आंद्रे मैरी एम्पीयर का जीवन परिचय और आंद्रे मैरी एम्पीयर की खोज

आंद्रे मैरी एम्पीयर

इतिहास में कभी-कभी ऐसे वक्त आते हैं जब सहसा यह विश्वास कर सकता असंभव हो जाता है कि मनुष्य की नृशंसता, और वह भी अपने एक ही साथी की जान लेने के लिए इस हद तक पहुंच सकती है। फ्रांस की राज्य क्रांति के अनन्तर आतंक का जो राज्य आया वह मानव इतिहास का कुछ ऐसा ही अध्याय है। उन दिनों पब्लिक सेफ्टी के नाम से जो कमेटी जनता ने खुद बनाई थी उसने क्रान्ति के मूल नारे–स्वतन्त्रता, समानता और भ्रातृता का क्‍या मज़ाक बना डाला था, हजारों आदमी गिलोटीन पर चढ़ा दिए गए, महज एक ज़रा से शब्द की बिना पर, कोई मुकदमा नहीं, कोई सुनवाई नहीं। फांसी की इन सज़ाओं का हाल पढ़ के दिल दहल जाता है, किन्तु एक ऐसी ही सज़ा का गवाह तब 18 साल के कच्चे छोकरे, आंद्रे मैरी एम्पीयर को भी होना पड़ा था। लोग उसे खींचकर बाहर निकाल लाए कि वह अपनी ही आंखों से अपने बाप का कत्ल होता देखे। इस घटना के बाद आंद्रे निराशा के समुद्र में डूबने-उतरने लगा। उसके हृदय को, बुद्धि को जो प्रत्यक्ष चोट पहुंची, साल भर वह संभल नहीं सका। जिन्दगी में बिलकुल अकेला, कोई सहारा नहीं, कोई आश्वासन नहीं। उसे यही मालूम नहीं कि वह कहां है। अभी जिन्दगी शुरू ही नहीं हुई थी कि विश्व अपने इस महान वैज्ञानिक को प्राय: खो बैठा था।

 

 

आंद्रे मैरी एम्पीयर का जीवन परिचय

 

आंद्रे मैरी एम्पीयर का जन्म 22 जनवरी 1775 ई० के दिन फ्रांस में लिओन्स के एक कस्बे में हुआ था। बाप सन का व्यापारी था। किन्तु व्यापारी होते हुए भी स्वाध्याय की प्रवृत्ति उसमें कुछ कम नहीं थी। लेटिन और ग्रीक के क्लासिक साहित्य में स्वयं उसी ने बालक को प्रथम दीक्षा दी। किन्तु शुरू से ही एम्पीयर के लक्षण एक गणितज्ञ बनने के ही थे। बडी ही छोटी उम्र में अभी उसे लिखने-पढने की समझ बिलकुल नही थी। आंद्रे मैरी एम्पीयर गणित की समस्याओं का समाधान कंकड़ पत्थर जोडकर ही कर लिया करता था। 11 वर्ष का होते-होते वह लेटिन भाषा में प्रवीण हो चुका था, और केल्क्युलस में भी उसकी समझ काफी बढ़ चुकी थी।

 

 

बाप के कत्ल का धक्का जब कुछ शान्त होने लगा, तभी उसे समझ आई कि जिन्दा रहने के लिए कुछ कमाना भी पडता है। जो जरिया रोटी-पानी का परिवार के पास था, कान्ति ने उसे बिलकुल उजाड़ छोड़ा था। इसलिए एम्पीयर ने अपनी पढाई भी जारी रखी और गुज़र के लिए गणित मे, भाषाओं मे, विज्ञान मे प्राइवेट ट्यूटर के तौर पर दूसरो को पढ़ाता भी रहा। किन्तु इन काम धन्धों में वह इतना उलझा हुआ भी नही था कि वह ज्यूलियट कैरो की मोहिनी से आकृष्ट न हो सके और उसे अपनी पत्नी न बना सके।

 

आंद्रे मैरी एम्पीयर
आंद्रे मैरी एम्पीयर

 

