अदब और तहजीब तथा भाईचारे मिसाल है लखनऊ

अदब और तहजीब

लखनऊ  सारे संसार के सामने अदब और तहजीब तथा आपसी भाई-चारे की एक मिसाल पेश की है। लखनऊ में बीतचीत करने, अभिवादन एवं कुशलक्षेम पूछने का ढंग काबिले तारीफ रहा है। आइए-आइए जनाब तशरीफ रखिये’ कहते हुए झट खड़े होकर बड़े आदर से आगन्तुक को बैठाना, उसके बैठने पर ही बैठना, ‘नोश फरमाइये’, पान पेश है कुबूल फरमाइये’ कहते हुए पान पेश करने का लखनवी अन्दाज अपने आप में निराला ही है। इसी तरह से अभिवादन के भी तमाम आत्मिक अनुभूति युक्त वाक्य है।

 

 

अदब और तहजीब तथा भाईचारे की मिसाल लखनऊ

 

जैसे-अस्सलामु आलेकुम, सुबह कुमा अल्ला बिलखैर, मस्साकुम अल्ला बिलखैर आदि। लखनऊ के रईसों ने कुछ खास अभिवादन इजाद किये थे जैसे— बंदगी, अदाब बजा फरमाते हैं, तसलीम आदि। जोश मलिहाबादी ने लखनऊ की इसी खूबी के सम्बन्ध में कहा है– “अजीबतर नजर आये–लखनऊ के रईस, आलिम, अदीब और शायर। अल्लाह-अल्लाह उनके वे लचकीले सलाम, उनके उठने-बैठने के वे पाकीजा अन्दाज, उनके बेतहजीब में डूबे हाव-भाव, उनके लिबास की वह अनोखी तराश-खराश, सामा- जिक्र और साहित्यिक समस्याओं पर उनका वह वाद-विवाद, उनके शब्दों का ठहराव, उनके लहजों के वे कटाव, गजल सुनाते समय शेर के भाव के अनुसार उनकी आँखों का रंग और चेहरे का रंग, वह कहकहों से बचाव, उनका हक्का- बक्का तबस्सुम, विनम्रता के सांचे में ढला हुआ उनका वह स्वाभिमान और बावजूदे कमाल उनका हाथ जोड़-जोड़कर अपनी कम इलमी का एतराफ। ये सारी बातें देखकर मैं आश्चर्य चकित रह गया। वे तमाम लोग इस कदर सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत थे कि ऐसा मालूम होता था– वे इस दुनिया के नहीं किसी प्रकाश मण्डल के वासी हैं। अदब और तहजीब इतनी की सामने वाला बातों से ही मोहित हो जाएं। अदब और तहजीब के मामले में लखनऊ का कोई मुकाबला नहीं।

 

अदब और तहजीब
अदब और तहजीब

 

अवध के नवाब भी सभी से बड़े ही प्रेमपूर्वक मिलते थे। नवाब वाजिद अली शाह तो अपने नौकरों तक को भी सम्मान देते थे। वह चिराग जलाने वालों को ‘कवंल बरदार’, हकीम को तवीबुद्दौला,, मेहतरानी को ‘नवाजजहाँ, हुक्काबरदार को कलियाबरदार’, किस्सागो को आरामगोश’, कहारों को ‘कादिरबख्श’, खाना देने वालों को आवकश खासा बरदार’, कहकर सम्बोधित करते थे।

 

 

इन सम्बोधनों का मकसद यह था कि किसी भी शख्स में अपने काम को लेकर कोई हीन भावना जाग्रत न हो। लखनऊ के दो वाक्य बड़े ही मशहुर रहे हैं— पहले आप, पहले आप। यदि कहां गया कि— पहले आप चलें तो तुरन्त कहा जाता– अरे जनाब आप आगे तशरीफ ले चलें यह खाकसार किस क़ाबिल है।

 

 

इसी पहले आप, पहले आप पर एक किस्सा बड़ा मशहूर है–एक दिन लखनऊ आये अपने दोस्त के साथ किन्हीं साहब को बाहर जाना पड़ा। दोनों लोग स्टेशन पहुँचे। लखनऊ वाले सज्जन ने अपने दोस्त से गाड़ी पर चढ़ने का आग्रह किया, परन्तु उन्होंने भी कहा– नहीं पहले आप और इसी चक्कर में गाड़ी छूट गयी।

 

 

शेरो-शायरी लखनऊ का प्रिय शौक रहा है। यदि महफिल जमी है तो हाथ उठाकर, सर हिलाकर-इरशाद, वाह-वाह, क्‍या बात है, जवाब नहीं– कहकर शेरो-शायरी कहने वाले की हौसला अफजाई की जाती। कहना गलत न होगा कि पाश्चात्य सभ्यता ने यहां की अदब और तहजीब व तमद्दुन को काफी नुकसान पहुंचाया है। लखनऊ में बम्बईया वाक्य भी कुछ कम धूम नहीं मचाये हैं। चुप बे, ओय फूट बे, कम हो– आदि फूहड़ शब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। आज कल कुशल क्षेम पूछने का एक नया वाक्य उभर कर सामने आया है– हाय। इसका प्रयोग लड़कियों में ज्यादा नजर आता है–हाय कैसे हो, कैसी हो। ऐसा लगता है जैसे किसी ने पीछे से लाठी दे मारी हो, बेचारी हाय करके रह गयी।

