अहल्याबाई की जीवनी – अहल्याबाई होल्कर का जीवन परिचय व कहानी इन हिन्दी

होल्कर साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई होल्कर भारतीय इतिहास की कुशल महिला शासकों में से एक रही हैं। अपने इस लेख में हम राजमाता अहल्याबाई होल्कर की जीवनी, अहल्याबाई का इतिहास, अहल्याबाई का जीवन परिचय, अहल्याबाई होल्कर हिस्ट्री इन हिन्दी में विस्तारपूर्वक जानेंगे।

18वी शताब्दी की बात है। मरहठों की सेना औरंगाबाद के पास एक साधारण गाँव के बाहर मैदान में पड़ी हुईं थी और उसे देखने के के लिए बालक-बालिकाओ की भीड़ लगी हुईं थी। सहसा उस भीड़ को चीरती हुई, नौ वर्ष की एक बालिका आगे बढ़ी ओर सेनापति के सामने जाकर खड़ी हो गयी। सेनापति ने उसे नीचे से ऊपर तक देखा। वह अधिक सुदंर न थी। रूप-रंग साँवला था, वस्त्र ग्रामीण थे, परन्तु उसके प्रशस्त ललाट और मुख-मंडल पर एक विचित्र आभा खिल रही थी। सेनापति ने उसे एक बार फिर देखा और अपनी गोद में लेकर बड़े प्रेम से पूछा–क्या चाहती हो बेटी?

इस प्रश्न से बालिका भयभीत नहीं हुई, मुसकराते हुए बोली– “तुम्हें देखने आयी हूँ।
मुझे?
हाँ तुम्हें। मैं तुम्हारा नाम जानती हूँ।
अच्छा बताओ में कौन हूँ?
प्रलादराव होलकर। मेंने अपने पिता से तुम्हारा नाम सुना है।
तुम्हारे पिता का क्‍या नाम है?
श्री मनकोजी शिदें।
वह कहाँ रहते हैं ?
इसी गाँव में। इसका नाम चोंट है।
ओर तुम्हारा क्या नाम है ?
अहल्या।
तुम मेरे पुत्र से विवाह करोगी ? बालिका इस प्रश्न का उत्तर न दे सकी। वह लज्जित हो गयी ओर भाग फिर बालिकाओ की टोली में मिल गयी परन्तु मल्हारराव के ह्रद पर उसने अपने भोलेपन की जो छाप लगा दी वह अमिट रही।

 

 

अहल्याबाई का जन्म व माता पिता

 

मनकोजी शिंदे बीड़-तालुका के एक साधारण किसान थे। चोंट गांव में उनका घर था। उसी के आस पास उनके खेत थे। खेती ही उनकी जीविका का मुख्य साधन था, परन्तु मरहठों मे उनका बहुत सम्मान था। वह सिंधिया के वंशज थे। कहा जाता है कि विवाह के पश्चात्‌ बहुत दिनों तक उनके कोई सन्तान उत्पन्न नही हुई। उससे उन्हें बड़ी चिन्ता हुई। अन्त मे एक दिन वह भी आया जब उनके घर में एक कन्या ने जन्म लिया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने गौतम ऋषि के पक्षी अहल्या के नाम पर उसका नाम अहल्याबाई रखा। आधुनिक खोजो के अनुसार अहल्याबाई का जन्म 31 मई सन्‌ 1725 ई० के लगभग माना जाता है।

 

 

शिक्षा दीक्षा और संस्कृति

उस समय महाराष्ट्र में शिक्षा का अधिक प्रचार न था। लोग पढ़ना- लिखना व्यर्थ की बात समझते थे। इसलिए अहल्याबाई को उच्चकोटि की शिक्षा न मिल सकी। उसने एक सदाचारी ब्राह्मण से कुछ पढ़ना-लिखना सीखा। प्रतिभा सम्पन्न होने के कारण उसने थोड़े ही दिनों मे हिन्दू-धर्म सम्बन्धी मुख्य-मुख्य ग्रंथों का अच्छी तरह अध्ययन कर लिया। इसका उसके जीवन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। वह बाल्या अवस्था से ही पाप और पुण्य में भेद समझने लगी और उसी के अनुसार उसने अपना जीवन बनाना आरम्भ कर दिया। इस छोटी अवस्था में भी वह इश्वर-पूजन और पुराण-वर्णन न कर लेती थी, तब तक वह भोजन नहीं करती थी। ऐसी थीं उसकी धर्म परायणता। ऐसा था उसका ईश्वर के प्रति प्रेम। उसका स्वभाव अत्यन्त कोमल था। दीन-दुखियों की दशा देखकर उसका हृदय द्रवित हो जाता था। उसमे असीम दया थी। अद्भुत भावुकता थी।

