओं में से एक थे जो बादशाह की फरमा बरदारी के लिये मशहूर थे। पर कहा जाता है कि बादशाह की कृतघ्रता से जयसिंह जी की इस राज भक्ति में बहुत कुछ कमी आ गई थी। उन्होंने ( जयसिंह जी ने ) पेशवा बाजीराव से गुप्त पत्र-व्यवहार करना शुरू किया और मुसलमान साम्राज्य को किस प्रकार उलट देना इसके मन्सूबे होने लगे। जिन मालवे के राजपूत राजाओं ने जयसिंहजी के पास अपने दुःखों की शिकायत की थी। उन्हें जय सिंह जी ने यह आदेश किया कि वे मराठों को मालवे पर आक्रमण कर मुगल शासन को उलट देने के लिये निमन्त्रित करें। राव नन्दू- लाल चौधरी उस समय एक बड़ा धनवान और प्रभावशाली जमींदार था। उसके पास पैदल और घुड़सवारों की 2000 फौज थी जिसे वह अपनी जागीर से तनख्वाह देता था। नर्मदा के भिन्न भिन्न घाटों की रक्षा का भार भी उसी पर था। इसीलिए मराठों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने ओर उन्हें मालवे के आक्रमण में सहायता करने का भार उसे सौंपा गया था। पेशवा की सेना ने बुरहानपुर के पास अपना पड़ाव डाल रखा था। यहाँ से मल्हारराव 12000 सेना को साथ लेकर आगे बढ़े। राव नन्दलाल ने अपना वकील भेजकर मालवे में प्रवेश करने के लिये उनका स्वागत किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि उनकी सेना के लिये ये नर्मदा के घाट खोल देंगे इतना ही नहीं; प्रत्युत सारे जमींदार इस आक्रमण में उनकी सहायता करेंगे। यह आश्वासन पाकर मराठो सेना आगे बढ़ी। उसने अकबरपुर नामक घाट के मार्ग से नर्मदा को पार किया। जब इस बात की खबर दया बहादुर को लगी तो उसने अपनी सेना के साथ प्रस्थान करके टांडा जाने वाले मार्ग पर पड़ाव डाल दिया। उसकी धारणा थी कि शत्रु सेना इसी मार्ग द्वारा मालवे में प्रवेश करेगी। पर उसका यह अनुमान गलत निकला। महाराष्ट्र सेना मालवे के जमींदार और प्रजागण की सहायता से बिना किसी प्रकार की बाधा के भैरव घाट के मार्ग से मालवे में आ धमकी। धार और अमझरा के बीच तिरला नामक स्थान पर इसका दया बहादुर की सेना से मुुकाबला हुआ। दया बहादुर इस युद्ध में मारा गया और उसकी सेना तितर-बितर हो गई। इसी समय से मालवे में मराठों की सत्ता स्थापित हुई। मराठों ने मालवे के प्राचीन ठाकुरों ओर जमींदारों की जागीरें उन्हीं के अधिकार में रहने दीं। उनके साथ शर्तें भी वे ही कायम रहीं जोकि उनकी मुगल सम्राट के साथ थीं। मुगल आधिपत्य में ये जमींदार जिस प्रकार चूस जाते थे अब उससे मुक्त हो गये। मुग॒लों द्वारा नियुक्त किये गये तमाम अमलदार और अधिकारी गण हटा दिये गये और उसके स्थान में मराठों के आदमियों की नियुक्ति हुई। हाँ, जिन जमींदारों ने मराठों का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया वे अपनी जागीरों से च्युत कर दिये गये और उनके स्थान में उन जागीरों का अन्य वास्तविक अधिकारी नियुक्त कर दिया गया। मराठों के आगमन से तमाम हिन्दू सरदार और जनता के दुःखों का अन्त हो गया।

 

 

मालवे पर मराठों का विजयी झंडा उड़ने लगा। अब वहा मुग़ल हुकूमत की जगह पेशवा की हुकूमत हो गई। फिर पेशवा ने मालवा को मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिन्धियां ओर परमार सरदार के बीच बांट दिया। इन महानुभावों ने बड़ी ही उत्तमता के साथ मालवे का शासन किया। सन् 1737 में पेशवा ने उत्तर हिन्दुस्तान की चढ़ाई में मल्हारराव को भी साथ लिया था। जब तत्कालीन मुगल सम्राट ने सुना कि महाराष्ट्र फौजें दिल्ली पर चढ़ आ रही हैं, तब उन्होंने निजाम को सहायता के लिये बुलाया। निजाम 3400 सेना और एक जंगी तोपखाना लेकर मुग़ल सम्राट की सहायता के लिये चले। इस समय निजाम के पास तीस हजार पैदल सेना ओर ऊँचे दर्जे का तोपखाना था। कई बुन्देले राजा भी अपनी सेना सहित आकर मिल गये थे। धामोनी ओर सिरोंज होती हुईं निजाम की सेना भोपाल के सुप्रसिद्ध तालाब के किनारे पहुँची । निजाम ने अपने दूसरे पुत्र नासिरजंग को बाजीराव पेशवा को रोकने का हुक्म दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि नासिरजंग को असफलता हुईं। सुसज्जित महाराष्ट्र सेना भी नर्मदा नदी लाँघकर निजाम के मुकाबले के लिये चल पड़ी। भोपाल मुकाम पर दोनों का मुकाबला हुआ। इसमें निजाम की सेना बुरी तरह से हारी। वह वीर मराठों के सामने अपना टिकाव न कर सकी। निजाम ने सेना सहित भाग कर पास ही के एक किले में आश्रय लिया। मराठों ने भोपाल पर घेरा डाला। इसी बीच में खबर लगी कि मुग़ल कोर्ट का एक बड़ा सरदार सफदरखाँ ओर कोटा के राजा निजाम की सहायता पर आ रहे हैं। जब मल्हारराव ने यह सुना तो उन्होंने जसवन्त राव पवार की सहायता लेकर उनका मार्ग रोका । दोनों फौजों में युद्ध हुआ। मल्हारराव की भारी विजय हुई। विपक्षी सेना के कोई 1500 आदमी काम आये। अब निजाम ने विजय की सारी आशा खो दी। भोपाल का घेरा बराबर 27 दिन तक रहा, इस बीच में निजाम सेना की बड़ी दुर्दशा हुईं। न तो उसके पास खाने का सामान रहा और न फौजी सामान। आखिर सब तरफ से मजबूर होकर निजाम ने मराठों के हाथ आत्म समर्पण किया। इस समय मराठों और निजाम के बीच जो सन्धि हुई वह मराठों की ज्वल्यमान विजय और निजाम की भारी पराजय की स्पष्ट द्योतक है। अव्हिन अपने (Latter Mughal) के दूसरे भाग पृष्ट 305 में लिखता है कि “निजाम ने अपने हाथ से बाजीराव को लिख कर दिया कि अब से सारे मालवे पर आपका अधिकार रहेगा और में आपको सम्राट से 50 लाख रुपया नकद दिलवाने की कोशिश करूँगा।” कहना न होगा कि इस विजय से मराठों का चारों ओर बोलबाला होने लगा। उनका जबदस्त दबदबा जम गया।

 

 

सन् 1739 में मल्हारराव पोर्च्युगीजों के ख़िलाफ़ चिमनाजी आपा
की सहायता करने के लिये भेजे गये। ये पोर्चुगीज़ लोग सैकड़ों वर्षों से हिन्दुओं को राक्षसी यन्त्रणाएँ दे रहे थे। मराठों ने इनके साथ युद्ध किया। मराठों की विजय हुईं। बसीन के किले पर उनकी विजय ध्वजा फहराने लगी। इस समय से मल्हारराव की कीर्ति ध्वजा दूर दूर पर फहराने लगी। सन् 1743 में बूंदी के राजा उम्मेद सिंह जी की माता ने जयपुर नरेश ईश्वरी सिंह जी के खिलाफ़ उनकी सहायता करने के लिये मल्हारराव को निमन्त्रित किया। इसका कारण यह था कि बूंदी की बहुत सी जमीन पर ईश्वरी सिंह ने अन्याय पूर्वक अधिकार कर लिया था। लखारी मुकाम पर जयपुर और मराठों की फौजों का मुकाबला हुआ। इसमें जयपुर की फौजें बुरी तरह हारी। इसके बाद मल्हारराव ने जयपुर के महाराजा से बूंदी के महाराजा के लिये उस मुल्क की सनद प्राप्त की, जिसके लिये यह सब झगड़ा बखेड़ा खड़ा हुआ था। सन् 1743 में जयपुर के माधवसिंह जी की माता ने मल्हारराव से प्रार्थना की कि वे उनके पुत्र साधवसिंह को जो राज्य का वास्तविक अधिकारी है गद्दी दिलाने में सहायता दें। उन्होंने महाराजा मल्हारराव को यह भी समझाया कि किस प्रकार इश्वरी सिंह अन्याय पूर्वक गद्दी का मालिक बन बैठा। इस पर मल्हार॒राव ते माधवसिंह को राज्य गद्दी पर बिठाने के लिये सेना सहित कूच किया। ईश्वरीसिंह ने जब मल्हारराव की चढ़ाई का समाचार सुना
तब विजय की कोई आशा न देख आत्महत्या करली। इससे माधवसिंह को राज्यगद्दी मिल गई। इस सहायता के उपलक्ष में माधवसिंह ने मल्हारराव को रामपुर, भानपुर के परगने दे दिये। इतना ही नहीं उन्होंने इन्हें साढे तीन लाख रुपया प्रति साल खिराज का देना कबूल करते हुए, 7600000 रुपया एक मुश्त भी दिया। सन् 1746-47 में मल्हारराव ने अजयगढ़, कालिंजर और जौनपुर के युद्धों में आसाधारण वीरत्व और अलौकिक कार्य पटुता प्रकट की। इससे पेशवा आप पर बहुत ही प्रसन्न हुए। आपकी बड़ी प्रशंसा होने लगी। सन् 1751 में मल्हारराव होकर कुर्की नदी के किनारे वाले युद्ध में पेशवा के साथ थे, जिसमें निजाम ने बुरी तरह शिकस्त खाई थी। इसमें भी मल्हार॒राव ने आसाधारण वीरत्व प्रकट किया था।

 

मल्हराराव होल्कर
मल्हराराव होल्कर

 

सन् 1751 में अवध का नवाब सफ़दरजंग मराठों से मिला और
उसने उनसे प्रार्थना की कि वे रोहिलों से अवध की रक्षा करें।मराठों ने यह बात स्वीकार कर ली। इस कार्य का भार विशेष रुप से मल्हारराव के सुपुर्द किया गया। अतएव रोहिलों के खिलाफ जो युद्ध हुआ, उसमें मल्हारराव ने खास तौर से भाग लिया। इस समय मल्हारराव के पास शत्रु सेना के मुकाबले में बहुत कम सेना थी। सीधी तरह से लड़ने में विजय की आशा बिलकुल नहीं थी अतएव मल्हारराव ने अपनी बुद्धि दौड़ाकर एक अजब युक्ति ढूंढ निकाली। उन्होंने कई हजार ढोर मँगवा कर उनके सींगों में इस युक्ति से छोटी छोटी जलती हुई मशालें बन्धवा दीं कि जिससे उन ढोरों को हानि न पहुँचे। फिर उन ढोरों को एक विशिष्ट दशा में भड़का दिया गया। ये ढोर जिस ओर भगकर गये उस ओर शत्रु सेना को हजारों प्रकाश चिन्ह दिखलाई देने लगे। रोहिलों ने देखा कि विपक्षयों की सेना तो अपार है, वे भयभीत होकर कर्तव्य विमूढ़ हो गये। वे प्रकाश चिन्हों की ओर देखने लगे। पीछे से मल्हारराव ने अन्धेरे में शत्रु पर एकाएक हमला कर दिया। बस रोहिले घबरा गये। वे बेतहाशा होकर इधर उधर भागने लगे। इस वक्त शत्रुओं का बहुत सा सामान मल्हारराव के हाथ लगा। सन्‌ 1752 में मल्हारराव का निजाम के साथ भालकी मुकाम पर फिर युद्ध हुआ। इसमें भी निजाम की हार हुई।

 

 

सन् 1754 में मराठों ने भरतपुर के राजा पर जो चढ़ाई की थी, उसमें भी मल्हारराव का खास हाथ था। इस चढ़ाई का कारण यह था कि भरतपुर के राजा ने सम्राट आलमगीर के लिये दूसरे के खिलाफ़ वजीर शुजाउद्दौला को सहायता दी थी और मुगल सम्राट के प्रधान सेनापति नज़फ़खाँ ने भी अपने दुश्मनों से बदला लेने के लिये मराठों को निमन्त्रित किया था। मराठों ने भरतपुर राज्य के कुँभेर नामक किले पर घेरा डाला। इस घेरे में मल्हारराव के पुत्र खण्डेराव विपक्षी सेना की तोप के गोले से मारे गये। इससे मल्हार राव आग बबूला हो गये। उनका खून उबल उठा। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि में भरतपुर के किले को जमींदोज करके उसके सारे सामान को जमना नदी में फिंकवा दूंगा। इससे भरतपुर के राजा भयभीत हो गये। उन्होंने सुलह के लिये प्रार्थना की। उन्होंने मल्हार॒राव के गुस्से को शान्त करने के लिये 75000 रु० प्रति साल की आमदनी के 5 गाँव दिये, जिससे कि खण्डेराव की छत्री का खर्च चलता रहे। सन् 1756 में मल्हारराव ने उस लड़ाई में भाग लिया था जो दक्षिण के साबनूर के नवाब के साथ पेशवा की हुई थी। सन् 1759-60 में उन्होंने जयपुर जिले के कुछ किले हस्तगत किये।

 

 

पानीपत और मल्हारराव

 