एक वर्ष के बाद सन् 1800 में इस सुखी युगल के घर जिए जैक्वीस एम्पीयर नाम के बालक का जन्म हुआ जो आगे चलकर फ्रेंच एकेडमी का सदस्य, एक प्रसिद्ध इतिहासकार और उच्च कोटि का साहित्यकार भी हुआ किन्तु व्यक्तिगत जीवन का यह सुख शायद उसके लिए बहुत दिनों का नही था। 1804 में उसकी प्रिय पत्नी का देहान्त हो गया, जिसके धक्के से बच निकलने के लिए उसने वैज्ञानिक अनुसन्धान मे ही अब अपने को दिन-रात खपा दिया।

 

 

आंद्रे मैरी एम्पीयर की खोज

 

 

विज्ञान और गणित के क्षत्र के विद्वान अब एम्पीयर की ओर आकर्षित होने लग गए थे। और उनके इस आकर्षण का आधार एम्पीयर का लिखा एक लेख ही था। बडे अर्से से गणितज्ञों के सामने एक समस्या बनी चली आती थी। किसी को समझ नही आ रहा था कि कुछ खेलो मे जो नतीजे नियमानुसार स्पष्ट नजर आ रहे होते वे अन्त तक पहुचते-पहुंचते न जाने कैसे गायब हो जाते। और एम्पीयर ने इस बात को अपने एक लेख में गणित के एक सूत्र में बद्ध कर दिया कि हमारी इन लीलाओं में भाग्य कैसे और कब घुस आता है।

 

 

जिए देलाब्रे और यूसफ ललान्दे फ्रांस के माने हुए दो गणितज्ञ और नक्षत्र विज्ञानी थे, जो आंद्रे मैरी एम्पीयर की प्रस्तुत स्थापना से बहुत ही प्रभावित हुए। दोनो ने उसकी सिफारिश लिओसन्स के सेकण्डरी स्कूल में गणित और नक्षत्र शास्त्र पढ़ाने के लिए कर दी। वह दो साल यहां रहा ओर उसके बाद 1808 में पॉलिटैक्निक स्कूल मे उसकी नियुक्ति हुई। वह इंजीनियरिंग का प्राध्यापक बनकर चला आया। 1809 मे इसी संस्था से गणित और मेकेनिक्स विभाग का उसे अध्यक्ष बना दिया गया। जो लेख उसके छपते रहे उनके विषय बहुत ही व्यापक थे– केल्क्युलस आफ कैमिस्ट्री,, नेत्रविज्ञान’, ‘प्राणिविज्ञान’ आदि। और इन्ही प्रकाशित निबन्धों के आधार पर उसे ‘इन्स्टीट्यूट आफ आर्टस एण्ड साइंस्सेज का सदस्य भी चुन लिया गया। याद रहे कि इस संस्था के सदस्य प्रतिष्ठित वैज्ञानिक तथा कलाकार ही हो सकते है।

 

 

1819 में एक डेनिश वैज्ञानिक योहान सी० एस्टेंड ने एक परीक्षण का विवरण छापा। इसमे बताया गया था कि किस प्रकार एक चुम्बकित सुई विद्युत के किसी तार के पास पहुचते ही चंचल हो उठती है। यह एक बडी महत्त्वपूर्ण खोज थी, क्योकि विद्युत मे
तथा चुम्बक शक्ति में परस्पर कुछ अज्ञात सम्बन्ध है, यह उसने इस प्रकार साबित कर दिया। आज हम ऐसा महसूस करते हैं कि आंद्रे मैरी एम्पीयर के प्रसिद्ध परीक्षण को प्रदर्शित करने के लिए बहुत ही थोडा वक्‍त लगना चाहिए था। यही नही, खुद एम्पीयर को भी महसूस हुआ कि यह काम खुद एस्टेंड ही कर सकता था। उसने सचमुच कहा भी कि एस्टेड से जब एक बार यह देख लिया कि विद्युत की एक धारा चुम्बक की सुई पर इस प्रकार प्रभाव डालती है, तो यह सन्देह उसी वक्त किसी को भी उठ सकता था कि हो न हो ये दो सर्किट है जिनमे से बिजली गुजर रही है और इसीलिए दोनों मे यह परस्पर सम्बन्ध है। किन्तु एम्पीयर ने यह भी स्पष्ट कर दिखाया कि एस्टेंड इस तथ्य को कैसे नजर अन्दाज कर गया। बात यह है कि कोमल लोहे का एक टुकडा ही तो एक चुम्बक सुई की ओर आकृष्ट होता है यद्यपि मृदुलोह की दो पतरियों में कोई परस्पर क्रिया नही होती।

