अटलांटिस द्वीप का रहस्य – अटलांटिक महासागर का रहस्य

क्या कभी अटलांटिक महासागर के मध्य मे एक विशाल और विकसित सभ्यता फली फूली थी? यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा किए गए वर्णन से ऐसा लगता है कि अटलांटिस की सभ्यता उस युग की एक सर्वश्रेष्ठ और शक्तिशाली व्यवस्था थी, जिसकी स्वर्ण से तुलना करना अतिशयोक्ति न होगी। तभी अचानक एक ज्वालामुखी फटा। ऐसा लगा कि जैसे आसमान से मौत की
बारिश हुई हो और अटलांटिस द्वीप महासागर की गहराईयों में विलीन हो गया। आखिरकार अटलांटिस वासियों को किस अपराध की सजा भुगतनी पडी थी ? क्या यूनान में पुरातात्विक खुदाई में निकला शहर आक्रोतिरी ही अटलांटिस महासागर का
खोया हुआ शहर है? क्या प्लेटो द्वारा किया गया वर्णन सिर्फ एक कहानी ही है? इन्हीं अटलांटिक के रहस्यों के ताने-बाने मे लिपटा है इस गुप्त सभ्यता का खोया हुआ अस्तित्व। दुनिया भर के भूगर्भशास्त्री ज्वालामुखी विशेषज्ञ तथा पुरातत्वशास्त्री निरंतर इस रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए प्रयत्नशील हैं।

 

अटलांटिस द्वीप का रहस्य की जानकारी हिंदी में

 

साढे तीन हजार साल पहले की एक शाम। अटलांटिस द्वीप पर बसा हुआ नगर हमेशा की तरह दिन भर का काम-काज समाप्त करके रात बिताने की तैयारिया कर रहा था। नगर की पतली गलियां हंसते ओर आपस मे बाते करते नागरिकों से भरने लगी थी। औरते अपने घरों के दरवाजों पर बैठी गप्पे मार रही थी।
वातावरण शांत था और मौसम का मिजाज भी अनुकूल ही था। अचानक पूरे नगर को एक विचित्र तरह की गर्मी ने अपनी लपेट मे ले लिया। द्वीप के आस-पास का समुद्र सीसे के रंग का हो गया और धरती की गहराइयों से थरथराहट की दबी -दबी आवाजे आने लगी। पहले ये आवाजे रुक-रुक कर आई फिर लगातार सुनाई देने लगी। द्वीप निवासी! घबरा गए। उन्हे डर था कि उनके द्वीप का 5000 फुट ऊंचा ज्वालामुखी फट पड़ने को है। उन्हे लगा कि धरती हिला देने वाली ताकतों का मालिक उनका देवता लम्बी निंद्रा से जागने वाला है।

 

 

इतना समझने के बाद भी अटलांटिस द्वीप के वासी यह नही समझ पाए कि पृथ्वी के गर्भ से आने वाली ये आवाजे उनके द्वीप, उनके नगर और उनकी समूची सभ्यता के विनाश की आहटे हैं। यही हुआ। पहले दम घोट देने वाला गहरा धुआं उठा, फिर सुलगते हुए पत्थरों की वर्षा हुई और इसके बाद चारो तरफ आग उड़ने लगी। ज्वालामुखी का गर्भ अचानक दबाव से फट गया। वह लाखो टन की ठोस चट्टानों की वर्षा करता हुआ अपनी ही जगह पर धस गया, जिसकी वजह से एक 37 मील लम्बा चौडा गड्ढा बन गया। इस गड्ढे को भरने के लिए समुंद्र की लहरें चारो और से टूट पड़ी।

 

 

 

आज के वैज्ञानिक व ज्वालामुखी विशेषज्ञों का अनुमान है कि 500 से 1000 परमाणु बमों की ताकत के बराबर विस्फोट क्षमता से वह ज्वालमुखी फटा होगा। काली राख की वर्षा के कारण उस समुंद्र के आकाश पर कई सप्ताह तक रात जैसा अंधेरा बना रहा। उस राख के अवशेष आज भी समूचे द्वीप पर देखे जा सकते है। इस बचे हुए द्वीप को प्राचीन समय में यूनानियों ने कलिस्ट (Kelliste) का नाम दिया था। अटलांटिस द्वीप की ऐतिहासिकता का केवल एक ही सर्वमान्य प्रमाण उपलब्ध हैं। यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने अपने शिष्य के साथ बातचीत मे इस द्वीप, उसकी सभ्यता व उसके विनाश के कारण का विस्तृत उल्लेख किया है।

 

 

 