भारत वर्ष के इतिहास में पानीपत का युद्ध विशेष महत्व रखता है । इस युद्ध ने भारत वर्ष के राजनेतिक भविष्य पर किस प्रकार का प्रभाव डाला था यह बात सूक्ष्मदृष्टि इतिहास-वेत्ताओं से छिपी हुई नहीं है। इस युद्ध के परिणाम के विषय में भिन्न भिन्न इतिहास वेत्ताओं का भिन्न भिन्न मत है। हमारे पास स्थान नहीं है कि हम उन सब का पूर्ण रूप से वर्णन करें। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युद्ध में मराठों की शक्ति को एक जबर्दस्त धक्का लगा था। कम से कम कुछ समय के लिये मराठों के भाग्य को विपरीत दशा में पलट दिया था। हमें यहां यह देखना है वि मल्हारराव होल्कर का इस युद्ध में किस प्रकार का भाग रहा था। जब सदाशिवराव बड़े अभिमान के साथ महाराष्ट्र सेना को पानीपत के मैदान की ओर ले जा रहे थे तब वीरवर सूरजमल जाट जैसे बहादुर सिपाही की अनुभवी आंख ने महाराष्ट्र सेना की इस ऊपरी सजधज के अन्तर्गत अव्यवस्था ओर असगंठन के बीज देखे थे। उसने सदाशिवराव से यह अनुरोध किया था कि पुरानी महाराष्ट्र पद्धतियों से अफगानों को हैरान करें ओर जब अफ़गान सेना पीछे हटने लगे तब उन पर अकस्मात् रुप से आक्रमण कर दे। सूरजमल ने सदाशिवराव को बाकायदा युद्ध करने की सलाह न दी। मल्हारराव होल्कर और अन्य फौजी अफसरों ने सूरजमल की राय का समर्थन किया था। पर देश के दुर्भाग्य से सदाशिवराव को उनकी बात नहीं पटी। सदाशिवराव ने सूरजमल को एक छोटा सा जमींदार और मल्हारराव को गडरिया कह कर ताना मारा। इसके बाद भी सदाशिवराव ने मल्हारराव की राय की उपेक्षा की। पानीपत के युद्ध के मैदान में भी मल्हारराव ने सदाशिवराव को अपनी युद्ध नीति बदलने के लिये कई बार समझाया पर उन्होंने एक न सुनी। वे अपनी ज़िद पर अड़े रहे। इससे मल्हारराव को बड़ा क्रोध आया और वे लड़ाई से अलग हो गये। इसके थोड़े ही अर्से बाद तांदुलजा ( उदगीर ) की लड़ाई में भारी विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मल्हारराव को पेशवा की ओर से 300000 की जागीर मिली।

 

 

सन् 1764 में वजीर शुजाउदौला ने मल्हारराव को निमन्त्रित किया। इसका कारण यह था कि शुजाउद्दौला अंग्रेजों से हार गया था और इसीलिये उसने अंग्रेजों के खिलाफ सहायता पाने के लिये मल्हारराव को बुलाये थे। मल्हारराव ने यह निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और उन्होंने अपनी सेना सहित कूच किया। मल्हारराव और अंग्रेजों के बीच लड़ाई हुई। इसमें मल्हारराव को भारी विजय प्राप्त हुई। इस लड़ाई में अंग्रेजों की भारी हानि हुई। इसके बाद अंग्रेजों ने मल्हारराव की फौज पर अकस्मात् आक्रमण कर बदला लिया। इस हमले के कारण मल्हारराव को बुन्देलखंड के काल्प नामक स्थान तक पीछे हटना पड़ा। यहाँ आकर इन्होंने देखा कि गोहदा का राना तथा दतिया का राजा सम्मिलित होकर मराठों की राज्यसत्ता को जड़मूल से खोदने का षड़यन्त्र कर रहे हैं। उन्होंने यह भी देखा कि हिम्मतबहादुर ने मराठों से झांसी का प्रान्त भी छीन लिया है। इसपर मल्हारराव को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने मराठों के हाथ से गये हुए प्रान्तों की वापस लेने का निश्चय किया। मल्हारराव ने झांसी पर घेरा डाला। तीन मास की लड़ाई के बाद उसे वापस फतह कर लिया। चार दिन तक लड़ने के बाद दतिया के राजा ने भी घुटने टेक दिये। उसने मल्हारराव के हाथ में आत्म समर्पण कर दिया। यही स्थिति ओरछा, शेवड़ा, और अन्य स्थानों के राजाओं की हुई। इसी बीच में मल्हारराव की सहायता करने के लिये राघोबा के सेना पतित्व में दक्षिण से सेना आ पहुँची । पर मल्हारराव इस सेना का कुछ भी उपयोग न कर सके क्योंकि सन्‌ 1766 की 20 वीं मई को आलमपुर में इनका देहान्त हो गया। स्मारक रूप में आपकी वहाँ छत्री बनी है। इस छत्री के खर्च के लिये दतिया आदि राज्यों की और से होल्कर को 27 गाँव मिले थे। मल्हारराव अपने समय के महान वीरों में से एक थे। आपने कोई चालीस युद्धों में बड़ी सफलता के साथ भाग लिया था। आप जैसे असाधारण वीर थे वैसे ही चतुर राजनीतिज्ञ भी थे। प्राप्त अवसर का फायदा उठाने में आप अपना सानी नही रखते थे। आप अपने समय के सर्वोच्च राजनीतिज्ञों में से थे। इसी का यह परिणाम है कि आप अपने पीछे एक करोड़ रुपये प्रति साल की आमदनी का एक विशाल राज्य छोड गये। मल्हारराव को खण्डेराव नामक एक पुत्र थे जिनके भरतपुर की लड़ाई में मारे जाने का उल्लेख हम पहले कर चुके हैं। खण्डेराव को मालीराव नामक एक पुत्र थे। वे ही अपने पूज्य पितामह की गद्दी पर विराजे। पर दुर्भाग्य से वे अधिक दिन तक इस संसार में न रह सके। गद्दी पर बेठने के नौ मास बाद ही इनका स्वर्गवास हो गया। इनके बाद पेशवा ने मल्हारराव के भतीजे तुकोजी राव होल्कर को, जिन्हें कि गौतमाबाई ने गोद लिया था, मालवे का सूबेदार नियुक्त किया।

 

 

इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर

 

मालीराव की मत्यु के पश्चात्‌ राज्य का सारा कारोबार मल्हारराव
की पुत्र-वधू तथा खण्डेराव की धर्म-पत्नी अहल्याबाई करती थीं। अहल्याबाई एक दिव्य महिला थीं। वे बड़ी धर्मात्मा, शुद्ध-दया और प्रजापालक थीं। हृदय की विशालता में वे अपना सानी नहीं रखती थीं। वे दया और करुणा की साक्षात्‌ मूर्ति थीं। उनके विशाल अन्तःकरण में दिव्याति-दिव्य गुणों का अद्भुत रूप से विकास हुआ था। इन दिव्य गुणों के साथ साथ इंदौर शासन-कार्य में भी वे अद्वितीय थीं। वे बड़ी बुद्धिमती और प्रतिभा-शालिनी थीं। उन्होंने ऐसी उत्तमता से शासन किया इंदौर राज्य कि प्रजा ओर आसपास के राजाओं ने अति प्रसन्नता प्रकट की। उन्होंने प्रजा के सामाजिक और आर्थिक जीवन का भी भली प्रकार अध्ययन किया। प्रजा की हित कामना उनके हृदय में हमेशा बनी रहती थी। गरीब से गरीब मनुष्य भी अपनी दुख-कहानी माता अहल्या को सुना सकता था। प्रजा उन्हें अपनी माता समझती थी। वे प्रजा को निज पुत्र से भी विशेष प्रिय समझती थी। उस समय इंदौर राज्य पूर्णरूप से रामराज्य था। प्रजा सुखी और समृद्ध थी।अहल्याबाई धर्म की मूर्ति थीं। उन्होंने भारतवर्ष के प्रायः सब तीर्थ स्थानों में धर्मांदों के वितरण की व्यवस्था की थी। यह व्यवस्था आज तक जारी है। आपको हिन्दुस्तान में ऐसा कोई तीर्थ-स्थान नहीं मिलेगा जिसमें अहल्याबाई का बनाया हुआ कोई स्मारक न हो। भगवती देवी की इस साक्षात्‌ मूर्ति ने सन्‌ 1795 सें 70 वर्ष की अवस्था में इस लोक की यात्रा समाप्त की।

 

 

सुप्रख्यात्‌ अंग्रेज लेखक सर जॉन माल्कम अपने Memories of malwa में अहल्याबाई के विषय में लिखते हैं:–“अहल्याबाई के लिये जो कुछ कहा जाता है वह निश्सन्देह ठीक है। उस में सन्देह को स्थान नहीं। वास्तव में वह एक अहितीय और असाधारण मूर्ति थी। उसको अभिमान छू तक न गया था। धर्म में कट्टर होते हुए भी सहन-शीलता की वह उज्वल प्रतिमा थी। यद्यपि वह एकतन्त्रीय शासिका थी, तथापि उसके प्रत्येक कार्य में उच्च- विवेक, अह्वितीय नीतिमत्ता और धर्म की छाप रहती थी। यही कारण है कि आज भी मालवे में लोग उसे देवी ओर ईश्वरीय अवतार कह कर सम्बोधित करते हैं। वह संसारिक व्यवहारों में दक्ष होते हुए भी ईश्वर के प्रति अपने कर्तव्य को भली प्रकार समझती थी।”

यहाँ यह बात भी नहीं भूलना चाहिये कि श्रीमती देवी अहल्याबाई को तुकोजीराव से बहुमूल्य सहायता मिलती थी। अहल्याबाई आत्मा के उच्चतम गुणों में जैसी अद्वितीय थीं वैसी ही वह वीर- रमणी भी थीं। एक समय किसी बात के लिये उनके ओर राघोबा दादा के बीच खटक गई। राघोबा ने इन्दौर पर चढ़ाई करने की धमकी दी। इस पर वह वीर नारी डरी नहीं, वरन्‌ उसने अपने वीरोचित गुणों का प्रकाशन किया। उसने राघोबा को कहला भेजा–“आप जैसे वीरों का यह धर्म नहीं है कि आप एक अबला पर चढ़ाई करें। फिर भी में हर तरह से तैयार हूं। अगर मैं हार गई तो इसमें मुझे कोई बुरा नहीं कहेगा, पर देववशात्‌ यदि आप की पराजय हुईं, तो संसार क्या कहेगा । इस पर जरा विचार कर लीजियेगा।” इतना ही सेंदेसा पहुँचा कर अहल्याबाई ने सन्तोष न माना। उन्होंने युद्ध की तैयारी भी कर ली। उन्होंने राधोबा की फौजों का मुकाबिला करने के लिये अन्य फौजों के साथ साथ कुछ स्त्री योद्धाओं को भी तैयार किया था। राघोबा इस वीररमणी की अद्भुत्‌ तेजस्विता से विस्मित हो गये ओर उन्होंने अहल्याबाई पर चढ़ाई करने का विचार त्याग दिया। बाद में उन्होंने केवल यह कहला भेजा कि–“मैं मालीराव की मृत्यु के उपलक्ष्य में आपके साथ समवेदना और सहानुभूति प्रकट करने के लिये आ रहा था।”

 

 

महाराज तुकोजीराव (प्रथम ) इंदौर

 

इसमें तिलमात्र भी सन्देह नहीं कि श्री तुकोजीराव मल्हारराव के
योग्य उत्तराधिकारी थे। आपने कई युद्धों में असाधारण चतुराई और वीरत्व का परिचय दिया था। उन्होंने अपनी फौजों में यूरोपियन युद्ध-कला और नियम-पालकता (Discipline) का प्रचार किया। सन्‌ 1767 में पेशवा ने रोहिलों को दंड देने के लिये जो फौज भेजी थी उसमें सिन्धिया के साथ साथ तुकोजीराव ने भी बहुत बड़ा भाग लिया था। इसका कारण यह था कि रोहिलों ने पानीपत की लड़ाई में मराठों के खिलाफ़ अहमदशाह अब्दाली का साथ दिया था। पहले पहल मराठों की यह फौज तीन हिस्सों में विभक्त हुईं। उसकी एक टुकड़ी सिन्धिया के हाथ में, दूसरी होल्कर के हाथ में, ओर तीसरी दूसरे सेनापतियों के हाथ में रही। सिन्धिया ने उदयपुर पर कूच किया ओर वहाँ के महाराणा पर 60 लाख का खिराज लगाया। तुकोजीराव ने कोटा और बूँदी पर चढ़ाई कर उन पर खिराज लगाया। अन्य दो जनरल सागर में रहकर बुन्देलखण्ड के राजाओं से खिराज वसूल करने लगे। इसके बाद सब सेना ने मिलकर भरतपुर के राजा के खिलाफ कूच किया। इसका कारण यह था कि भरतपुर का राजा अवध के नवाब शुजाउद्दौला से मिल गया था जो मराठों से विश्वासघात कर पानीपत के युद्ध में अहमदशाह अब्दाली से जा मिला था। यही नहीं, उक्त राजा ने आगरा का किला ओर उसके आसपास का कुछ मुल्क भी छीन लिया था। इससे चिढ़कर मराठों ने बदला लेने का निश्चय किया। भरतपुर से 16 मील की दूरी पर दोनों सेनाओं का मुकाबला हुआ। इसमें भरतपुर का राजा पूर्णरूप से हार गया तब उसी राजा नवल सिंह ने 6500000 रुपया नकद और लिया हुआ मुल्क वापस लौटाकर मराठों से सुलह की। इसके बाद मराठों की विजयी सेना ने दिल्ली की ओर कूच किया। सन्‌ 1770 में नजीब खाँ रोहिला से इन्होंने दोआब का प्रान्त जीता। यह प्रान्त पहले मराठों के हाथ में था परन्तु पानीपत की लड़ाई के बाद उनके हाथ से निकल गया था। इसके बाद उन्होंने फरुखाबाद के पठानों पर चढ़ाई की। ये पठान लोग पानीपत के युद्ध में मराठों के खिलाफ लड़े थे। इस समय रोहिले और पठानों ने आपस में गुट बाँधकर मराठों का मुकाबला करने का निश्चय किया। मराठों और इनके बीच में छोटी बड़ी अनेक लडाइयाँ हुईं। आखिर में मराठों ने इनसे सब किले ओर इटावा का जिला छीन लिया। इन लड़ाइयों में एक लडाई सन्‌ 1770 में पत्थरगढ़ मुकाम में हुई जिसमें शत्रु की कोई 70000 सेना की भयंकर हानि हुईं। आखिर में शत्रुओं ने सुलह के पैगाम पहुँचाये। मराठों ने अपना खोया हुआ मुल्क वापस लेकर अपने विपक्षियों से सुलह कर ली।

 