 

 

एम्पियर ने एक परीक्षण का आयोजन किया जिसमे धातु की दो छड़ों को समातान्तर रख दिया गया। एक छड को तो एक चाकू के सिरो के नीचे लटका दिया गया, इस प्रकार कि उसका भार सभला भी रहे और आसानी से हिल-डुल भी सके। किंतु दूसरी छड़ को एक ही स्थान पर स्थिर कर दिया गया और जब दोनो छडों मे बैटरियों के साथ सम्पर्क कर दिया गया तब वह छड़ जो स्वतन्त्र हिल सकती थी स्थिर टिकी छड़ की ओर आती उससे परे हट जाती, और फिर उसी की ओर आने लगती विद्युत की यह धारा जब एक दिशा मे बह रही होती, तो ये छड़ें परस्पर आकृष्ट होने लगती और फिर विरुद्ध दिशा में जैसे इन्हे कुछ परस्पर वितृष्णा हो। एम्पियर ने इस प्रकार एक अद्भुत सत्य सिद्ध कर दिखाया। यह चुम्बक-शक्ति लोहे के बिना चुम्बक के बिना सिर्फ बिजली के जरिए भी पैदा की जा सकती है। विद्युत की धारा के आसपास भी कुछ वैसा ही क्षेत्र बन जाता है जैसा कि एक चुम्बक के गिर्द हम आम तौर पर देखते हैं।

 

 

चुम्बक शक्ति तथा विद्युत के सम्बन्ध मे एम्पीयर का प्रसिद्ध निबन्ध 1823 में प्रकाशित हुआ, जिसकी स्थापना में उद्धृत परीक्षण के अतिरिक्त यह भी उल्लिखित था कि स्थायी चुम्बक में आकर्षण विकर्षण की शक्ति का आधार लोह कणों मे प्रवहमान विद्युत ही हुआ करता है। आधुनिक विज्ञान की स्थापना है कि द्रव्यों के कण ही नही परमाणु भी, दो अंशों से मिलकर बनते है। इनमे एक केन्द्र होता है जिसके इर्द-गिर्द इलेक्ट्रॉन निरन्तर गति कर रहे होते है, और इलेक्ट्रॉनों की यही गति स्वय एक सतत प्रवाह बन जाती है। इस प्रकार एम्पीयर में तथा प्रस्तुत स्थापना में अन्तर तो बहुत अधिक नही रह जाता। हो सकता है वर्तमान वैज्ञानिक इस समस्या का भी समाधान कुछ निकाल ले कि कुछ द्रव्यो को तो चुम्बकित किया जा सकता है, जबकि कुछ दूसरी किस्म के द्रव्यो पर इस चुम्बकीय क्षेत्र का जरा भी असर क्यो नही होता। और इन दोनो के अतिरिक्त एक तीसरी किस्म के द्रव्य भी होते है जो विद्युत अथवा चुम्बक की इस धारा को निर्बल भी कर सकते है।

 

 

आंद्रे मैरी एम्पीयर की गणना संसार के अमर वैज्ञानिकों में होती है। उसके अनुसन्धानों का महत्त्व हो सकता है, ज्यो-ज्यों नये अन्वेषण, नये सिद्धान्त निकलते आए, फीका पडता जाए; किन्तु दुनिया उसे भूल नहीं सकती, क्योकि विद्युत धारा की इकाई को दिया गया वैज्ञानिको का नाम ही एम्पीयर है।

 

 

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