अटलांटिस द्वीप
अटलांटिस द्वीप

 

प्लेटो के अनुसार अटलांटिस का नगर तरह-तरह की किमती वस्तुओं विभिन्न प्रकार के जानवरों और मवेशियों तांबे की मिश्रित धातु व अन्य खनिज पदार्थों से भरा पड़ा था। पूरा शहर 5 खंडों में बंटा हुआ था, जो वृत्ताकार रूप से व्यवस्थित थे। इसके विभिन्‍न बंदरगाह नहरों द्वारा जुडे हुए थे। शहर के बीच में एक विशाल महल व मंदिर था। इन दोना के शीर्ष सोने व चांदी से मढ़े हुए थे। सोने के बने हुए सात पंखदार घोड़ो के रथ पर सवार इस शहर का देवता पोसीडान मंदिर में स्थापित था। भुकंम्प के इस देवता की पूरे नगर में पूजा की जाती थी।

 

 

 

प्लेटो के वर्णन में आगे बताया गया है कि हर विकसित सभ्यता की तरह अटलाटिंस के पतन के दिन भी आये और वहां के निवासी साम्राज्य, शक्ति और धन-धान्य की पूजा करने लगे। अटलांटिक की फौज आक्रमण और युद्ध के अभियान पर निकल
पड़ी। उन्होंने भूमध्य सागर की तटवर्ती बस्तियों के निवासियों को अपना गुलाम बना लिया लेकिन एथसवासियों के सामने उनकी एक न चली। एथस की फौज ने अटलांटिस की फौजो को हरा कर भगा दिया परंतु अटलांटिस के नैतिक पतन का दण्ड अभी अधूरा था। इसके बाद भीषण भूकम्प ओर बाढ़ों ने एक ही रात मे अटलांटिक को अपने आगोश में लेकर तबाह कर दिया।

 

 

 

प्लेटो के अनुसार 2 हजार साल पहले जिब्राल्टर के जलडमरू मध्य के आस-पास अटलांटिस का अस्तित्व था। यही से शुरू होती हैं अटलांटिक की लुप्त सभ्यता के रहस्य की कहानी। प्लेटो की बातचीत मे अटलांटिस की कहानी मुख्य रूप से उनके भतीजे क्रिटियास (Critias) द्वारा सुनाई गई थी, जिसके बारे मे स्वयं प्लेटो के गुरू सुकरात ने कहा था, यह एक तथ्य है न कि केवल कहानी ”। क्रिटियास का यह दावा था कि उसने यह कहानी अपने परबाबा ड्रोपिडस (Dropides) से सुनी थी और ड्रोपिडस ने इसे यूनानी इतिहास में अपनी इमानदारी के लिए प्रसिद्ध सोलन (Solen) से सुना था। सोलन को सबसे विख्यात विधि-निर्माता तथा यूनान के सात महान संतों मे सबसे अधिक बुद्धिमान माना जाता था। सोलन 640 ईसा पूर्व से लेकर 558 ईसा पर्व तक जीवित रहा। इसके दो सौ वर्ष बाद प्लेटो ने यह कहानी लिखी। सोलन का कहना था कि उसने यह कहानी ईसा से 590 वर्ष पूर्व मिस्र के एक पुजारी से सुनी थी। सोलन ने इस महान कहानी से प्रभावित होकर इसका अनुवाद यूनानी भाषा की कविता मे कर डाला। इससे लगता है कि यूनानियों से पहले मिस्रियों को भी अटलांटिस के अस्तित्व का ज्ञान था।

 

 

 

प्लेटो द्वारा किया गया वर्णन ऐतिहासिक कम दार्शनिक अधिक है। वह एथेस के वैभव और गरिमा से अधिक प्रभावित जान पड़ता है। अटलांटिस का अस्तित्व उस समय ओर भी रहस्यपूर्ण हो गया जब प्लेटो के शिष्य अरस्तु (Aristotle) ने इसे
मात्र काव्यात्मक कथा ही माना परंतु ईसा से 300 वर्ष पूर्व प्लेटो के प्रथम व्याख्याता क्रेण्टर (Cranter) ने अटलांटिस के वर्णन को तथ्यात्मक करार दिया। कहा जाता है कि क्रेण्टर के कुछ शताब्दी बाद दार्शनिकों पासीडोनियस (Posidonius) (135-150 ईसा पूर्व) ने प्लेटो के वर्णन को केवल एक कथा मात्र
मानने से इंकार कर दिया। इस तरह पूरी 23 शताब्दियों से आज तक अटलांटिस का रहस्य इसी तरह के विवादो में घिरा रहा है। अटलांटिस के बारे में धार्मिक पुजारियों, काले जादू के विशेषज्ञों तथा अफवाहबाजो ने तरह-तरह की कहानियां गढ़ ली। किसी ने कहा कि अटलांटिस के पेड़ों मे सोने के फल लगते थे तो किसी ने
कहा कि वहा की नहरों से दूध और शहद बहता था।