पाठक जानते हैं कि इसी समय दिल्ली का नामधारी सम्राट शाह आलम बादशाही से च्युत होकर प्रयाग में अंग्रजों के आश्रय में रहता था। मराठों ने उससे लिखा पढ़ी करना शुरू किया। अंग्रेजों ने जब देखा कि मराठे मुगल बादशाह को शाही तख्त पर बैठा कर अपना काम बनाना चाहते हैं तो उन्होंने भी शाह आलम को शाही तख्त पर बैठाने का प्रयत्न शुरू किया। उन्होंने देखा कि बादशाह का मराठों के हाथ में चला जाना उनके स्वार्थ में हानिकारक है। अतः मराठों की सत्ता का बढ़ना अंग्रजों को अखरा। अतएव उन्होंने भी यही चाहा कि अवसर मिलते ही बादशाह को तख्त पर बैठाने का श्रेय प्राप्त करना चाहिये। पर बादशाह बहुत बेचेन हो रहा था। उसने मराठों से बात चीत कर ली। उसने उन्हें वचन दे दिया कि— “अगर तुम मुझे बादशाही तख्त पर फिर बैठा दोगे, तो में तुम्हें उस सब जागीर का परवाना फिर दे दूँगा जो पानीपत की लड़ाई के बाद तुम्हारे हाथ से निकल गई है।” उसने मराठों से यह भी शर्त की कि- मेरी ओर जो तुम्हारी चौथ बकाया है, वह भी में सब दे दूँगा।” बस फिर क्या था। सन्‌ 1771 के अन्त में मराठों ने शाह आलम को दिल्ली के तख्त पर बैठा दिया। सन्‌ 1772 में मुगल सम्राट शाह आलम और मराठों की संयुक्त सेना ने रोहिला सरदार जबीता खाँ के खिलाफ़ कूच किया। यद्यपि यह पत्थरगढ़ में हार चुका था,पर अभी तक सीधा नहीं हुआ था। अतएव इस वक्त फिर उस पर चढ़ाई करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। रोहिले मराठों का मुकाबला न कर सके। पीछे हटकर उन्होंने शुक्रताल नामक किले में आश्रय ग्रहण किया। मराठों ने इस किले पर भी घेरा डाल दिया। इस वक्त जबीता खाँ के बहुत से आदमी मारे गये । जबीता खाँ भी प्राणों को लेकर बिजनौर भाग गया। मराठों ने इसका पीछा किया ओर चन्दीघाट के उस पार उसे पूरी तौर से शिकस्त दी। फिर मराठों ने इसके तमाम किले और सारे मुल्क पर अधिकार कर लिया। इसके बाद मराठ अपनी कुछ सेना दोआब में छोड़ कर दिल्‍ली की ओर लौट गये। जब मराठे दिल्ली में थे तब उनके विरुद्ध एक षड़यन्त्र की सृष्टि हुई। इस षड़यन्त्र का मुखिया अवध का नवाब शुजाउद्दौला था। अंग्रेज भी इसमें शामिल थे। मुग़ल सम्राट शाहआलम का भी इसमें हाथ था। बात यह हुईं थी कि महादजी सिन्धिया ने मुगल सम्राट से पेशवा के भाई नारायणराव को प्रधान सेनापति का पद जबरदस्ती दिलवा दिया था। यह पद अब तक पूर्वोक्त ज़बीता खाँ को प्राप्त था। यह पद प्राप्त हो जाने से शाही फ़ौज पर भी मराठों का अधिकार हो गया था। यह देखकर शुजाउद्दौला और अंग्रेज सशक्त हुए। खास मुगल सम्राट को भी यह बात न भाई। बस फिर क्या था; मराठों के खिलाफ इन तीनों के षड़यन्त्र शुरू हुए। मुगल सम्राट ने भी फौज इकट्ठा की। इसमें ब्रिटिश फौजें भी शामिल थीं। तुकोजीराव और बिनी वाले की आधीनता में मराठी सेना भी तेयार हो गई । दोनों में युद्ध हुआ। मुगल सम्राट शाह आलम हार कर पीछे हटे। उन्हें मजबूर होकर मराठों की शर्तें स्वीकार करनी पड़ी।

 

 

तुकोजीराव होलकर प्रथम
तुकोजीराव होलकर प्रथम इंदौर रजवाड़ा

 

अभी तक रोहिलों ने मराठों से सुलह नहीं की थी। अतएव फिर
मराठों ने उन पर चढ़ाई की। इस चढ़ाई का कारण यह बतलाया गया कि रोहिलों ने 50 लाख रुपया देने का जो वचन दिया था इसका अभी तक पालन नहीं किया था। रोहिलों ने भी मुकाबिला किया। आसदपुर में पूरी तौर से उन्होंने उल्टे मुँह की खाई। उनका सेनापति अहमद खाँ गिरफ्तार कर कैद कर लिया गया। इसके बाद अवध के नबाब शुजाउद्दौला और अंग्रेजों ने रोहिलों का पक्ष ग्रहण किया। यहाँ यह बात ध्यान में रखना चाहिये कि किसी अनबन के कारण इस समय महादजी सिन्धिया रुष्ठ होकर तुकोजीराव प्रभृति मराठा सरदारों को छोड़कर राजपूताना चले गये थे और इसी अर्से में माधवराव पेशवा का भी देहान्त हो गया था। अंग्रेजों ओर नवाब शुजाउद्दौला ने मराठों को नीचा दिखलाने का यह उपयुक्त अवसर देखा। वे रोहिलों से मिल गये। इधर तुकोजीराव होल्कर भी बड़े राजनीतिज्ञ थे। जब उन्होंने देखा कि मतभेद के कारण अपना बल कुछ क्षीण हो गया है और विपक्षियों की संख्या बहुत बढ़ती जा रही है तब वे बड़ी सैनिक चतुराई के साथ पीछे हट गये। दिल्ली से हट कर मराठी सेना भरतपुर पहुँची। भरतपुर शहर से कुछ मील की दूरी पर भरतपुर की सेना से इनका मुकाबला हुआ। दोनों में युद्ध ठना। भरतपुर की सेना बुरी तरह हारी। आखिर भरतपुर के राजा से कुछ शर्तें तय कर मराठी सेना दक्षिण की ओर चली गयी। तुकोजीराव होल्कर इन्दौर आ गये ओर बिसाजी बीनी वाले भी पूना चले गये।

माधवराव पेशवा की मृत्यु के विषय में हम पहले ही लिख चुके हैं।
सन्‌ 1776 में माधवराव के छोटे भाई नारायणराव का खून हो गया। कहा जाता है कि इस खून में राघोबा का हाथ था। इस घटना से मराठी सरदारों में बड़ी खलबली मच गई। खून करने वाले के खिलाफ़ मराठे सरदारों का गुट बना; लेकिन नारायणराव को माधवराव नामक पुत्र हुआ जिससे रिजेन्सी कौन्सिल में राघोबा दादा को पेशवाई से हटा दिया। इसके बाद राघोबा दादा शुजाउद्दोला और अंग्रेजों की सहायता पाने की आशा से मालवा गये। उन्होंने सिन्धिया और होल्कर के राज्य में प्रवेश किया। वहाँ रहने के लिये उन्हें इजाज़त मिल गई। पूना सरकार ने अपने प्रधान सेनापति हरिपन्त फड़के को राघोबा का पीछा करने के लिये भेजा। इधर राघोबा पूना सरकार के विरुद्ध पड़यन्त्र रचने की इच्छा से कभी धार और कभी भोपाल आदि स्थानों में घूमते रहे। आखिर महाराजा होल्‍कर और महाराजा सिन्धिया ने उन्हें पूना लौटने के लिये मजबूर किया। रास्ते में सिन्धिया और होल्कर की फौजों को निगरानी रहते हुए भी राघोबा किसी तरह आँख बचा कर भाग निकले। उन्होंने गोविन्दराव गायकवाड़ और अन्य कुछ मराठे राजाओं को अपने पक्ष में कर लिया। उधर होल्कर, सिन्धिया और हरिपन्त की संयुक्त सेनाओं ने बड़ौदा के नजदीक राघोबा को जा घेरा। माहीनदी के किनारे दोनों पक्षों की फौजों में युद्ध हुआ। इसमें राघोवा बुरी तरह हारे और उन्हें पीछे हटना पड़ा। विजेताओं ने उनका पीछा किया। राघोबा ने खंभात के नवाब से सहायता माँगी, पर उन्होंने देने से इन्कार किया। आखिर में वे खंभात के नवाब के ब्रिटिश एजेन्ट से मिले। ब्रिटिश एजेन्ट ने उन्हें ज्यों त्यों कर सूरत की ब्रिटिश फेक्टरी में पहुँचा दिया। अंग्रेजों का राघोबा को आश्रय देना और उनका सालसीट पर आक्रमण करना, यही खास तौर से प्रथम मराठा युद्ध का कारण है।

 

 

बम्बई सरकार का यह कार्य गर्वनर जनरल ने पसन्द नहीं किया।
उन्होंने बम्बई सरकार के इस कार्य की पुष्टि करने से इनकार कर दिया। उन्होंने (वारन हेस्टिंग्ज ने) बम्बई की अंगरेजी सरकार को यह भी लिखा कि “आपको मेरी अनुमति के बिना किसी के साथ युद्ध घोषित करने का अधिकार नहीं है।” इतना ही नहीं उन्होंने पूना की पेशवा-सरकार से सम्बन्ध स्थापित करने के लिये अपना एक वकील भी भेजा । इस कारण थोड़े से समय के लिये दोनों का मनमुटाव शान्त हुआ। और सन् 1776 में अंग्रेजों और पूना की सरकार के बीच में एक सन्धि हुई जो पुरन्दर की सन्धि के नाम से मशहूर है। इस सन्धि में अंग्रेजों ने यह स्वीकार किया कि वे राघोबा का पक्ष ग्रहण न करेंगे। इसी बीच पूना की पेशवा सरकार और सिन्धिया-होल्कर में किसी कारण मनो-मालिन्य हो गया। पर शीघ्र ही आपस में समझौता भी हो गया। सब एक दूसरे से मिल गये। सन् 1776 में महाराष्ट्र देश में कुछ गड़बड़ और अशान्ति हो गई थी उसे तीनों ने मिलकर मिटा दिया। सन 1778 में तुकोजीराव होलकर ने नरसो गोविन्द पर चढ़ाई की ओर उस से करकब का थाना छीन कर उसके असली हकदार पटवर्धन कुटुम्ब को दे दिया। नरसोगोविन्द झूठमूठ ही थाने का मालिक बन बैठा था। तुकोजीराव ने नरसो गोबिन्द को भी गिरफ्तार कर लिया। हम पहले लिख चुके हैं कि पुरबंदर में मराठों और अंग्रेजों की जो सन्धि हुई थी उसमें अंग्रेजों ने राघोबा का पक्ष ग्रहण न करने का वचन दिया था पर गवर्नर जनरल के बराबर सूचना करते रहने पर भी बम्बई सरकार अपना हठ न छोड़ा। बम्बई की ब्रिटिश सरकार राघोबा को सूरत से ले गई और पूने में ब्रिटिश राजदूत ने बम्बई के ब्रिटिश अधिकारियों के कार्य का समर्थन करते हुए कहा कि—“ पूना की पेशवा सरकार ने राघोबा के के लिये कोई इन्तजाम नहीं किया था, अतएवं बम्बई सरकार को यह कार्यवाई करनी पड़ी।” यहाँ यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि पुरन्दर की में ऐसी कोई बात तय नहीं हुई थी जिसके लिये ब्रिटिश राजदूत ने रूख था। इन सब कारवाइयों को देखकर पूना की पेशवा सरकार को अंग्रेजों से सावधान रहने की आवश्यकता प्रतीत हुईं। इसी बीच में एक घटना हो गई। नाना फड़नवीस के भतीजे मोरोबा ने सचिव के पद्‌ के लिये दावा किया। इस पर मराठों में दो दल हो गये। एक दल के लोगों ने तो नाना फड़नवीस का पक्ष लिया ओर दूसरे ने मोरोबा का। मोरोबा ने अंग्रेजों के साथ मिल कर राघोबा को पेशवाई दिलवाने का षड़यन्त्र रचना शुरू किया। पर इसका कोई फल नहीं हुआ। बम्बई सरकार अब तक राघोबा को आश्रय देती रही। जब पूना सरकार ने देखा कि उसके बराबर कहने सुनने का बम्बई की ब्रिटिश सरकार पर कुछ भी असर नहीं होता है, तब उसने फ्रेंचों से अपना सम्बंध करना शुरू किया। इससे बम्बई की सरकार बहुत भयभीत हुईं। उसने यह पत्र गवर्नर जनरल को लिखा। जो गवर्नर जनरल अब तक अपनी मातहत बम्बई सरकार के कार्यों का विरोध कर रहे थे वे इन सब घटनाओं का विवरण सुनकर उसका समर्थन करने लग गये। इस वक्त उन्होंने राघोबा को पेशवा बनाने की योजना स्वीकृत की और बम्बई सरकार की मदद के लिये कलकत्ता से कुछ फौज भेज दी। यह घटना सन्‌ 1778 की है। इन फौजों के बम्बई में पहुँचने के पहले ही सरकार ने राघोबा और उसके अनुयायियों को साथ लेकर पूने पर चढ़ाई कर दी। पूने की फौजें भी मुकाबले के लिये तैयार थीं। बोरघाट पर दोनों का युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध में अंग्रेजों के केप्टन स्ट्यूअर्ट तथा और केप्टन भी मारे गये। फिर ब्रिटिश सेना ज्यों ही तलेगाँव के पास पहुँची कि उसे सिन्धिया और तुकोजीराव के प्रधानत्व में एक बहुत बड़ी सेना का मुकाबला करना पड़ा। अंग्रेज पीछे हटे। सन्‌ 1779 में वे बड़गाँव पहुँचे। यहाँ मराठों का ओर उनका भयानक युद्ध हो गया। मराठी सेना ने अंग्रेजी सेना पर भयंकर आक्रमण किया। यह आक्रमण बहुत सफल हुआ। अंग्रेजी सेना ने पूरी तोर से शिकस्त खाई और उसका बड़ा नुकसान हुआ। इस पर अंग्रेजों की ओर से होम्स महोदय ने मराठों से सुलह का अनुरोध किया। यह अनुरोध स्वीकार किया गया। बोरगाँव में दोनों में सन्धि हुई। इस सन्धि से अंग्रेजों ने राघोबा को पूना सरकार का समर्पण करने का पूरा वादा किया, जिस पर उसने ( ब्रिटिश ने ) थोड़े समय से अधिकार कर लिया था। इतना ही नहीं ब्रिटिश सरकार ने अपने अधिकारी मि० होम्स ओर मि० फॉमर को बतौर जमानत के पेशवा सरकार को सौंपा और यह यकीन दिलाया कि शर्तें पूरी तौर से पालन की जावेंगी। इसके बाद ब्रिटिश फौजों को बम्बई लौटने के लिये इजाजत दी गई। यहाँ यह बात ध्यान में रखना चाहिये कि लौटती हुई ब्रिटिश फौजों की रक्षा भी होल्कर और सिन्धिया की फौजों ने की थी। इस युद्ध में भी तुकोजीराव होल्कर ने जिस अद्भुत कौशल का परिचय दिया था उससे प्रसन्न होकर पूना की पेशवा सरकार ने उन्हें ओर भी जागीरें दी।