 

महारानी अहल्याबाई होल्कर एक साधारण बालिका थी। उसका डील-डौल मध्यम श्रेणी का था। परन्तु उसकी तेजस्वी ओर बड़ी-बड़ी आंखों में विचित्र आकर्षण था। उसका प्रशस्त ललाट, उसकी काली और घनी भृकुटी, उसकी लम्बी नासिका और गोंल-मुख से उसके चरित्र की महानता और गुणों की गम्भीरता प्रकट होती थी।

 

 

 

अहल्याबाई का विवाह

अहल्याबाई साधारण किसान बालिका थी। गाँव के प्राकृतिक वातावरण में उसका पालन-पोषण हुआ था। इसलिए उसके जीवन मे सादगी और स्वभाविकता थी। वह सुन्दर न होते हुए भी अत्यन्त सुन्दर थी, साधारण होते हुए भी महान थी। कठिन परिश्रम से उसका शरीर निखर आया था। 9 वर्ष की अवस्था ही में वह चौदह वर्ष की जान पड़ती थी। उस समय बाल-विवाह का प्रचलन था। इसलिए मनकोजी शिदें को चिन्ता हुई अहल्या के लिए वर की। बड़ी दौड़ धूप की गयी, परन्तु उसके योग्य कोई वर न मिला। अन्त में वह धथकर बैठ गये। दैवयोग से इस समय मल्हारराव होलकर भी अपने पुत्र खंडेराव के लिए सुयोग्य कन्या की खोज में थे। एक दिन उन्होंने किसी युद्ध से लौटकर अहल्याबाई के गाँव के बाहर एक मैदान में पड़ाव डाल दिया। सौभाग्यवश अहल्याबाई होल्कर से उनकी अचानक भेंट हो गयी। वह उसके गुणों पर मुग्ध हो गये। उन्होंने उसके माता-पिता के सम्बन्ध सें पूछताछ आरंभ की उस समय अहल्याबाई के गुरू वहीं थे। उन्होंने उसके परिवार के सम्बन्ध की सभी बाते मल्हारराव को बता दीं। अपनी इच्छानुसार परिचय पाकर वह अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने अहल्याबाई के पिता से मिलकर अपनी इच्छा प्रकट की। मनकोजी शिंदे ने घर बैठे अपनी मुराद पूरी होते देखकर अपनी एकमात्र कन्या अहल्याबाई का विवाह मल्हारराव होलकर के पुत्र खंडेराव से करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार, सन्‌ 1735 ई० में दोनों एक प्रेम-सूत्र मे बाँध दिये गये।

 

 

 

दाम्पत्य जीवन

अहल्या बालिका से वधू बन गई और अपने झोंपड़े से निकलकर इन्दौर के राज-भवन में पहुँची। यद्यपि इस समय उसके जीवन में महान परिवर्तन हो गया था। तथापि जिन सदगुणों के आधार पर उसने इतना वैभव अर्जित किया था, उनको त्यागना उसने उचित न समझा। एक राजा की पुत्र वधू होने पर भी उसमें वही धार्मिकता, वही स्वभाव की कोमलता और वहीं सेवा-भाव बना रहा। जो उसने बाल्यावस्था में धार्मिक ग्रंथों को पढ़ कर प्राप्त क्या था। यही कारण था कि मल्हारराव होलकर उसको अपने पुत्र से भी अधिक प्यार करते थे, और उनकी धर्म पत्नी गौतमाबाई उसकी सेवा टहल तथा घर-गृहस्थी के काम से अत्यन्त प्रसन्न रहा करती थीं। उसके पति खंडेराव जो अब तक राज्य-कार्य से उदासीन रहा करते थे, अपने पिता की सहायता में तत्यर रहने लगे। इस प्रकार अहल्याबाई ने थोड़े दी दिनों में सब के ह्दय पर अपने सदगुणों की छाप लगा दी। वह सब की प्रेम-पात्री बन गई। कालान्तर में देपालपुर स्थान पर सन्‌ 1745 ई० में उसके गर्भ से एक पुत्र-रत्न उत्पन्न हुआ। इस नवजात शिशु का नाम मालीराव रखा गया। इसके तीन वर्ष पश्चात्‌ सन्‌ 1748 ई० में एक कन्या भी उत्पन्न हुई, इसका नाम मुक्ताबाई रखा गया।