 

 

 

प्लेटो को विश्वास था अटलांटिस (Atlantis) द्वीप अटलांटिक (Atlantic) के बीच में ही था। प्लेटो का समर्थन करने वाले आधुनिक विद्वानों का मत है कि अजोरस (Azores) केप वेरडें आइलैण्ड (Cape varde Island) केनरीज (Canaries) तथा मेडीरा (Mediera) की चोटियां अटलांटिस द्वीप की ही थी, जो एशिया और अफ्रीका के संयुक्त क्षेत्रफल से भी बडा था। 15वी शताब्दी के यूरोपीय अन्वेषकों ने कल्पना के आधार पर ही अटलांटिस को अपने नक्शा में शामिल कर लिया। हर नई खोज को अटलांटिस के रूप में देखने की आदत बन गई। अमेरिका की खोज होते ही कुछ समय के लिए मान लिया गयाकि अटलांटिक की खोज हो गई है। अटलांटिस मे लोगो की दिलचस्पी इतनी बडी कि 19वी शताब्दी तक अटलांटोलोजी (Atlantology) नामक विज्ञान की शाखा की स्थापना के दावे किए जाने लगे। इस विज्ञान के सबसे प्रमुख अध्येता थेइग्नशियस डोनली (Ignatius Donnelly) नामक अमेरिकी राजनीतिज्ञ जो अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य भी थे। सन्‌ 1882 में डोनेली ने अटलांटिस द एण्टेडिल्यूवियन बल्ड (Atlantis the antediluvien word ) नामक पुस्तक लिखी जो रातों रात ‘बेस्ट-सैलर बन गई।

 

 

 

डानेली ने अपना सिद्धांत अमेरिका की कोलम्बस पूर्व सभ्यता तथा प्राचीन मिस्र संस्कृति के बीच कुछ समानताओं के आधार पर गढ़ा। पिरामिडों के निर्माण, ममी बनाने की कला 365 दिन के कलेण्डर तथा बाढो की परम्परा को देखते हुए डोनेली
ने साबित किया कि उक्त दोना सभ्यताएं अटलांटिक की ही देन थी। अटलांटिस के नष्ट हो जान के बाद उसके पूर्व और पश्चिम मे अलग-अलग सभ्यताओं ने जन्म ले लिया। डोनली न अपनी सामग्री पुरातत्व, मिथक, भाषा भूविज्ञान, जंतु व जीव विज्ञान से प्राप्त की। अपने आप को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए ने इन
विज्ञानों से तर्क लेक अपनी साहित्यिक प्रतिभा का प्रयोग करके उक्त सिद्धांत काताना-बाना बुन दिया। आज भी डानेली के बहुत से समर्थक मौजूद हैं।

 

 

 

परंतु डानेली के सिद्धांत का यह केन्द्रीय विश्वास कि अटलांटिस, अटलांटिक महासागर के बीच में था, ठुकरा दिया गया है। आधुनिक सामुद्रिक शास्त्र के ज्ञाताओं ने जांच करके पता लगाया है कि 3 करोड 60 लाख वर्ग मील की अटलांटिक महासागर की सतह पर अटलांटिस मे आए वर्णित भूकम्प का कोई चिह्न नहीं मिलता। 12500 मील लम्बी एक ज्वालामुखी पर्वत माला अवश्य महासागर में डूबी हुई है लेकिन जहा यह पर्वत माला समुद्र से निकलती है, वहा अटलांटिस के डूबने की जगह बताई जाती है।

 

 

 