 

 

सन्धि के अनुसार ब्रिटिश सरकार ने राघोबा को पूना की सरकार के सिपुर्द कर दिया। उसने सिन्धिया की देखरेख में राघोबा को झांसी में रखने का निश्चय किया। सिन्धिया और होल्कर की फौजों के पहरे में थे झांसी भेजे जा रहे थे कि फिर किसी तरह वे रास्ते में से भाग कर सूरत के अंग्रेजों के आश्रय में चले गये। इसी बीच कर्नल गोडार्ड की अध्यक्षता में बंगाल की ब्रिटिश सेना भी आ पहुँची। इसलिये अंग्रेजों ने बोरगाँव की सन्धि को ताक में रखकर गुजरात और कोकन प्रान्त के कुछ स्थानों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद अंग्रेजों ने पूना की ओर भी कूच किया। उन्हें पद पद पर मराठों का विरोध सहना पड़ा। आखिर ज्यों त्यों कर यह सेना बोरघाट पहुँची। यहाँ पहुँचते ही उसने तुकोजीराव होल्कर और फड़के के संचालन में एक सुविशाल मराठी सेना को देखा। दोनों में भयंकर युद्ध शुरू हुआ ओर इसमें दोनों ओर का नुकसान हुआ। आखिर में मराठी सेना ने अंग्रेजी सेना को घेर लिया और उसकी रसद का मार्ग बन्द कर दिया। भयंकर हानि
सहने के बाद किसी तरह कर्नल गोडार्ड पीछे हटने में समर्थ हुए। पनवेल के रास्ते से वे बम्बई लौट गये। अंग्रेजों ने फिर सुलह के पैगाम भेजे।सन्‌ 1782 में अंग्रेजों ओर मराठों के बीच फिर सुलह हुईं । इसमें अंग्रेजों ने मराठों का वह सब मुल्क वापस लौठाने का वादा किया जो अभी अभी उन्होंने उनसे ले लिया था। इसके अलावा उन्होंने राघोबा का पक्ष त्यागने की भी पुनः प्रतिज्ञा की। सन् 1783 में राघोबा पेन्शन देकर कोपरगाँव भेज दिये गये। इन्हें तुकोजीराव होल्कर ने सुरक्षितता का अभिवचन दिया था कोपर गाँव जाने के थोड़े ही दिनों के बाद राघोबा का देहान्त हो गया। इससे पूना की पेशवा सरकार का बहुत कुछ चिन्ता-भार हलका हो गया। राघोबा के षड़यन्त्रों के कारण उसे हमेशा सचेत रहना पड़ता था और यही कारण था कि उसे अपने मुल्क का कुछ हिस्सा देकर निजाम आदि को खुश रखना पड़ता था। अब चिन्ता- भार से मुक्त होकर पूना की पेशवा सरकार ने निजाम और मैसूर सरकार को लिखा कि उनकी तरफ चौथ का जो बकाया है उसे वे शीघ्र जमा करें। सन् 1785 में यादगिरी में निजाम और पूना सरकार के बीच सम्मेलन हुआ। पूना सरकार की ओर से नाना फड़नवीस, तुकोजीराव होलकर और हरिपन्त प्रतिनिधि थे। इसमें परस्पर के मतभेद किसी समझौते के द्वारा दूर कर दिये गये, और साथ ही साथ टीपू सुल्तान के राज्य पर हमला करने का भी एक गुप्त समझौता हुआ। दीपू ने जब यह समाचार सुना तो उसने परस्पर का मतभेद मिटाने के लिये अपना एक वकील पूना भेजा। पर इसी समय उसने पेशवा के अधिकृत राज्य नारगन्ड और चित्तूर पर चढ़ाई करने के लिये 10000 सेना भेज दी। टीपू ने इन दोनों राज्यों पर अधिकार कर उन्हें अपने राज्य में मिला लिया। इतना ही नहीं, उसने बेलगाँव जिले के कुछ हिस्से पर भी अधिकार कर लिया। इस पर मराठों को बड़ा गुस्सा हुआ। सन् 1785 के दिसम्बर मास में नाना फड़नवीस ने टीपू पर चढ़ाई कर दी। इस चढ़ाई में तुकोजीराव होलकर भी शामिल थे। टीपू भी तैयार होकर मुकाबले पर आ गया। दोनों में युद्ध ठन गया। टीपू ने अपनी फौजों का संचालन आप ही किया। अन्त में मराठों की भारी विजय हुईं। उन्‍होंने टीपू के बादामी किले पर भी अधिकार कर लिया। टीपू विजय से निराश हो गया। उसने मराठों के पास सुलह का पैगाम भेजा। सन् 1787 में दोनों के बीच सुलह हो गई । उसने मराठों को 6500000 खिराज के रूप में दिये। इसके अलावा हैदर अली ने मराठों से जो जमीन ले ली थी वह भी वापस कर दी गई। मराठों को जो हक मैसूर में पहले प्राप्त थे, वे फिर कायम कर दिये गये।

 

 

इसके बाद सन् 1787 से 1790 तक महाराष्ट्र में शान्ति थी।
पर सन् 1787 में जोधपुर, जयपुर और गुलाम कादिर की फौजों ने मिलकर लालसोट मुकाम पर महादजी सिन्धिया को शिकस्त दी। इससे उत्तर भारत में मराठों के प्रभाव को बड़ा धक्का पहुँचा । आगरा और अजमेर पर फिर राजपूतों ने अधिकार कर लिया। बूंदी ने भी मराठों के खिलाफ बलवे का झंडा उठाया। ऐसी दशा सें महादजी सिन्धिया ने अहल्याबाई और पूना की सरकार को सहायता के लिये लिखा। इस पर अहल्याबाई ने महादूजी सिन्धिया को लिखा “अगर आप उत्तर भारत में जीते हुए मुल्कों में से हमें हिस्सा दें, जैसा कि मल्हारराव होल्कर के समय में तय हो चुका है, तो हम आप को सैनिक सहायता देने के लिये तैयार हैं। सन् 1788 में पूना दरबार ने सिंधिया को सैनिक सहायता पहुँचाने के लिये तुकोजीराव और अलीबहादुर को लिखा। इसी समय उदयपुर की फौजों ने मेवाड़ में होल्कर की फौजों को शिकस्त दी। इस पर बदला लेने के लिये अहल्याबाई ने अपनी नई सेना भेजी। इस सेना ने उदयपुर की सेना को हराया। तुकोजीराव के पुत्र काशीराव, दादा सिन्धिया की सहायता करने के लिये, भेजे गये ओर तुकोजीराव उदयपुर के राणा से शर्तें तय करने के लिये नाथद्वारा गये। यहाँ उन्हें अलीबहादुर भी आकर मिल गये। इसके बाद सन् 1789 में ये दोनों सिन्धिया की सहायता करने के लिये मथुरा के लिये रवाना हो गये। अब सिन्धिया की स्थिति मजबूत हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर भारत में फिर मराठों की सत्ता का बोल बाला होने लगा। इस समय सिन्धिया ने होल्कर को उनके हिस्से का 921000 प्रति साल की आमदनी का मुल्क देना स्वीकार किया। इसमें 200000 प्रति साल की आमदनी का मुल्क तो तुरन्त दे देने के लिये कहा, पर इससे सिन्धिया ने यह शर्ते रखी कि इस मुल्क का सायर महसूल और इनाम का हक वे खुद ( सिन्धिया ) अपने हाथों में रखेंगे। तुकोजीराव ने यह बात अस्वीकार की। इसी बात को लेकर आगे सिन्धिया और होल्कर में अनबन हो गई। सन् 1790 में सिन्धिया सतवास थाना के मार्ग से होकर पूना जा रहे थे। उक्त थाना होल्कर राज्य में पड़ता था। इस पर सिन्धिया ने अधिकार कर लिया। सन् 1792 के बाद सिन्धिया पूने ही में रहे। उन्होंने वहाँ तुकोजीराव और अलीबहादुर को मालवा से बुला लेने की कोशिश की। इसका कारण यह था कि सिन्धिया हिन्दुस्थान पर अपना अबाधित अधिकार चाहते थे। पर सन् 1794 के फरवरी मास में वे स्वर्गवासी हो गये। कहने की आवश्यकता नहीं कि वे अपने पुत्र दौलतराव सिन्धिया के लिये एक सुविशाल राज्य छोड़ गये थे।

 

 

इसी अर्से में निजाम और पेशवा में फिर विरोध के बादल उमड़ने लगे। पेशवा ने तुकोजीराव को अपनी फौजों सहित निमन्त्रित किया। पेशवा निजाम पर चढ़ाई करने ही वाले थे कि तुकोजीराव अपनी सेना सहित पूना पहुँच गये। खरड़ा मुकाम पर पेशवा और निजाम की सेना का मुकाबला हुआ। निजाम खुद अपनी सेना का संचालन कर रहे थे। भयंकर युद्ध हुआ ओर इसमें निजाम की पूर्ण पराजय हुईं। निजाम ने अपना बहुत कुछ मुल्क ओर धन देकर मराठों से सुलह कर ली। सन् 1796 के अगस्त मास में महेश्वर मुकाम पर देवी अहिल्याबाई का परलोकवास हुआ। इसके दो मास बाद ही पूना में ऊपर की मंजिल से गिर जाने के कारण पेशवा का भी शरीरान्त हो गया। अब पेशवा के घर में फिर गद्दी नशीनी के लिये झगड़ा शुरू हुआ। पहले तो सरदारों ने यह चाहा कि बाजीराव को एक तरफ रख कर वह लड़का गद्दी पर बिठाया जाय जिसे स्वर्गीय पेशवा की विधवा रानी गोद ले। पर अंत में पटवर्द्धन के घराने को छोड़ कर सब ने बाजीराव ही का पक्ष समर्थन किया और वे सन् 1796 के दिसम्बर सास में गद्दी पर बिठा दिये गये। तुकोजीराव पूना में बेठे हुए इब सब घटनाओं को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से देख रहे थे। पर इस समय उनका स्वास्थ्य दिन ब दिन खराब होता जा रहा था। आखिर सन् 1797 की 15 अगस्त को यह महान राजनीतिज्ञ और वीर इस संसार को छोड़ कर परलोकवासी हुआ। इंदौर के महाराज तुकोजीराव के चार पुत्र थे । इनमें से दो औरस (Legitimate) और दो अनऔरस थे। अर्थात्‌ दो असली रानी से थे और दो रखैल से। औरस पुत्रों का नाम काशीराव ओर मल्हाराव था। अनौरस पुत्रों का नाम यशवन्तराव और विठोजी था। तुकोजीराव की इच्छानुसार पेशवा ने काशीराव का उत्तराधि-कारित्व स्वीकार कर लिया। इसके अतिरिक्त मृत्यु के पहले तुकोजीराव ने बड़ी बुद्धिमानी के साथ काशीराव ओर मल्हारराव के बीच का मतभेद भी मिटा दिया था। पर इसका कोई फल नहीं हुआ। काशीराव में शासन करने की क्षमता नहीं थी। बुद्धि से भी थे बड़े कमज़ोर थे। इसके विपरीत मल्हारराव में वे सब गुण थे जो एक योग्य शासक और सैनिक नेता में होने चाहियें। इस वक्त तक सिन्धिया और होल्कर का मतभेद ज्यों का त्यों बना हुआ था। होल्कर घराने के कई लोग जैसे यशवन्तराव, विठोजी, हरीबा
आदि मल्हार॒राव को गद्दी पर बिठाना चाहते थे। सिन्धिया ने काशीराव का पक्ष इस शर्त पर ग्रहण किया कि उन्हें सिन्धिया पर का वह कर्ज छोड़ना होगा जो वे ( होल्कर ) अहिल्याबाई के समय से उनसे (सिन्धिया से) मांगते हैं। यह कर्ज 16 लाख रुपया था। मल्हारराव को, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, पेशवा और नाना फड़नवीस की सहायता थी। पर इस समय सिन्धिया ही सर्व- सत्ताधारी थे। उनकी ताकत बहुत बढ़ी हुईं थी। सन् 1797 के सितम्बर मास की 14 तारीख को सिन्धिया ने मल्हारराव को पकड़ने के लिये अपनी फौज रवाना की। इस सेना ने होल्कर राज्य के कुछ गावों पर अधिकार कर लिया। आखिर मल्हारराव के आदमियों और सिन्धिया की फौज का मुकाबला हो गया। छोटी सी लड़ाई हुईं। इसमें मल्हारराव और उनके कुछ साथी मारे गये। इस समय यशवन्तराव, हरीबा और विठोजी किसी तरह वहां से निकल भागे। मल्हारराव की विधवा पत्नी और यशवन्तराव की भीसाबाई नामक पुत्री सिन्धिया की हिरासत में आ गई।यंशवन्त राव ओर हरीबा नागपुर चले गये। वहाँ के भोंसला राजा ने उन्हें गिरफ्तार कर कैद कर लिया। यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सब कार्यवाई सिन्धिया के इशारे पर की गई थी। बिठोजी ने पेशवा के राज्य में गड़बड़ मचाना शुरू किया था आखिर वें भी सिन्धिया के द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये। बिठोजी को पेशवा ने मृत्युदंड दिया। पेशवा का उद्देश चाहे जो कुछ हो पर यह कहना पड़ेगा कि वे सिन्धिया के इशारे पर ही नाच रहे थे। वे उनके हाथ की कठपुतली बने हुए थे। सिन्धिया का बड़ा जोर था। यहाँ तक कि सन् 1797 के दिसम्बर मास में नाना फड़नवीस तक को सिन्धिया ने कैद कर लिया था। सन् 1797 में तो सिन्धिया ने पेशवा के भाई अमृत राव का डेरा तक लूट लिया था।