 

 

पति की मृत्यु

मल्हारराव पौत्र और पौत्री पाकर बढ़े प्रसन्न हुए, परन्तु यह सुख ज्यादा समय न रहा। सन् 1754 ई० में खंडेराव अजमेर के जाटों से युद्ध करते समय मारे गये। इस दुर्घटना से मल्हारराव को बड़ा दुःख हुआ। जब अहल्याबाई को यह हृदय-विदारक समाचार मिला,तब वह उस समय की प्रथा के अनुसार सती होने के लिए तैयार हुई, परन्तु मल्हारराव के अधिक आग्रह करने और समझाने बुझाने पर उसने अपना विचार त्याग दिया।

 

 

मल्हारराव की मृत्यु

मल्हारराव वृद्ध हो गये थे। पुत्र-वियोग ने उनकी कमर और भी तोड़ दी थी। अब उनके लिए राज्य का भार संभालना कठिन हो रहा था। मालीराव अभी नासमझ बच्चा था। इन सब बातों का विचार करके मल्हारराव ने शासन का भार अहल्याबाई के हाथों मे दे दिया।

 

महारानी अहल्याबाई होल्कर शासन प्रबंध में बढ़ी चतुर थीं। वह वार्षिक कर लेती थीं, वह खर्च और व्वय का लेखाजोखा खुद देखती थी और उसकी जाँच करती थीं। वह स्वंय प्रत्येक कार्य की देख-रेख रखती थीं ओर प्रजा के सुख के लिए अपने सुख का त्याग करने पर सदैव तत्पर रहती थीं। प्रजा भी उसके शासन से बहुत सतुष्ट और प्रसन्न थी। वह अहल्याबाई को देवी समझती थी और उसके शुणों पर मुग्ध थी। मल्हारराव अपनी पुत्र-वधू की ऐसी योग्यता पर बड़े प्रसन्न रहते थे, परन्तु यह सुख भी वह ज्यादा समय न देख सके। और वह भी अधिक दिनों तक जीवित न रह सके। सन्‌ 1765 ई० में ग्वालियर राज्य के निकट आलमपुर मे वह अचानक बीमार पड़े ओर देखते ही देखते चल बसे। तुकोजी ने उनके शरीर का अन्तिम संस्कार किया। अहल्याबाई ने उनके स्मरणार्थ अधिक द्रव्य व्यय करके उस स्थान पर एक छुतरी बनवा दी और उन्हीं के नाम पर एक गाँव बसा दिया। यह गाँव ग्वालियर से 40 मील की दूरी पर मल्हारगंज के नाम से अब तक प्रसिद्ध है।

 

 

राजमाता अहल्याबाई होल्कर
राजमाता अहल्याबाई होल्कर

 

पुत्र मालीराव की मृत्यु

मल्हारराव होलकर की मृत्यु के उपरान्त उनका पौत्र मालीराव इन्दौर की गद्दी पर बैठा। वह बड़ा चरित्रहीन था और अपना समय भोग-विलास में व्यतीत करता था। माता की धार्मिकता उसे बिलकुल नापसन्द थी। इतिहास लेखकों का कहना है कि उसकी माता निर्धन ब्राह्मणों को जो वस्त्र दान में देती थी, उसमें वह विषैले जन्तु, सर्प-विच्छू इत्यादि छिपा दिया करता था और जब वे उन्हें काटते थे तब वह उतना ही प्रसन्न होता था जितना उसकी माता दुखी होती थी। मालीराव के इस दुर्व्यवहार से अहल्याबाई का चित्त उसकी ओर से फट-सा गया था। परन्तु पुत्र पुत्र ही है, वह कितना ही दुराचारी क्‍यों न हो, माता का स्नेहमयी अ्न्तःकरण उसे भुलाने की ही चेष्टा करता है। यही कारण था कि जब वह किसी देवी प्रकोप से नो महीने शासन करने के पश्चात्‌ बीमार पड़ा, तब अहल्यावाई को बहुत दुख हुआ। बड़े-बड़े हकीम और वैद्यों का इलाज कराया गया। परन्तु उसे कुछ भी लाभ न हुआ। कालान्तर में उसकी भी मृत्यु हो गयी। ईश्वर ने उसके हाथ के सहारे की यह अन्तिम लकडी भी छीन ली। अब इस संसार में उसे सांत्वना देने वाली केवल उसकी पुत्री रह गयी थी।

 

 