सन्‌ 1912 में अमेरिका की एक सनसनीखेज पत्रकारिता ने अटलांटिस की कथा को पुनः नया जीवन प्रदान किया। 20 अक्तूबर को विलियन रुडोल्फ हर्स्ट (Villian Rudolph heart ) ने ‘न्यूयॉर्क अमेरिकन” नामक अपने पत्र मे एक मोटा शीर्षक प्रकाशित किया। सभी सभ्यताओं के स्रोत अटलांटिस को मैंने कैसे खोजा? (How i found the lost Atlantis the source of all civilization )। इस खोज के लेखक का नाम था डा पाल श्लीमान (Dr. Paul schliemann) जिनके बारे में दावा किया गया था कि वे ट्रॉय के एक अन्वेषक के पात हैं। डा पाल का कहना था कि उनके बाबा ने ट्रॉय की खोज के दौरान तांबे का एक विशाल घड़ा प्राप्त किया था, जिस पर खुदा था “अटलांटिस के राजा क्रोनोस की ओर से उपहार”। इसके अलावा भी डा पाल ने कई दावे किए लेकिन यह कहानी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मात्र एक सनसनी पैदा करके रह गई। सन्‌ 1927 में रसायन शासन मे नोबल पुरस्कार जीतने वाले अंग्रेज वैज्ञानिक फ्रेड़िक सोडी (Fredrick soddy) ने अटलांटिस के रहस्य को खोजने की असफल कोशिश की। एक जर्मन पुरातत्वीय पत्रकार सी डब्ल्यू सेराम (C.W. Ceram) ने हाल ही में इस विषय पर 20,000 ग्रंथ लिखे जाने का आंकड़ा पेश किया है।

 

 

 

एक अमेरिकन अतीद्रियदर्शी (Clairvoyant) तथा फोटोग्राफर एडगर सायके (Edgar sayce) (1877 से 1945) ने 1923 से 1944 के बीच तमाम लोगो को हिप्नोटाइज करके अतींद्रिय दृष्टि से अटलांटिस सभ्यता के चित्र प्राप्त किए, जो प्लेटो के वर्णनों से मिलते-जुलते थे। यद्यपि सायके ने प्लेटो के वर्णन को नही पढ़ा था। सायके के अनुसार अटलांटिस वासियों ने अणुशक्ति को अपने वश में कर लिया था, जो ईसा से 10,000 वर्ष पूर्व विस्फोट का शिकार हो गई। सायके का इशारा था कि वर्तमान सारा अमेरिका ही अटलांटिस है क्योंकि वह मैक्सिको की खाड़ी तथा जिब्नाल्टर के जलडमरुमध्य के बीच स्थित था।

 

 

 

सन्‌ 1968 मे बहामा मे डा मेसन वेलेटाइन (Dr. Menson valentine) ने बहामा के जल की गहराइयों मे गोता लगा कर कई मील तक फैली हुई विचित्र संरचनाएं देखी। सन्‌ 1968 मे उन्होंने ही नार्थ विमिनी (North bimni) के छोटे से द्वीप के पानी मे कई सौ गज लम्बी दैत्याकार दीवार देखी। 16 वर्ग फुट के पत्थरों से बनी यह दीवार एक तरफ समकोण पर सीधी रेखा में दो शाखाओं के रूप में बनी हुई थी। इस दीवार का संबंध सीधे सीधे अटलांटिस से जोड़ दिया गया।

 

 

 

सन्‌ 1967 में प्रमुख पुरातत्वशास्त्री स्पाईरिडान मैरिनाटोस (Spyridon marinatos) ने कलिस्टे द्वीप के नीचे दबे सातोरीनी (Santorini) नामक प्राचीन नगर की खुदाई शुरू की। इससे 2 साल पहले अमेरिकी वैज्ञानिक द्रागाम्लाव निन्काविच (Dragoslav Nickovich ) तथा बी सी हीजेन [B.C. Heezen) ने सातारीनी पर आए 3,500 व पुराने भूकम्प की जानकारी दी और उसकी तुलना सन्‌ 1883 के अगस्त में जावा व सुमात्रा में फटने वाले क्राकाटाआ ज्वालामुखी से की। सातोरीनी पर फट ज्वालामुखी न क्राकाटाआ से 4 गुना अधिक विनाश किया था। इस द्वीप की खदाई में जले हुए दांत तथा कुछ हाड्डिया मिली हैं। सातारीनी के अलावा समुद्रों के नीचे दबी हुई सभ्यताओं तथा भूखण्डो के नीचे छिपे हुए नगरो का अस्तित्व भी पुरातत्वशास्त्र के विकास के साथ उभरता जा रहा है। इनके साथ अटलांटिस की कहानी मे जरा भी समानता हाने पर तुरत दोनों का सबंध जोड दिया जाता है। भारत के दा महान्‌ महाकाव्या ‘रामायण’ तथा महाभारत में भी इस तरह के वर्णन हैं जो अटलांटिस से मिलते-जुलते हैं। लगता हे कि वैज्ञानिक संभवतः सातारीनी के खण्डहरो को ही अटलांटिस के साथ अतिम रूप से जाड देगे। फिलहाल अटलांटिस की खोज जारी है। वह आज भी
विश्व के अनसुलझे रहस्यो में से एक बना हुआ है।

 

 

 

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