 

 

इंदौर रजवाड़ा के महाराजा यशवंतराव होलकर

 

यशवन्तराव एक अर्से तक नागपुर में केद रहे। आखिर वे किसी
तरह वहाँ से खानदेश ओर मालवा की तरफ भाग गये। कुछ समय तक सालवा सें वे इधर उधर घूमते रहे। घूमते घूमते ये धार पहुँचे। यहाँ ये क्या देखते हैं कि धार के तत्कालीन महाराज अनन्दराव पर वहाँ का दीवान रंगराव उदेकर पिंडारियों की सहायता से चढ़ाई करने की तैयारी कर रहा है। वह खुद महाराज को हटाकर वहाँ का राजा बनना चाहता है। यशवन्तराव ने महाराज का पक्ष ग्रहण किया। महाराजा और उनके दीवान की सेना में जो युद्ध हुआ उसमें यशवन्तराव की वीरता और बुद्धिमत्ता के कारण महाराज की सेना ही विजयी हुईं। दूसरे शब्दों में यों कहिये कि महाराज की डूबती हुईं नाव वीरवर यशवन्तराव ने बचा ली। पर वीर यशवन्तराव शीघ्र ही धार छोड़ने के लिये मजबूर हुए कारण कि सिन्धिया ने धार के राजा को इस सम्बन्ध में बहुत डराया धमकाया था। इसके बाद यशवन्तराव देपालपुर को ओर रवाना हुए। वहाँ उन्होंने काशीराव की फौज को हराकर उसपर अधिकार कर लिया। इस विजय से यशवन्तराव की कीर्ति बहुत फैल गई। यशवन्तराव ने यह देख कर कि सिन्धिया काशीराव को हाथ की कठपुतली बना कर होल्कर राज्य को हडप करते जा रहे हैं और वे काशीराव के प्रति बड़ी दुश्मनी के भाव रखते हैं–सिन्धिया के मुल्क को बरबाद करना शुरू किया। उन्होंने मल्हारराव के पुत्र खण्डेराव के नाम पर अपना बहुत कुछ मुल्क भी सिन्धिया से छीन लिया। यशवन्तराव की अपूर्व वीरता और असाधारण बुद्धिमत्ता तथा समय सूचकता को देख कर लोग मोहित होने लगे। सैकड़ों इनके अनुयायी होने लगे। इतना ही नहीं, प्रत्युत्‌ प्र्यात्‌ पिंडारी नेता अमीर खाँ आदि ने भी उनकी मातह॒ती में काम करना स्वीकार किया।

 

 

यशवंतराव के पास धन नहीं था। अतएव उन्होंने सिन्धिया के मुल्क की लूटना शुरू किया। कसरावद मुकाम पर उन्होंने काशीराव की सेना पर फिर विजय प्राप्त की। सतवास मुकाम पर फिर तीसरी विजय हुईं। सन् 1801 में उज्जैन और नर्मदा के आस पास यशवन्तराव और सिन्धिया की फौजों में कई मुठभेड़ें हुई। इनमें प्रायः यशवन्तराव ही की विजय हुई। सन् 1801 में उज्जैन मुकाम पर यशवन्तराव ने सिन्धिया की विशाल फौजों पर भारी विजय प्राप्त की। इस समय सिन्धिया की फ़ौजों का संचालन यूरोप के सैनिक विद्या विशारद कर रहे थे। उनके पास नये यूरोपियन ढाँचे का बढ़िया तोपखाना भी था। यशवन्तराव ने सिन्धिया की फौज से इस तोपखाने की बहुत सी तोपें भी छीन लीं। उज्जैन की प्राचीनता और पवित्रता का खयाल कर यशवन्तराव ने जान बूझ कर इसे बर्बाद नहीं किया। सिन्धिया ने जब यह खबर सुनी तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया। बदला लेने के विचार उनकी रगरग में दौड़ने लगे। उन्होंने इंदौर राज्य की ओर एक बड़ी सुसज्जित सेना भेजी। यशवन्तराव भी मुकाबले पर आ डटे। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। आखिर इस युद्ध में यशवन्तराव हार गये। फिर क्या था। महाराज सिन्धिया के आदमियों ने इंदौर को बर्बाद करना शुरू किया। इंदौर का राजमहल ज़मींदोज़ कर दिया गया। इन्दौर बुरी तरह लूटा गया। इससे यशवन्तराव को फिर संभलने में कुछ समय लगा। पर थोड़े से संभल जाने के बाद ही यशवन्तराव ने सिन्धिया का मुल्क बर्बाद करना और लूटना शुरू किया। सिन्धिया तंग आ गये। उन्होंने यशवन्तराव को कहलवाया कि अगर आप मेरे राज्य में लूटमार और बर्बादी का काम छोड़ दें तो आपका लिया हुआ मुल्क और मल्हारराव के लड़के को हम मुक्त कर देंगे। पर यशवन्तराव उन अधिकारों के लिये ज़ोर देते रहे जो उन्हें प्रथम मल्हारराव होल्कर के समय में प्राप्त थे। सिन्धिया ने यह बात स्वीकार नहीं की। इससे यशवन्तराव होल्कर अपना काम दूने उत्साह से करने लगे। यशवन्तराव पेशवा से भी मन ही मन बुरा मानते थे क्योंकि पेशवा ने अन्याय पूर्वक उनके भाई विठोजी को मृत्यु-दण्ड दिया था। इसके अतिरिक्त होलकर की खानदेश स्थित जागीर को जब्त करने के लिये भी उन्होंने ( पेशवा ने ) सेना भेजी थी। यशवन्तराव ने पहले तो पेशवा से मेलजोल करने का प्रयत्न किया पर इसमें सफलता न होती देख उन्होंने अन्त में तलवार से काम लेने का निश्चय किया। सन् 1802 में उन्होंने पेशवा की सेना को कई शिक्स्ते दीं। इसी साल उन्होंने सिन्धिया और पेशवा के राज्य में प्रवेश कर लोगों से धन और वस्तुएं लीं। यशवन्तराव ने पेशवा को लिखा कि अगर निम्नलिखित शर्तें स्वीकार की जावें तो बर्बादी दी का यह सब काम बन्द कर दिया जा सकता है। शर्तें यों हैं:–

  •  सिन्धिया मल्हारराव के पुत्र को मुक्त कर दें।
  •  मल्हारराव का पुत्र खण्डेराव इंदौर राज्य का राजा घोषित
    किया जाये।
  •  सिन्धिया ने होल्कर के जो मुल्क ले लिये हैं उन्हें ने वापस
    लौटा दें।
  •  महादजी सिन्धिया के समय में उत्तर भारतवर्ष का मुल्क
    बाटने के लिये जो इकरारनामा हुआ था, सिन्धिया उसका पालन करें।

हम ऊपर कह चुके हैं कि बेचारे पेशवा शक्तिहीन थे। सारी सत्ता
एक तरह से महादजी सिन्धिया के हाथ में थी। वे बिना सिन्धिया की स्वीकृति के इन शर्तों को मंजूर नहीं कर सकते थे। सिन्धिया ने पहले ही ये शर्तें नामंजूर कर दी थीं। अतएव समझौते की कोई आशा न देख यशवन्तराव ने इन सब बातों का फैसला तलवार से करना चाहा। उन्होंने सेना सहित दक्षिण की ओर कूच किया। सन् 1802 में भयंकर युद्ध हुआ। इसमें एक ओर तो अकेले यशवन्तराव और उनकी सेना थी और दूसरी ओर सिन्धिया और पेशवा की संयुक्त सेनाएं। इसमें यशवन्तराव को भारी और निश्चयात्मक विजय प्राप्त हुई। पेशवा अपनी राजधानी छोड़ कर भागे। उन्होंने अंग्रेजों का आश्रय ग्रहण किया। अब पूने के कर्ता धर्ता यशवन्तराव बन गये। यशवन्तराव ने पेशवा को लौट आने के लिये लिखा, पर उन्होंने यशवन्तराव की प्रामाणिकता में विश्वास नहीं किया। फिर यशवन्तराव ने अमृृतराव को पेशवा की गद्दी पर बैठाने का विचार किया पर अमृतराव ने यह बात स्वीकार करने में हिचकिचाहट प्रकट की। इसी बीच पेशवा अंग्रेजों से मेलजोल करने के लिये लिखा पढ़ी कर रहे थे। आखिर सन्‌ 1802 के दिसम्बर सास में पेशवा और अंग्रेजों के बीच सन्धि हो गई। यह सन्धि “बेसीन की सन्धि” के नाम से मशहूर है। इस सन्धि के कारण पेशवा को अंग्रेजों की सैनिक सहायता मिल गई। इस सेना की सहायता से बाजीराव पूने में प्रवेश करने में समर्थ हुए।

 

 

यशवन्तराव होलकर
यशवन्तराव होलकर इंदौर

 

बाजीराव पेशवा की यह कार्यवाई यशवन्तराव को तो क्या, पर उनके खास हिमायती सिन्धिया और भोंसला को भी पसन्द न आई; क्योंकि इसमें उन्होंने मराठा साम्राज्य के नाश का दृश्य देखा । वे नाराज़ होकर पेशवा से अलग हो गये। इसके बाद सिन्धिया और भोंसला ने मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ़ अपना गुट बनाना शुरू किया। यशवन्तराव को भी उन्होंने अपने में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रित किया। उन्हें ( यशवन्तराव को ) यह भी वचन दिया गया कि आपका मुल्क, जिसके लिये आप दावा कर रहे हैं आप को लौटा दिया जायगा और आपकी पुत्री भीमाबाईं भी आपके सिपुर्द कर दी जायगी। भोंसला ने होल्कर को ये उपरोक्त शर्तें पूरी करने के लिये वचन दिया और साथ ही में उनका कुछ मुल्क भी लौटा दिया। पर उत्तर भारत के मुल्क का हिस्सा उन्हें वास्तविक रूप से अब तक नहीं दिया गया था। इससे होल्कर को पूर्ण संतोष नहीं हुआ। आखिर अंग्रेज ओर सिन्धिया-भोंसले में युद्ध हो गया। इसमें यशवन्तराव निरपेक्ष रहे।इस युद्ध में सन्धियां और भोंसले की पराजय हुई। आखिर इन्हें अपना बहुत सा मुल्क देकर अंग्रेजों से सन्धि करनी पड़ी।

 

इन घटनाओं से मराठा साम्राज्य का तो अन्तिम दृश्य उपस्थित हो गया, पर सिन्धिया और भोंसले से यशवन्तराव की स्थिति ऊँची हो गई। अब महाराष्ट्र में यशवन्वराव की तूती जोर से बजने लगी।अंग्रेज लोग इन्हें ही अपना प्रधान प्रतिद्वंद्वी समझने लगे। दिल्ली के नामधारी मुग़ल सम्राट ने भी इन्हें “राजराजेश्वर अलीजा बहादुर की उपाधि प्रदान की।भारतीय राजाओं में ये विशेष सम्मानित समझे जाने लगे। ब्रिटिश सरकार ने पहले तो इनसे छेडछाड करना मुनासिब न समझा, पर आखिर में कुछ ऐसे सवाल आ पड़े जिनसे इनके साथ अनबन हो जाना अनिवार्य था। क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने राजपूत राजाओं से सन्धि कर उनसे मैत्री का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उनमें से कई राजा यशवन्तराव को चौथ देते थे ।यशवन्तराव होल्कर अपने अधिकारों का उपयोग करने के लिये चौथ वसूल करने के लिये राजपूताना गये। ब्रिटिश अफसरों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। उन्हें ( यशवन्तराव को )
कहा गया कि इन सब राजपूत राजाओं की हमारे साथ मैत्री हो गई है। आप इनसे छेड़छाड़ न कीजिये। इसके अलावा उन्होंने यह भी सूचित किया कि इन्दौर के राजा काशीराव हैं, इसमें आपका कोई सम्बन्ध नहीं। फिर भी इनमें और ब्रिटिश अधिकारियों में लिखा-पढ़ी चली। होल्कर ने निम्नलिखित शर्तें उपस्थित कीं—

  •  पहले की तरह होल्कर खिराज वसूल करते रहेंगे।
  •  दुआब परगना और बुन्देलखण्ड के एक परगने के विषय में
    होल्कर का जो दावा चला आया है, वह स्वीकृत किया जावे।
  •  हुराणिया का देश जो पहले होल्कर की अधीनता में था, वह
    वापस लौटाया जावे।
  •  इस समय होलकर के अधिकार में जो मुल्क है उसकी
    सुरक्षितता का वचन दिया जावे।

ये सब शर्तें ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार नहीं की। मेलजोल के लिये
जो लिखा-पढ़ी हो रही थी उसका कोई फल नहीं हुआ।यशवन्तराव से कहा गया कि वे अपने राज्य में लौट जायें। इस समय यशवन्तराव ब्रिटिश के खिलाफ गुट बनाने के लिये सिक्ख और बुन्देलखण्ड के राजाओं से लिखा पढ़ी कर रहे थे। उन्होंने इसी सम्बन्ध में काबुल, भरतपुर और सिन्धिया महाराज को भी लिखा था। सन् 1804 में अंग्रेजों ने होल्कर के खिलाफ लड़ाई छेड़ने का निश्चय किया। इस समय वीरवर यशवन्तराव होलकर जयपुर राज्य में थे। यहाँ अंग्रेजों ने एक बड़ी कूट-नीति की चाल चली। उन्होंने यह आश्वासन देकर सिन्धिया को अपनी ओर मिला लिया कि अगर होलकर आत्म-समर्पण कर देगा तो उसे और काशीराव को ब्रिटिश के आश्रय में कुछ जागीर देकर उसका सारा मुल्क आपको दे दिया जायगा। इस प्रलोभन से सिन्धिया न बच सके। वे यशवन्तराव को छोड़ कर अंग्रेजों की ओर जा मिले।

 

 