इन्दौर पर आक्रमण

मालीराव की मृत्यु के पश्चात्‌ महारानी अहल्याबाई होल्कर ने शासन-प्रबंध का सारा कार्य अपने हाथ में ले लिया। उस समय गंगाधर यशवन्त इन्दौर का दीवान था। वह बड़ा छली और विश्वासघाती था। उसने अहल्याबाई को हटाकर अपनी प्रभुता बढाने के लिए एक चाल सोची। अहल्याबाई बड़ी भावुक थी। वह गंगाधर यशवन्त का भाव ताड़ गयी। इसलिए उसने अपने आगे उनकी एक भी न चलने दी। इससे गंगाधर यशवन्त असतुष्ट हो गया। उसने पेशवा के चचा रघुनाथराव को पूना से इन्दौर पर श्राक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया और अपनी सम्पूर्ण सहायता का वचन दिया। लालची रघुनाथराव इन्दौर पर पहले ही से दाँत लगाये हुए था। इसलिए गंगाधर यशवंत का निमंत्रण पाकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गया और आक्रमण की तैयारी करने लगा। जिस समय अहल्याबाई को यह सूचना मिली उस समय उसने भोसले, गायकवाड़ आदि मराठे-माएडलीक नरपतियों से सहायता की याचना की। सब लोग धर्मपरायण विधवा की रक्षा के लिए तैयार हो गये।

 

 

बडौदा के गायकवाड़ ने एक सेना भेज दी और जन्हुजी भोंसला स्वंय सेना लेकर होशंगाबाद से चल पडा। तुकोजीराव सेनापति बना दिया गया और सेना तैयार करने की आज्ञा दे दी गयी। इस प्रकार थोड़े ही समय में युद्ध की सारी तैयारी हो गयी। ऐसे अवसर पर अहल्याबाई ने पेशवा माधवराव तथा उसकी धर्मपत्नी रामबाई को एक अत्यन्त करूणाजनक पत्र लिखा। इस पत्र का सामयिक प्रमाव पड़ा। माघवराव ने राघोवा के विरूद्ध अपनी सम्मति प्रकट की। इससे अहल्यावाई का साहस और भी बढ गया।

 

राघोबा ने अहल्याबाई को अब तक अब्ला के रूप में ही देखा था। वह यह न जानता था कि अन्तःपुर की एक कुल-बधू इतनी शीघ्र सेना का संचालन कर सकती है। उसे आश्चर्य हुआ उसके साहस पर, उसकी बुद्धि पर, उसकी शासन-पटुता पर, परन्तु अब सोचने का समय न था। दोनों और युद्ध की घोषणा हो चुकी थी। ऐसी दशा में पीछे हटना मर्यादा के विरुद्ध था। इसलिए राघोबा ने सिप्रा नदी के दक्षिण तट की ओर प्रस्थान किया। यह समाचार पाते ही तुकोजीराव उसी नदी के किनारे, उज्जैन के पास एक घाटी में डट गया। दोनों ओर से युद्ध के नगाड़े बजने लगे। राघोवा को विश्वास था कि इन्दौर पर विजय पाना सहज नहीं है। उसे पेशवा माधवराव की सरम्मति का भी पता चल गया था। इसलिए उसका साहस छूट गया। वह पालकी में बैठकर ठुकोनी के पास आया और दूसरे दिन उनके साथ इन्दौर गया। वहाँ उसने अहल्याबाई होल्कर से भेट की। फलतः युद्ध बंद हो गया। राधोवा वहाँ एक मास तक पड़ा रहा। इसके पश्चात्‌ वह पूना लौट गया। इस प्रकार षडयंत्रकारी गंगाधर की समस्त कुचेष्टाएँ विफल हो गयीं। अहल्याबाई उसकी जान ले सकती थी, परन्तु उसने ऐसा न किया। वह उसका पुराना सेवक था। इसलिए उसने उसे उसी पद पर पुनः नियुक्त कर दिया। अहल्याबाई का यह सदव्यवहार देखकर गंगाधर यशवन्त को इतनी ग्लानि हुई कि उसने संन्यास ले लिया।

 

 