 

 

अब आते हैं लखनऊ के आपसी प्रेम और भाई-चारे से युक्त माहौल में जिसने सारे संसार के आगे एक मिसाल कायम की है। जहां मुसलमानों ने अलीगंज टिकैतगंज, सरायशेख, नवाबगंज में हिन्दू मन्दिरों का निर्माण करवाया वहीं हिन्दुओं ने भी अमीनाबाद, मौलवीगंज, मेहदीगंज और ठाकुरगंज में मस्जिदें बनवायीं। दोनों ही कौमों में ऐसा आपसी प्रेम ओर भाई चारे का उदाहरण शायद ही कहीं और मिले।

 

 

लखनऊ में दोनों ही सम्प्रदायों के लोग मिल-जुलकर त्योहार मनाते, एक-दूसरे की खुशियां व गम बांटते। नवाब गाजीउद्दीन हैदर जन्माष्टमी के अवसर पर मन्दिर में जरूर जाते और रामलीला के जलूसों में शरीक होते थे। बसन्त-पंचमी के त्योहार पर छतर मंजिल में खूब जमकर धमा-चौकड़ी होती। हिन्दू भी हजरत हुसैन की शहादत की याद में मनाए जाने वाले मुहर्रम में हिस्सा लेते थे। आज भी नख्खास से उठने वाले ताजिये को हिन्दू ही उठाते हैं। चोक में होने वाली रामलीला के आयोजन में मुसलमान भाइयों का बड़ा सहयोग रहता है।

 

 

जहां मुस्लिम औरतो ने हनुमान जी के मन्दिर में, शीतला देवी के सामने हाथ जोड़कर फरियादें की हैं, वहीं हिन्दू औरतों ने भी सन्तों की मज़ारों व मस्जिदों में अपने बीमार बच्चे को ले जाकर फूक डलवाई है, मिन्‍नतें की हैं। चारबाग में स्थित खम्बनपीर’ की मज़ार पर हर बृहस्पतिवार को अनेक हिन्दू चादर व प्रसाद चढ़ाने जाते हैं।

 

 

नवाब वाजिद अली शाह दोनों ही सम्प्रदायों को समान दृष्टि से देखते थे। एक बार कौम के नाम पर अमीर अली ने नवाब साहब को भड़काना चाहा और हिन्दुओं के खिलाफ मदद माँगी। नवाब साहब के गुस्से का ठिकाना न रहा, अमीर अली को ऐसी फटकार पड़ी कि उन्हें उल्टे पैर भागते ही बना। नवाब साहब ने सख्ती से भड़के दंगे को दबा दिया और तमाम हिन्दुओं की रक्षा की।

 

 

नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत के वक्‍त ‘होली और मुहर्रम के अवसर पर शराब नहीं बिक सकती थी। मुंशी शंकर दयाल ‘फरहत’ जी ने नवाब साहब से शराब पीने की इजाजत माँगी–लिखा–

कुर्कमय अय्याम होली में कहों क्‍या कीजिये ।
जी में आता है कि इस सूरत में कंठी लीजिये।
गर तमाशा कायथो का देखना मंजूर हो।
शाह दो दिन के लिए मय की इजाजत दीजिये।

 

नवाब साहब ने उत्तर दिया–घर में बे ठकर पीने की इजाजत है, सरेआम नहीं।

सरदार बल्‍लभ भाई पटेल जी ने लखनऊ की इन्हीं तमाम खूबियों को देखते हुए कहा– “लखनऊ हमारे मुल्क का एक बहुत पुराना शहर है। यह हिन्दू और मुसलमान दोनों की मिश्रित संस्कृति का एक केन्द्र है। इस शहर की पुरानी बातें हम सदा सुनते रहे हैं।

 

 

स० ही० वात्सायन भज्ञेय जी ने लखनऊ वालों के रास्ता बताने वाले अंदाज की प्रशंसा करते हुए कहा– लोगों को रास्ता बताने के तरीके अलग-अलग होते हैं। लेकिन लखनऊ का तरीका कुछ निराला ही मालूम हुआ। लखनऊ में नफासत नहीं तो कुछ नहीं–
जो मार्ग बताता है बड़े-इतमीनान से ओर आवाज में माधुर्य भरकर।

 

 

लखनऊ आज भी अपनी अदब और तहजीब तथा बोलचाल के लिए जाना जाता है। लखनऊ की बोलचाल की मिठास की गूंज विदेशों तक में है। कई विदेशी पर्यटक तो आज भी ट्रांसलेटर की मदद से लखनऊ की भाषा का वो ज्ञान प्राप्त करने आते हैं जिसके लिए वह जाना जाता है।

 

 

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