सन्‌ 1804-5 में यशवन्तराव और अंग्रेजों के बीच कई लड़ाईयाँ हुईं। सेनापति लुकॉन की अधीनस्थ ब्रिटिश सेना का पराजय हुआ । मुकन्दरा के पास कर्नल मानसून की फौजें-जिनमें जयपुर, कोटा और सिन्धिया की फौजें भी शामिल थीं-बुरी तरह हारी। ये होल्कर के सामने से बेहोश भागी। हिंगलाजगढ़ का किला होल्कर ने वापस ले लिया। मानसून की फौजों का होलकर की फौजों ने पीछा किया और उनकी बुरी दशा कर डाली। मानसून के सैकड़ों आदमी मारे गये और साथ ही उनका सब असबाब भी छीन लिया गया। बनास नदी और सीकरी के पास भी ब्रिटिश और होलकर की फौजों का मुकाबला हुआ। इसमें किसी की हार जीत प्रकट नहीं हुईं। यशवन्तराव ने मानसून की फौजों पर जो अपूर्व विजय प्राप्त की उससे उनकी सैनिक कीर्ति और भी बढ़ गई थी। उनका भारतीय राजा महाराजाओं पर बहुत दबदबा छा गया था। पश्चात्‌ यशवन्तराव ने मथुरा की ओर कूच किया। वहां भी ब्रिटिश फौजों के साथ इनकी लड़ाई हुईं, पर कोई फल प्रकट नहीं हुआ। फिर उन्होंने वृन्दावन की ओर कूच किया। इसी समय अंग्रेज सेनापति लॉड लेक मथुरा आ पहुँचे। फिर दोनों सेनाओं में मुठभेड़ हो गई और यह कई दिन तक चलती रही। बेचारे लॉर्ड लेक दिल्ली की ओर पीछे हटने लगे। होल्कर की फौजों ने उन्हें इतना तंग किया कि उनको पीछे हटना भी मुश्किल हो गया। बे ज्यों त्यों कर बड़ी मुश्किल से दिल्ली पहुँचे। इसके बाद होल्कर की फौज ने दिल्ली के किले पर आक्रमण किया पर अंग्रेजों ने उसे विफल कर दिया। इसके बाद यशवन्तराव शामली और फ़रुखाबाद पहुँच यहां से उन्होंने भरतपुर के राजा से लिखा-पढ़ी शुरू की और उनसे उन्हें अच्छी सहायता भी मिल गई। ब्रिटिश फौज भी डिग आ पहुंची। यहां पर युद्ध हुआ और उसमें अंग्रेजों को सफलता मिली। उन्होंने डिग के किले पर अधिकार कर लिया। होल्कर पीछे हटकर भरतपुर चले गये। ब्रिटिश फौज भी वहां आ धमकी। उसने भरतपुर के किले पर सात हमले किये पर उसे सफलता न मिली । इस ओर से प्रख्यात पिंडारी नेता अमीर खां ब्रिटिश मुल्क को बर्बाद करने के लिये भेजा गया। सन्‌ 1805 के मार्च में सिन्धिया ने होल्कर और अंग्रेजों के बीच समझौता करवाने का प्रयत्न किया, पर इसमें उन्हें सफलता न मिली। अंग्रेजों के साथ तो होलकर का मेल हुआ ही नहीं पर इसी साल मई में सिन्धिया के साथ इनका मेल हो गया। ये दोनों अपनी फौजों सहित सबलगढ़ में आ मिले। यशवन्तराव ने पेशवा, महाराजा रणजीत सिंह, भोंसला और अन्य कई राजा महाराजाओं को अंग्रेजों के ख़िलाफ़ खड़े होने के लिये लिखा। जयपुर के राजा, भोंसला और महाराजा रणजीत सिंह ने यशवन्तराव के अनुरोध को स्वीकार किया। पर इसी समय अंग्रेज एक राजनेतिक पेंतरा चले। उन्होंने सिन्धिया को अपनी ओर मिलाने के लिये उन्हें ग्वालियर और गोहद के किले, दस लाख रुपया नकद और होल्कर राज्य का कुछ अंश देने का प्रलोभन दिया। पहले तो सिन्धिया ने इस प्रलोभन से मुँह मोड़ लिया पर वे आखिर में होलकर से अलग हो गये। सन् 1805 की सन्धि के अनुसार उन्हें पुस्कार भी मिल गया। सन् 1805 में भरतपुर के राजा को भी अंग्रेजों से मिल जाने के लिये प्रलोभन दिया गया। सन्‌ 1805 के सितम्बर में यशवन्तराव जयपुर राज्य में और अक्टूबर में नारनोल और जिंद होते हुए पटियाला पहुँचे। पहले तो कई सिक्ख राजाओं ने यशवन्तराव को सहायता देने का वचन दिया था पर ठीक समय पर सब मुकर गये। इसका कारण यह था कि ब्रिटिश अधिकारियों ने कई प्रकार के प्रलोभन देकर इन्हें अपनी ओर मिला लिया था। जब यशवन्तराव ने देखा कि ब्रिटिश सेना उन्हें घेरना चाहती है तो वे बड़ी बुद्धिमानी के साथ ऐसे स्थान पर हट गये जहाँ से अंग्रेजों का मुकाबला सुगमता से किया जा सके और उन्हें सिक्ख राजाओं की भी सहायता मिल जाये। कहने की आवश्यकता नहीं कि अंग्रेजों के और यशवन्तराव के बीच छोटी मोटी कई लड़ाईयाँ हुई, पर इस वक्त दोनों दल थक गये थे। दोनों की आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई थी। आखिर सन्‌ 1805 के दिसम्बर में दोनों के बीच सन्धि हो गई। इसके दो मास बाद उक्त सन्धि में कुछ ऐसे सुधार किये गये जिनसे यशवन्तराव को कुछ अधिक संतोष हो सके।

 

 

सन् 1802 और 1805 की लड़ाइयों में वीरवर यशवन्तराव होल्कर बिलकुल स्वतंन्त्र सत्ताधारी हो गये। उन्होंने तुकोजीराव महाराज के समय में, इंदौर होल्कर राज्य को जो हक प्राप्त थे वे सब फिर से प्राप्त कर लिये। जयपुर, उदयपुर, कोटा, बूंदी और अन्य राजपूत रियासतों पर भी उनके पूर्वोपार्जित अधिकार फिर से कायम हो गये। भारतवर्ष के अन्य राजाओं में भी इनका दबदबा छा गया। यशवन्तराव धीरे धीरे कूच करते हुए पंजाब से लौट गये । अब भी वे अंग्रेजों को दुआब के लिये लिखते रहे। पर उन्हें इस कार्य में सफलता न हुई। राजपूताने में लौट कर उन्होंने उदयपुर और जयपुर से खिराज वसूल किया। फिर उन्होंने जोधपुर को सहायता देकर उस अहसान का बदला चुकाया जो जोधपुर राज्य ने एक युद्ध के समय उनके कुटुम्ब को आश्रय देकर किया था। निरन्तर युद्ध में लगे रहने के कारण-जैसा हम ऊपर कह चुके हैं- उनकी आर्थिक दशा अत्यन्त शोचनीय हो गईं थी। फौजों को वक्त पर तनख्वाह न मिलने से उनमें बगावत फैल गई थी। एक वक्त तो ( 1806) उन्हें अपनी बागी फौज को उसकी तनख्वाह की जमानत के बतौर अपने भतीजे खण्डेराव को सुपुर्द करना पड़ा था। खण्डेराव का शाहपुरा मुकाम पर हैजे के कारण देहान्त हो गया। इसके बाद यशवन्तराव होल्कर- इंदौर राज्य के भानपुर ग्राम में आ गये। भानपुर आकर ये अपनी सेना और तोपखाने का यूरोपीय पद्धति के अनुसार संगठन करने लगे। वे तोंपे भी ढलवाने लगे। उसी समय उन्हें उन्माद रोग ने आ घेरा और उसी से सन्‌ 1811 में भानपुर मुकाम पर यशवन्तराव का देहान्त हो गया। आपके शव- दहन-स्थान पर भानपुर में एक विशाल छत्री बनी हुईं है।

 

 

मल्हारराव द्वितीय

 

महाराज यशवन्तराव होलकर की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी तुलसीबाई जिन्होंने महाराजा की विक्षिप्त अवस्था में राज्य का शासन किया था- इंदौर राज्य की रिजेन्ट बनाई गई। उस समय महाराजा के उत्तराधिकारी मल्हारराव द्वितीय की उम्र केवल चार वर्ष की थी। सब लोगों ने उनके उत्तराधिकारित्व को स्वीकार किया। इंदौर के बाल-महाराजा के समय कुछ सैनिक अधिकारियों की बगावत के कारण राज्य में बड़ी अशान्ति और गड़बड़ी फैली हुईं थी। आधीनस्थ इलाकेदार इस समय स्वाधीन होने लग गए थे। भील लोग जंगलों से निकल निकल कर इंदौर राज्य में उत्पात मचाने लग गए थे। तनख्वाह के लिये सेना अलग चिल्ला रही थी। तुलसीबाई ओर मल्हारराव द्वितीय के खिलाफ साजिशें होने लगीं। यह अशान्ति और गड़बड़ इतनी फैली हुई थी कि सन्‌ 1815 में तुलसीबाई को गंगराड़ के किले में आश्रय लेना पड़ा। इसके बाद दीवान गनपतराव तुलसीबाई के हर एक काम पर नज़र रखने लगे। बागी फौज के नायक राज्य की शान्ति स्थापना में बराबर बाधा डालते रहे। इन सब बातों से तंगआकर तुलसीबाई को गंगराड़ का किला छोड़ कर आलोट के किले में आश्रय लेना पड़ा। इसी समय अर्थात सन्‌ 1817 में पेशवा ने अंग्रेजों से युद्ध घोषित कर दिया। होल्कर सरकार के कुछ बागी सेनानायक इस समय पेशवा से मिल गये। तुलसीबाई अंग्रेजों से सुलह रखना चाहती थी, अतएव वे इस बागी फौज द्वारा मार डाली गईं। उनके सचिव भी कैद कर दिये गये। इसी बागी फौज़ ने बाल महाराज को भी पकड़ कर इसलिये अपने कब्जे में कर लिया कि वह उनके नाम पर हुकूमत करे। इस समय वह अंग्रेजी सेना जो पिंडारियों को दबाने के लिये मध्य भारत में घुसी थी होल्कर राज्य में आ पहुँची। इसने होल्कर राज्य की बागी सेना की चहलपहल देख कर यह समझा कि होल्कर राज्य ब्रिटिश से युद्ध किया चाहता है। उसने युद्ध की तैयारी की और सन्‌ 1817 के दिसम्बर में युद्ध हुआ। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इस युद्ध में होल्कर राज्य के केवल तोपखाने ने भाग लिया था। इसने अंग्रेज़ी सेना को बहुत नुकसान पहुँचाया। राज्य की अन्य फौजें निरपेक्ष रहीं। इससे अंग्रेजों को सहज ही में विजय मिल गई। अंग्रेज़ी सरकार ने यह तो न समझा कि यह सब कारवाई बागी फौज की है, इसमें होल्कर राज्य का कोई दोष नहीं। उसने होल्कर राज्य पर बड़ी ही कड़ी शर्तें लाद दी। होल्कर राज्य के तत्कालीन दीवान ताँतिया जोग ने अंग्रेज़ों को यह बात खूब अच्छी तरह समझाई कि यह सब कारवाई होल्कर राज्य की मनशा के खिलाफ बागी फौज की थी–इसमें राज्य का तिल भर भी दोष नहीं, पर उनकी एक न सुनी गई। आखिर उन्हें उस कड़े सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़े, जो अंग्रेज सरकार की ओर से पेश किया गया था। यह बात सन्‌ 1818 की है।

 

 

इस सन्धि से होल्कर राज्य का आधा हिस्सा चला गया। उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, कोटा, बूंदी और करोली आदि के महाराजा जो कर और खिराज होल्कर राज्य को देते थे, इस सन्धि के अनुसार वह अंग्रेज सरकार को दिया जाने लगा। रामपुरा, बसंत, राजेपुरा, बलिया, नीमसरा, इन्द्रगढ़, बूंदी, लाखेरी, सामेदी, ब्राह्यणगाँव, दसई और अन्य स्थानों से जोकि बूंदी की पहाड़ियों के बीच में या उत्तर में हैं, होल्कर ने अपना अधिकार हटा लिया ओर सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच के या उनके दक्षिण वाले इलाकों, खानदेश वाली अमलदारियों तथा निजाम और पेशवा के इलाकों से मिले हुए अपने जिलों का सम्पूर्ण अधिकार भी उन्हें अंग्रेज सरकार को देना पड़ा। पच-पहाड़, डग, गंगराड और आवर आदि परगने कोटा के जालिम सिंह को दिये गये। अंग्रेज सरकार ने इकरार किया कि वह महाराजा होल्कर की संतानों, सम्बन्धियों, आश्रितों, प्रजा व कर्मचारियों से किसी तरह कासंबंध न रखेगी। उन सब पर महाराजा होल्कर का पूर्ण अधिकार रहेगा। इसी प्रकार का इकरार अंग्रेज सरकार ने निजाम हैदराबाद और सिन्धिया सरकार के साथ भी किया। अंग्रेज सरकार ने स्वीकार किया कि वह होल्कर दरबार में अपना सन्त्री तथा राज्य में शान्ति स्थापित रखने के लिये सेना रखेगी। महाराजा अपना वकील बड़े लाट के पास जब चाहेंगे भेज सकेंगे। इस सन्धि से होल्कर सरकार पर से पेशवा का प्रभुत्व उठ गया।

सन्‌ 1818 में इंदौर राजनगर (राजधानी) नियुक्त किया गया।
इसके बाद जल्दी ही दीवान ताँतिया जोग ने खर्च में कमी करना शुरू की। इस समय इंदौर के इलाकों से बहुत कम मालगुजारी वसूल होती थी। राजकाज चलाने के लिये कर्ज निकालने की जरूरत पड़ी। सेना का एक भाग कान्टिन्जेन्ट में परिवर्तित किया गया और अंग्रेज सरकार के एक फ़ौजी अफसर की अधीनता में महिद्पुर भेज दिया गया। कुछ सैनिक रोब जमाने की गरज से इंदौर के इलाकों में भेजे गये। केबल 500 सवार राजनगर में रखे गये। रक्षा और पुलिस का काम करने के लिये कुछ पैदल सेना भी राजनगर में रखी गई।

अब तक इंदौर राज्य में सवत्र शान्ति स्थापित थी। सन्‌ 1819 में कुछ लोगों ने इधर उधर उत्पात मचाना शुरू किया। सबसे पहले कृष्णकुँवर नामक एक व्यक्ति ने अपने आपको काशीराव का भाई मल्हारराव द्वितीय प्रकट कर चम्बल के पश्चिम में एक सेना का संगठन किया। उसने अरबों और मकरानियों की मदद से महीनों उत्पात मचाया पर महिदपुर की कान्टिम्जेन्ट सेना ने उसे मार
भगाया। इसी समय मल्हारराव द्वितीय के चचेरे भाई हरिराव ने भी सिर उठाया।