मुक्ताबाई का विवाह

अपुल्याबाई बड़ी उदार थी। वह अपनी प्रजा को अपना पत्र समझती थी ओर दिन-रात उसके कष्ट-निवारण की चिन्ता में लगी रहती थी। जब संसार सोता था तब वह जागती थी। इतना करने पर भी इन्दौर-राज्य में चोर, डाकुओं और छुटेरों ने बड़ा उत्पात मचा रखा था। दिन-दहाड़े चोरियाँ होती थीं ओर डाके पड़ते थे। अहल्याबाई ने अपनी प्रजा को इस दुःख से मुक्त करने के लिए कई उपाय सोचे परन्तु सभी निष्फल हुए। अन्त मे उसने अपने राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक सभा की। इस सभा में उसने एक ऐसे वीर पुरुष का आहवान किया जो उसकी प्रजा को दिन-दहाड़े डाका डालनेवालों से मुक्त कर सके। इस प्रस्ताव को सुनकर यशवन्तराव फाण्शे उठ खड़ा हुआ। अहल्याबाई ने धन और सेना से उसकी सहायता की और राज्य की रक्षा एव सुप्रबन्ध के लिए उसे सहर्ष विदा किया। यशवन्तराव ने दो ही वर्षों में राज्य को लुठेरों से मुक्त कर दिया। उसके इस कार्य से अहल्यावाई वड़ी प्रसन्न हुई और उसने अपनी पुत्री मुक्ताबाई का विवाह यशवन्तराव के साथ कर दिया। कालान्तर में मुक्ताबाई के गर्भ से एक पुत्र-रत्न उत्पन्न हुआ। इसका नाम नत्योबा रखा गया। अहल्याबाई ने बहुत कुछ खोकर एक नाती पाया। इसने उसके हृदय के पुराने घाव भर दिये।

 

 

इंदौर राज्य का शासन प्रबंध

अहल्याबाई अब निश्चिन्त थी। तुकोजी उसका प्रधान सेनापति था। वह उसका बहुत विश्वास करती थी। उसी की सहायता से उसने इन्दौर पर लगभग ३० वर्ष तक बड़ी योग्यतापूर्वक शासन किया। इन्दौर का सम्पूर्ण राज्य तीन भागों मे विभाजित कर दिया गया। पहला भाग सतपुड़ा पहाडी के उस पार दक्षिण की ओर फैला हुआ था। दूसरा भाग सतपुडा के उत्तर की ओर महेश्वर के नाम से प्रख्यात था। तीसरा भाग महेश्वरी के उत्तर मे राजपूताने तक फैला हुआ था। इन तीनों भागों की देख-रेख वह स्वयं तुकोजी की सहायता से करती थी। कोष पर उसका निजी
अधिकार था। वह उसे अपनी इच्छानुसार व्यय करती थी। कभी-कभी व्यय के सम्बन्ध में दोनों में वाद विवाद भी हो जाता था, परन्तु इससे अहल्याबाई के मन में किसी प्रकार का द्वेष भाव न आता था। तुकोजी भी अपने ह्रदय में किसी प्रकार का मैल नही आने देते थे। वह अहल्याबाई को सदैव मातेश्वरी कहा करते थे। सच तो यह है कि अहल्याबाई ने अपने पुत्र मालीराव को खोकर तुकोजी को प्राप्त किया था।

 

तुकोजी ने अहल्याबाई की आज्ञा से राज्य का अच्छा प्रबंध किया। उन्होंने प्रजा की भलाई के लिए प्रत्येक उपाय से काम लिया। बाहर का कुल काम उन्हीं के हाथ में था। अहल्याबाई भीतर का काम देखती थी। उसका अधिक समय शासन-कार्य संचालन में व्यतीत होता था। इतना ही नहीं इन कामों से छुट्टी पाने पर वह धार्मिक ग्रंथों का अवलोकन करती थी। वह नित्य प्रातःकाल उठती थी ओर स्नानादि के पश्चात्‌ पूजा-पाठ करती थी। इसके बाद वह भिक्षुओं को भोजन कराती थी और थोड़ी देर आराम करके राज्य-सभा में उपस्थित होती थी। राज-सभा में वह राजमन्त्रियों से सम्भाषण करती थी और शासन की सभी बातों का उचित प्रबन्ध करती थी। इस समय जो प्रार्थी आता था, उसकी बातों को वह बड़े ध्यान से सुनती थी, भरसक उसे संतुष्ट करती थी। इस प्रकार वह दिन भर काम में व्यस्त रहती थी। सूर्यास्त के पश्चात्‌ वह पूजा-पाठ करती थी और नौ बजे फिर शासन के कामों मे व्यस्त हो जाती थी। एक नारी का इतना परिश्रम, इतना त्याग, व्यर्थ न हुआ। इन्दौर की सूखी खेती हरी हो गई। प्रजा शान्तमय जीवन व्यतीत करने लगी। देश धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। रिक्त राज्य-कोष धन से भर गया।