सन्‌ 1826 सें ताँतिया जोग की मृत्यु हो गई। इनके मन्त्रित्व-काल
में राज्य की आमदनी 5 लाख से बढ़ कर 30 लाख हो गई थी। इनकी मृत्यु के बाद राज्य-प्रबन्ध क्रमशः बिगड़ता गया। सन्‌ 1829-30 में उदयपुर के इलाकेदार बेगूं के ठाकुर ने नंदवास पर दो बार आक्रमण किया। पर राज्य और कान्टिन्जेन्ट सेना ने उन्हें दोनों बार मार भगाया।

 

 

सन् 1831 में एक ढोंगी ने साठ महाल में कुछ आदमी जमा कर
बलवा किया पर मालवे की कान्टिन्जेन्ट सेना द्वारा वह परास्त और निहत हुआ। 27 अक्टूबर सन्‌ 1833 को 27 वर्ष की अवस्था में मल्हारराव द्वितीय की मृत्यु हो गई। इंदौर में इनकी छत्री बनी हुई है। इनका कद मझला और रंग साँवला था। ये बड़े उदार और दयालु थे। पुराना महल (Old place ) और पंढरिनाथ का मन्दिर-जोकि नगर के मध्य में है-इनके ही समय में बना है।

 

 

इंदौर के महाराज हरिराव होलकर

 

महाराजा मल्हारराव द्वितीय को कोई पुत्र नहीं था। अतएव उनकी रानी साहिबा गौतमाबाई ने अपने पति की मृत्यु के कुछ समय पूर्व ही मातेण्डराव होलकर को गोद ले लिया था। सन्‌ 1833 की 27 अक्टूबर को वे गद्दी-नशीन हुए। अंग्रेज सरकार ने भी इनकी गद्दी नशीनी मंजूर कर ली। पर इसके कुछ ही समय बाद महाराजा यशवन्तराव के भतीजे हरिराव उनके साथियों द्वारा महेश्वर के किले से मुक्त कर दिये गये। इन्हें स्वर्गीय महाराजा मल्हारराव ने कैद किया था। इनका राजगद्दी पर विशेष अधिकार था। इनके साथी इन्हें मंडलेश्वर में पोलिटिकल ऑफिसर के पास ले गये और वहाँ वे होल्कर राज्य की गद्दी के असली उत्तराधिकारी सिद्ध हुए।
राज्य की प्रजा और सिपाहियों ने भी मातेण्डराव का पक्ष त्याग कर हरिराव का पक्ष ग्रहण किया। स्वर्गीय महाराजा मल्हारराव द्वितीय की माता तथा पत्नी ने रेसिडेन्ट के आगे मार्तण्डराव के पक्ष का बहुत कुछ सर्मथन किया। पर उनकी एक न चली। अंग्रेज सरकार ने आखिर हरिराव ही को असली उत्तराधिकारी मान कर उन्हें होल्कर राज्य की गद्दी का स्वामी घोषित कर दिया।

 

 

सन्‌ 1834 की 17 अप्रैल को रेसिडेन्ट की उपस्थिति में हरिराव होलकर इंदौर की मसनद पर बिराजे। हरिराव ने रेवाजी फनसे को राज्य का दीवान मुकर्र किया। यह आदमी बहुत खराब चाल-चलन का था। इसे राज्य-शासन का कुछ भी अनुभव न था। इसकी नियुक्ति से राज्य में निराशा ओर असंतोष छा गया। राज्य की आमदनी घट कर 9 लाख रह गई । खर्च बढ़ कर 24 लाख तक पहुँच गया। 12 लाख केवल फौज के लिये खर्च होते थे। इससे राज्य में अशान्ति और अव्यवस्था का साम्राज्य छा गया। इस अव्यवस्था के कारण लोकमत हरिराव के विरुद्ध ओर मार्तण्डराव के पक्ष में होने लगा। तीन सौ मकरानी और राज्य की फौज के कुछ अफसर मार्तण्डराव से आ मिले। इन सबों ने मिल कर राजमहल को घेर लिया। इन्होंने स्वर्गीय महाराजा मल्हारराव की माता से सहायता के लिये प्रार्थना की। पर उस बुद्धिमती महिला ने इन्कार कर दिया।

 

महाराज हरिराव होलकर
महाराज हरिराव होलकर इंदौर राज्य

 

आखिर ये सब लोग तितर-बितर कर दिये गये। इसी समय रेवाजी की बद अशुभ दीवानगिरी का भी अन्त हुआ। सन्‌ 1836 के नवम्बर में रेवाजी अपने पद से अलग कर दिये गये। इनके बाद भी राज्य की दशा खराब ही रही। पश्चात्‌ महाराजा हरिराव के भवानीदीन नामक एक मर्जीदान को दिवानगीरी का पद मिला। यह रेवाजी से भी खराब और अयोग्य था। यह भी उक्त पद से बर्ख्वास्त कर दिया गया। अब महाराजा हरिराव ने अपने हाथों से इंदौर की राज्य-व्यवस्था चलाने का निश्चय किया। पर उनकी तन्दुरुस्ती ने उनका साथ नहीं दिया। अतएव उन्हें बीच बीच में फिर दिवानों को नियुक्त करने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। उन्होंने राज-कार्य में सहायता देने के लिये राजाभाऊ फनसे को बुलाया। पर यह बड़ा शराबी था। इसने भी शासन-काय में अपनी अयोग्यता का परिचय दिया। इसके बाद नारायणराव पलशीकर इस कार्य के लिये बुलाया गया। पर सन्‌ 1837 के अक्टूबर में उक्त दीवान साहब का भी शरीरान्त हो गया। महाराजा हरिराव की तन्दुरुसती गिरती ही गई। राज्य-सम्बन्धी चिन्ताओं ने उनकी तन्दुरुसती को बड़ा धक्का पहुँचा था। आखिर सन्‌ 1843 की 16 अक्टूबर को उनका परलोक-वास हो गया।

 

 

महाराजा खंडेराव होलकर

 

जब महाराज हरिराव होलकर अपनी अन्तिम शय्या पर लेटे हुए थे, उस समय रेसिडेन्ट ने उन्हें गोद लेने की सलाह दी थी। उन्होंने
बापू होल्कर के पुत्र खंडेराव को अपना उत्तराधिकारी चुना था। सन्‌ 1843 की 13 नवबर को खंडेराव इंदौर के राज्य-सिंहासन पर बिराजे। इस समय राजाभाऊ फनसे इंदौर राज्य के दीवान मुकर्र किये गये। इन्होंने बालक महाराज पर अपना बड़ा दबदबा जमा लिया। ये एक तरह से सर्व सत्ताधिकारी हो गये। पर महाराजा खंडेराव इस संसार में अधिक दिनों तक नहीं रह सके। वे सन्‌ 1844 की 17 फरवरी को 15 वर्ष की अलपायु में इंद्रलोक यात्रा संवरण करने के लिये बाध्य हुए। इनको भी कोई संतान न थी। महाराजा खंडेराव की मृत्यु के पश्चात्‌ पुनः उत्तराधिकार का सवाल उठा। मां साहबा मार्तण्डराव के पक्ष में थीं। प्रजा भी मार्तण्डराव का पक्ष समर्थन कर रही थी। पर इस समय अंग्रेज सरकार की नीति में बहुत अन्तर पड़ गया था। अब वह अधिकार के घरेलू मामलों में भी हस्तक्षेप करने लग गई थी। अतएव अंग्रेज सरकार ने मां साहबा और प्रजा की बात पर ध्यान न देकर मार्तण्डराव के हक को अस्वीकार कर दिया। हा, उससे ( अंग्रेज़ी सरकार ने ) मा साहबा को भाऊ होल्कर के पुत्र को गोद लेने की अनुमति दे दी। रेसिडेन्ट ने खुले दरबार में अंग्रेज़ सरकार की इच्छा को प्रकट करते हुए भाऊ होलकर के पुत्र को इंदौर राज्याधिकार के लिये नामांकित किया।

 

 

इंदौर रजवाड़ा के महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय )

इंदौर के महराजा तुकोजीराव द्वितीय का राज्याभिषेक-उत्सव सन्‌ 1844 की 27 जून को हुआ। इस समय 21 तोपों की सलामी हुईं। महाराजा को गद्दीनशीनी की सनद् लेने के लिये कहा गया। महाराजा को यह बात मजबूर होकर स्वीकार करनी पड़ी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह बात सन्धि के खिलाफ़ थी। जिस हालत में महाराज तुकोजीराव द्वितीय होल्कर इंदौर की राजगद्दी के मालिक हो चुके थे, उन्हें सनद देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। होल्कर राज्य उनके पूर्वजों की तलवार से जीता गया था न कि अंग्रेजी सरकार से वह दान में मिला था। महाराज की नाबालिग अवस्था में मा साहबा ने कौंसिल ऑफ रिजेन्सी की सहायता से राज्य- व्यवस्था का संचालन किया। राजा भाऊपन्त, रामराव नारायण पलशीकर और खासगी दीवान गोपालराव बाबा कौंसिल के सदस्य थे। इस समय इंदौर के रैसिडेन्ट एक सहृदय और उदार महानुभाव थे, जिनका कि नाम हेमिल्टन था। इनकी मित्रता-पूर्ण राय से राज्य के कारोबार में बड़ी सहायता मिली थी। इनका बाल महाराज पर अगाध प्रेम था। ये महाराज को अपने पुत्र की तरह मानते थे। महाराज का हृदय भी इनसे गदगद रहता था। वे अपने जीवन भर तक इन्हें याद करते रहे। उन्होंने स्मारक-स्वरूप इंदौर में इनकी एक भव्य मूर्ति बना रखी है।

 

 

सन्‌ 1848 में कौंसिल के सीनियर मेंबर राजाभाऊ अपने दुर्व्य –
वहारों के कारण अपने पद से हटा दिय गये और उनके स्थान पर रामराव नारायण पलशीकर नियुक्त किये गये। सन्‌ 1849 में मां साहबा का स्वर्गवास हो गया। यहाँ यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि राज्य की सब प्रजा मा साहबा को पूज्य दृष्टि से देखती थी ओर उनका बाल महाराज पर बड़ा प्रभाव था। अब महाराज को राज्य के कारोबार पर विशेष दृष्टि रखने की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। आप राज्य की कौंसिल में नियमित रूप से बैठ कर शासन-सस्बन्धी व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने लगे। महाराजा बड़े प्रतिभा-सम्पन्न पुरुष थे और उनकी ग्राह्य-शक्ति बड़ी ही अद्भुत थी। इससे शासन-सम्बन्धी कार्यों को वे बड़ी ही स्फूर्ति के साथ हृदयगम कर लेते थे।

स्वर्गीय मा साहबा कृष्णाबाई और तत्कालीन रेसिडेन्ट मि० राबर्ट
हेमिल्टन ने बाल महाराज की शिक्षा का बड़ा ही उत्तम प्रबन्ध किया था। आप की शिक्षा का भार मुन्शी उम्मेदसिंह नामक एक अनुभवी शिक्षक पर रखा गया था। महाराजा ने संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी भाषा का बहुत ही अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। मि० हेमिल्टन ने महाराज की कार्य कुशलता और शासन-प्रेम के सम्बन्ध में लिखा हैः—

 “बालक महाराज की बढ़ती हुई बौद्धिक प्रतिभा और राज्य-शासन के सम्बन्ध में सूक्ष्म जानकारी प्राप्त करने की उनकी उत्कृष्ट इच्छा थी। वे राज्य के भिन्न भिन्न महकमों में जाकर बैठ जाते थे और वहाँ किस तरह काम होता है इस बात को बड़ी बारीक निगाह से देखते थे। इसमें महाराज एक विशेष प्रकार का आनन्द अनुभव करते थे। यह बात तत्कालीन कौंसिल के सीनियर मेम्बर राजाभाऊ फनसे को अच्छी न लगती थी और वह इससे अप्रत्यक्ष रूप से महाराज की बुराई कराने लगा। इसमें शक नहीं कि महाराज छोटी छोटी गलतियों को झट पकड़ लेते थे और किसी की यह ताकत नहीं थी कि वह उनकी आँख बचाकर एक पैसा भी खा जाये अथवा व्यर्थ खर्च कर डाले।”

पहले पहल श्रीमान महाराजा तुकोजीराव इंदौर राज्य में फाइनेन्स और अकाउन्टेंसी का काम देखने लगे। सन्‌ 1850 की 19 दिसम्बर को श्रीमान्‌ उत्तरीय भारत की यात्रा करने के लिये इंदौर से रवाना हुए। यह यात्रा आपने अपने घोड़े की पीठ पर ही की। सन्‌ 1851 की 3 मार्च को आप इंदौर लौट आये। सन् 1852 में महाराज शासन-कार्य देखने लगे। महाराजा की कार्यपटुता को देखकर सर हेमिल्टन विभोहित हो गये। उन्‍होंने ( सर हेमिह्टन ने ) अंग्रेज सरकार के पास जो रिपोर्ट भेजी थी उसमें महाराजा की असाधारण योग्यता, अपूर्व ब्रह्मशक्ति, राजनीतिज्ञता तथा विलक्षण स्मरण शक्ति की बड़ी प्रशंसा की थी। इसी साल अर्थात सन्‌ 1852 की 8 मार्च को इंदौर में एक दरबार हुआ। इसमें इंदौर के रेसिडेन्ट सर हेमिल्टन तथा रियासत के जागीरदार, जमींदार और अमीर उमराव सब उपस्थित थे। इसमें महाराज को पूर्ण राज्याधिकार प्राप्त हुए। इस अवसर पर सर हेमिल्टन ने उपस्थित सज्जनों को सम्बोधित करते हुए कहा था–“महाराज के कर कमलों में आज से राज्य के पूर्ण अधिकार रखे जाते हैं, हर एक को उनकी आज्ञा का पालन करना चाहिये। सब ही का यह कर्तव्य है कि वे महाराज के आज्ञा कारक और राज्य भक्त रहें।” इसके दूसरे दिन फिर दरबार हुआ। इस में महाराजा ने कई लोगों को जागीरें और इनाम दिये। इसी साल के दिसम्बर मास में महाराजा ने हिन्दुस्तान की यात्रा की। इस यात्रा में इंदौर महाराजा कई महत्वपूर्ण स्थानों में पधारे।

 

 

सन्‌ 1857 में हिन्दुस्तान में अंग्रेज सरकार के खिलाफ भयंकर
विद्रोह अग्नि सुलग उठी। शुरू शुरू में मेरठ में इसकी चिनगारी चमकी और वड़वानल की तरह यह सारे हिन्दुस्तान में फैल गईं। महिद्पुर और भोपाल में अंग्रेजों ने जो हिन्दुस्तानी सेना रखी थी, वह भी इस विद्रोह में शामिल हो गई। इसका असर बिजली की तरह इंदौर और मऊ में भी पहुँचा। इस समय इंदौर के लोकप्रिय रेसिडेन्ट मि० हेमिल्टन बदल चुके थे और उनके स्थान पर कर्नल डूरेन्ड आये थे। उन्हें महाराजा ने बहुत समझाया कि वे अपने स्त्री, बच्चों तथा खजाने को मऊ भेज दें। पर उन्होंने महाराजा की बात को अस्वीकार कर दिया। विद्रोहियों ने सन्‌ 1857 की 1 जुलाई को इंदौर रेसिडेन्सी पर हमला कर उसे बुरी तरह लूटा। इस दिन भी महाराज ने कर्नल डूरेन्ड को लिखा कि वे ( महाराजा ) उन्हें अपनी शक्ति भर सहायता करने के लिये तैयार हैं। पर साथ ही उन्होंने यह भी जतला दिया था कि मेरी फौजें मेरे अधिकार से बाहर हो गई हैं । कर्नल डूरेन्ड सिहोर की ओर चले गये। यह घटना होने के बाद महाराजा ने अपने विश्वासपात्र सैनिकों को घायल यूरोपियनों के लाने के लिये भेजा। कहने की आवश्यकता नहीं कि महाराजा ने कई घायल यूरोपियनों को आश्रय दिया और उनकी सेवा का भी अच्छा प्रबन्ध किया। उन्होंने रेसिडेन्सी से भागे हुए लोगों को भी अपने यहाँ आश्रय दिया। इंदौर रेसिडेन्सी खजाने में जो कुछ बचा था उसे लेकर महाराजा ने मऊ के केप्टन हंगर फोर्ड के पास भेज दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने उक्त कर्नल को अपनी शक्ति भर सहायता दी। अमझरा और सरदारपुर में ठहरे हुए महाराजा के फौजी अफसरों ने भोपाल के पोलिटिकल एजेन्ट कर्नल हचिसन को बहुत सहायता पहुँचाई। सन्‌ 1860 में जबलपुर में जो दरबार हुआ था उसमें तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड केनिंग ने उक्त सहायताओं को मुक्तकंठ से स्वीकार किया था । पर दुःख है कि महाराजा सिन्धिया और निजाम की सेवाओं को स्वीकार कर अंग्रेज सरकार ने जिस प्रकार इन दोनों महानुभावों को पुरस्कार स्वरूप कुछ मुल्क दिया था, वैसा महाराजा तुकोजीराव द्वितीय को नहीं दिया गया। उनके हृदय में इस बात का दुःख हमेशा रहा। वे इसे अपने प्रति अन्याय समझते रहे। उनका यह ख्याल था कि इसका कारण कर्नल डूरेन्ड का पैदा किया हुआ विपरीत प्रभाव है। कर्नल डूरेन्ड सन्‌ 1857 के दिसम्बर मास तक इंदौर के रेसिडेन्ट तथा ए० जी० जी० और बाद में अंग्रेजी-सरकार के वेदेशिक-विभाग के सेक्रेटरी रहे । ये महाराजा तुकोजीराव द्वितीय के सख्त खिलाफ थे और उनके हित का हमेशा विरोध किया करते थे।

 

महाराजा तुकोजीराव द्वितीय
महाराजा तुकोजीराव द्वितीय इंदौर रजवाड़ा

 

बलवे के बाद महाराज को इंदौर राज्य-कार्य में मदद देने के लिये एक योग्य दीवान की आवश्यकता प्रतीत हुईं। उन्होंने अपने प्रियमित्र मि० हेमिल्टन की राय से इस जिम्सेदारी के पद पर सुप्रख्यात्‌ राजनीतिज्ञ सर टी० माधवराव को नियुक्त किया। आप ने इस पद पर नियुक्त होते ही राज्य-शासन में अनेक सुधार करने शुरू कर दिये। आपने शासन के जुडिशियल, पुलिस, रिव्हेन्यू आदि विभागों का पुनर्संगठन किया। 1872 के 3 दिसम्बर को लॉर्ड नाथब्रक इंदौर राज्य के अन्तर्गत बढ़वाह नामक स्थान पर पधारे। वहाँ उन्होंने कई राजा महाराजाओं तथा अंग्रेज अफसरों के सामने नर्मदा नदी के पुल का नींव का पत्थर रखा। लार्ड महोदय ने इस अवसर पर श्रीमान महाराज तुकोजीराव द्वितीय की बड़ी प्रशंसा की थी। सन् 1873 में तुकोजीराव द्वितीय दक्षिण भारत के कई तीर्थ स्थानों में पधारे। इसी समय आप बम्बई और पूना भी तशरीफ ले गये थे। पूना में आपको कई दक्षिणी सरदारों के साथ मित्रता करने का अवसर प्राप्त हुआ। आपने यहाँ जमना बाई साहब गायकवाड़ के साथ भी बड़ी सहानु भूति प्रकट की और उन्हें बड़ौदा के मामले में पूर्ण सहायता देने का वचन भी दिया। सन् 1874 में श्रीमान्‌ कलकत्ते पधारे और वहाँ व्हायसराय के अतिथि रहे। श्रीमान्‌ व्हाइसराय ने आपका बड़ा स्वागत किया। इसी समय बड़ौदा के महाराजा मलहारराव पर अंग्रेज सरकार ने एक दुर्व्यवहार का अपराध लगाया था। उनके अपराधों की जाँच करने के लिये भारत सरकार मे एक कमीशन नियुक्त किया था। वायसराय ने महाराजा तुकोजीराव द्वितीय से इस कमिशन में बैठने के लिये पूछा था। पर महाराजा ने किसी खास सिद्धान्त के कारण कमिशन में बैठने से इन्कार कर दिया था । सन् 1875 में वायसराय की प्रार्थना को स्वीकार कर श्रीमान्‌ ने अपने प्रधान मंत्री सर० टी माधवराव को बड़ौदा के प्रधान संत्रित्व का पद स्वीकार करने के लिये अनुमति दे दी। सर टी० माधवराव के स्थान पर रघुनाथराव इंदौर राज्य के प्रधान मन्त्री हुए। इन्होंने भी सर० टी० माधवराव की तरह राज्य-शासन में अनेक प्रकार के सुधार करना शुरू किये।

 

 

सन्‌ 1875 में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड नाथब्रक इंदौर पधारे और वे महाराजा के अतिथि रहे। सन् 1876 में
प्रिन्स ऑफ वेल्स भी इंदौर पधारे, जिनका महाराजा साहब ने अच्छा स्वागत किया। सन्‌ 1877 में दिल्ली में जो दरबार हुआ था उससे भी इंदौर के राजा श्रीमान्‌ पधारे थे।  इंदौर के राजा को को जी० सी० एस० आई० की उपाधि पहले ही प्राप्त थी, अब सी० आई० ई की उपाधि भी प्राप्त हो गई। आप श्रीमती सम्राज्ञी विक्टोरिया के कौंसिलर भी हो गये थे। भारत सरकार ने आपकी तोपों की सलामी 19 से बढ़ाकर 21 कर दी। दिल्‍ली दरबार में महाराजा का प्रभाव प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता था। दूसरे राजा महाराजा आपको अपना पथ-प्रदर्शक मानते थे। आपकी सम्मति का वे बड़ा आदर करते थे। भारत के प्रायः सब राजा महाराजाओं से आपकी मेत्री थी। सन्‌ 1879 में श्रीमान्‌ तुकोजीराव ने महाराजा सिन्धिया को अपनी राजधानी में निमन्त्रित किया था। महाराजा सिन्धिया निमन्त्रण स्वीकार कर इंदौर पधारे और एक सप्ताह तक श्रीमान्‌ के अतिथि रहे। सन्‌ 1882 में श्रीमान तुकोजीराव द्वितीय ने अपनी महारानी साहबा सहित बद्रीनारायण की यात्रा की। रास्ते में आप जयपुर ठहरे। जयपुर नरेश महाराजा माधोसिंहजी ने आपका बड़ा स्वागत किया। बद्री नारायण से लौटते समय श्रीमान्‌ तुकोजीराव द्वितीय लार्ड रिपन से मिलने नैनीताल ठहरे। यहाँ आपने अंग्रेज अधिकारियों पर अच्छा प्रभाव डाला। सन्‌ 1886 की 17 जून को महाराजा तुकोजीराव द्वितीय ने अनेक महान्‌ कार्य करने के पश्चात्‌ इंद्रलोक यात्रा संवरण की।

होल्कर राज्यवंश में महाराजा तुकोजीराव द्वितीय एक असाधारण प्रतिमाशाली नरेश हो गये थे। आप उत्कृष्ट श्रेणी के बुद्धिमान राजनीतिज्ञ थे। राज्य-प्रबन्ध करने की आप में अच्छी योग्यता थी। महाराजा मल्हारराव को इंदौर जैसे महान और विशाल राज्य की नीव डालने का यश प्राप्त है। श्रीमती देवी अहल्याबाई अपने दिव्यचरित्र, अलौकिक पुण्य तथा अनेक सदगुणों के कारण भारत में अपना नाम अमर कर गई है। महाराजा यशवन्तराव ने अपनी वीरता और समय सूचकता से इंदौर -राज्य की महानता को अक्षय रखने का गौरव प्राप्त किया। पर तुकोजीराव द्वितीय ने सन्‌ 1818 की की घटी हुईं रियासत को उन्नति और समृद्धि के ऊँचे शिखर पर पहुँचाने का श्रेष्ठ गौरव प्राप्त किया।

 

 

जब महाराजा तुकोजीराव ने इंदौर राज्य-शासन का भार ग्रहण किया था, तब इंदौर रियासत की आमदनी 22 लाख थी। खजाना खाली पड़ा हुआ था। पर आपके सुशासन की वजह से रियासत की आमदनी 22 लाख से बढ़कर 65 लाख हो गई। खजाना भरपूर हो गया। इंदौर राज्य के व्यापार, खेती और उद्योग धन्धों आदि में असाधारण उन्नति हो गई। इन्हीं महाराजा के समय में इंदौर को विद्या केन्द्र बनाने का प्रधान रूप से सूत्रपात हुआ। आपके इंदौर राज्य में उस समय कई नई पाठशालाँ खोली गई। खेती की ओर श्रीमान्‌ का विशेष ध्यान रहता था। सन्‌ 1865 में आपने इंदौर राज्य-भूमि की पूरी पेमाइश करवाई। किसानों को खेती की तरक्की के लिये खुले हाथों से तकाबी दी जाती थी। इंदौर राज्य में आबपाशी का बड़ा ही उत्तम प्रबन्ध किया गया था ओर इसके लिये 40 लाख रुपये खर्च किये गये थे। श्रीमान्‌ अपने राज्य में बार बार दौरा कर किसानों की स्थिति का प्रायः निरीक्षण किया करते थे। आप पटेलों और किसानों से स्वतन्त्रता पूर्वक मिलते थे और खेती के सम्बन्ध में उनसे बातचीत किया करते थे। आप किसानों को उत्साहित करने के लिये पुरस्कार एवम पोशाकें आदि वितरण किया करते थे। इंदौर राज्य के वृद्ध किसान आज भी आपको बड़ी भक्ति से स्मरण किया करते हैं और श्रीमान्‌ के शासन-काल के सुखी दिनों को याद करते हैं । राज्य की व्यापारिक और औद्योगिक उन्नति की ओर भी श्रीमान्‌ का विशेष ध्यान रहता था। आज भारतवर्ष के व्यापारिक क्षेत्र में इंदौर को जो अत्युच्च स्थान प्राप्त हुआ है उसका मूल श्रेय श्रीमान्‌ को ही है। आप कई व्यापारियों को व्यापार की उन्नति के लिये आर्थिक सहायता दिया करते थे। श्रीमान्‌ ने ठीक समय पर आर्थिक सहायता देकर कई साहुकारों को दिवालिया होने से बचा लिया और उन्हें अपनी पूर्व-स्थिति में ला देने का श्रेय प्राप्त किया था। इंदौर राज्य में ग्यारह पंच नाम की जो प्रसिद्ध व्यापारिक संस्था है उसे श्रीमान्‌ की ओर से विशेष उत्तेजन मिला करता था। इस संस्था को श्रीमान्‌ की ओर से कई अधिकार प्राप्त थे। श्रीमान्‌ ने इंदौर राज्य के एक्साइज और सायर विभागों को पुनः संगठित किया जिससे उनके द्वारा विशेष आमदनी होने लगी। न्याय और पुलिस विभागों में सुधार किये गये। नये कानून बनाये गये। इंदौर राज्य फौज की तरक्की की गई। मध्य भारत में आप ही पहले नरेश हैं जिन्होंने अपने इंदौर राज्य में 15 लाख रुपयों की पूंजी से स्टेट मिल खोली। यह मिल अब तक चलती है। इस मिल के खोलने में यह उद्देश था कि लोगों को सस्ता कपड़ा मिले। इंदौर के राजा होते हुए भी आप लोगों के सामने अपना आर्दश रखने के लिये इस मिल का मोटा कपड़ा पहनते थे। आपने और भी कई प्रकार के उद्योग धन्धों को तरक्की पर पहुंचाया। इन्ही सब बातों से इंदौर राज्य के नृपति गण में श्रीमान्‌ एक उच्च- श्रेणी के शासक माने जाते हैं। श्रीमान्‌ का प्रजा प्रेम, उनका आदेश शासन आज के नृपतियों के लिये एक दिव्य आदर्श है । श्रीमान्‌ अपनी इंदौर की प्रजा के सुख दुःख से बहुत ही प्रभावित होते थे । वे अपनी इंदौर प्रजा को दुखी नहीं देख सकते थे । उन्होंने इंदौर रियासत के तहसीलदारों और पटवारियों को एक सरक्यूलर निकाल कर सूचना दी थी कि इंदौर राज्य का कोई मनुष्य भूखों न मरने पाये।

 

 

 

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