 

 

द्वेषियो के आक्रमण

अहल्याबाई के शासन-काल में बहुत कम युद्ध हुए। वद्द बहुत कम सेना रखती थी। उसके नाम का ऐसा प्रभाव था कि अड़ोस-पड़ोस वाले समर-लोलुप राजाओं को उसके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं होता था। एक बार उदयपुर के शासक चन्द्रावत ने अपनी पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के विचार से तुकोजी की सेना पर आक्रमण कर दिया । इस युद्ध में तुकोजीराव की विजय हुई और उसकी धाक उन लोगों पर खूब जम गई। राघोबा ने भी इसी प्रकार एक बार धन की साँग के बहाने उस पर आक्रमण किया। वह स्वय अपने साथ पाँच सौ स्त्रियाँ लेकर वीर वेष घारण करके रण-क्षेत्र में जा डटी। राघोबा उनका यह साहस देखकर मन ही मन बड़ा लज्जित हुआ और लौट गया। इस प्रकार उसने बुद्धि-बल और साहस से शत्रुओं का भी अच्छी तरह दमन किया।

 

 

अहल्याबाई का स्वभाव

अहल्याबाई का हृदय अत्यन्त कोमल था, परन्तु अन्यायी को उचित दंड देने में वह कभी संकोच नहीं करती थी। वह कठोरता और कोमलता दोनों से काम लेती थी। अपने धर्म में उसका अटल विश्वास था। तीर्थ स्थानों से यात्रियों की सुविधा के लिए उसने देव-मन्दिर तथा धर्मशालाएँ बनवा दी थीं। उसका अधिक धन इन्हीं सब कामों में व्यय होता था। सन्‌ 1795 ई० में उत्तर भारत में दारुण दुर्भिक्ष में उसने असंख्य लोगों की अन्न और वस्त्र से बड़ी सहायता की थी। जगन्नाथजी जानेवाली सड़क के किनारे और केदारनाथ में धर्मशाला उसी ने बनवाई थी। काशी में उसने अपने नाम से गंगा नदी के किनारे एक घाट य
बनवाया था। इन पुण्य कार्यों के अतिरिक्त उसने कई किले भी बनवाये थे। उसने स्थान-स्थान पर कुएँ खुदबाये, सराएं बनवायी ओर सड़क के किनारे वृक्ष लगवाये थे। इन समस्त पुण्य-कार्यो से उसका नाम अमर हो गया। परन्तु मानसिक दुख से उसे छुटकारा न मिला।

 

 

अहल्याबाई की मृत्यु

अहल्याबाई के अन्तिम दिन बडी बुरी तरह से बीते। यह पहले लिखा जा चुका है कि नत्योबा उसका नाती था। वह बडा होनहार बालक था। बीस वर्ष की आयु होने पर एक दिन शीत-ज्वर ने उसका प्राणांत कर दिया। उसकी मृत्यु से यशवन्तराव के हृदय पर इतनी चोट लगी कि वह भी एक वर्ष बाद सन्‌ 1791 ई० मे काल की गोद में सो गये। मुक्ताबाई पति-वियोग सहन ने कर सकी। वह सती होने के लिए तैयार हुई। अहल्याबाई ने उसे बहुत समझाया अपने वैधव्य जीवन की कहानी सुनाई अपने सूनेपन की याद दिलाई, परन्तु मुक्ताबाई के ह्रदय पर उसकी बातों का कोई प्रभाव न पड़ा। अंत में वह सती हो गयी। इस प्रकार एक-एक करके सभी आत्मीय जन उससे विदा हो गये। अब वह संसार में अकेली रह गयी। जीवन का यह सूनापन उसे अखर रहा था। वह धार्मिक कार्यो में व्यस्त रहकर अपना मन बहलाने की बहुत चेष्ठा करती थी, परन्तु उसके हृदय के घाव उसे चैन नहीं लेने देते थे। अन्त में 60 वर्ष की आयु भोगने के पश्चात्‌, वह पुण्यशीला आत्मा 13 अगस्त 1795 को इस दुखमय संसार को त्यागकर स्वर्गंलोक में जा बसी। कितना दुखद अन्त था उस विदुषी का। कितना करुणाजनक जीवन था उस भद्रनारी का। आज इतने दिनों के पश्चात्‌ भी जब उतकी याद आती है हर किसी का हृदय भर आता है, और आँखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित हाने लगती है।

 

 

 

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