अक्षरा देवी सिद्ध पीठ कहां है – अक्षरा सिद्ध पीठ का इतिहास

अक्षरा देवी सिद्ध पीठ उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के उरई नगर से 26 किलोमीटर की दूरी पर सैदनगर में स्थित है। सिद्ध नगर जिसे अब सैदनगर के नाम से जाना जाता है उरई झाँसी राजमार्ग पर एट कस्बे से अक्षरा देवी सिद्ध पीठ तक पहुँचने के लिए रास्ता जाता है। सिद्धपीठ की त्रिगुणात्मक शक्ति से भरपूर यह सिद्ध नगर अपने अतीत की कहानी कहता हुआ दृढ़ता के साथ स्थिर है।

 

 

अक्षरा देवी सिद्ध पीठ का इतिहास

 

वेतवा के किनारे स्थित सैदनगर कभी मुर्जदी कपड़े व नील का एक बहुत बड़ा जाना माना व्यापारिक केंद्र था। समूचे भारतवर्ष में रंगों की आपूर्ति का श्रेय भी इसको प्राप्त था। शाहजहाँ के शासन काल में उसके साले सलावत खाँ ने जब इस क्षेत्र का आधिपत्य सम्भाला , तभी सैय्यद नाम के एक फकीर सूफी का इस क्षेत्र में प्रवेश हुआ। उसका इतना प्रभाव बढ़ा कि लोग इस क्षेत्र को उसके नाम से सैय्यद नगर कह कर पुकारने लगे और तब 800-900 वर्ष पूर्व सिद्ध बाबा द्वारा बसाया गया यह सिद्ध नगर, सैय्यद नगर बन गया। बाद में यही सैय्यद नगर ग्रामीण भाषा में बदलाव के कारण सैदनगर हो गया।

 

 

गजेटियर के अनुसार सन 1700 ई० में स्थानीय गर्वनर सैय्यद लतीफ था जिसने बुन्देलों को एक लाख रूपया देकर वहाँ से हटाया था। यहाँ के लोगों की यह मान्यता है कि 800-900 वर्ष पूर्व सिद्ध बाबा द्वारा यहाँ पर “श्री यन्त्र” की स्थापना करके इसे अक्षरा सिद्ध पीठतीर्थ का नाम दिया गया।

 

शास्त्रों में कहा गया है कि ” शरीरम मानसम्‌ भौम॑ साधु सम्मेलन तथा आत्मशोधि करादीनि तरणं तीर्थ मुच्यते ।” अर्थात्‌ शारीरिक मानसिक, भौम तथा साधु सम्मेलन जैसे आत्मा के शोध करने या पार करने को तीर्थ कहते हैं। तीर्थ शब्द का “ती”और “र्थ “से अर्थ निकलता है कि तीन अर्थों की सिद्धि जहाँ को वह तीर्थ होता है। संसार में अर्थ धर्म काम और मोक्ष ये चार अर्थ हैं। इनमें से धन तो तीर्थ यात्रा में खर्च होता है तथा शेष तीन धर्म, काम और मोक्ष इन तीनों के प्राप्ति स्थान को तीर्थ कहते हैं। “अक्षरा” तीर्थ में मां
छिन्नमस्ता द्वारा धर्म, माँ रक्तदन्तिका द्वारा काम और माँ अक्षरा द्वारा मोक्ष का प्राप्ति होती है।

 

अक्षरा देवी सिद्ध पीठ सैदनगर
अक्षरा देवी सिद्ध पीठ सैदनगर

 

वराह पुराण में एक प्रसंग आता है कि वेत्रवती जो कि आज वेतवा नदी के नाम से जानी जाती है के वेतव्रत नाम का एक पुत्र था। यह वेतव्रत अत्यन्त शक्तिशाली तथा आसुरी प्रवृत्ति का था जो कि सदैव ही सज्जन दृन्दों एवं देवताओं का अपकार्य किया करता था। इससे क्षुब्ध होकर देवगणों ने माँ जगदम्बा की स्तुति की और माँ जगदम्बा ने स्तुति से प्रसन्न होकर स्वयं उपस्थित हो देवगणों को भय मुक्त होने का वरदान दिया तथा स्वयं रक्तदन्तिका के रूप में अवतरित होकर उस आतातायी वेतव्रत का संहार किया। तत्पश्चात देवताओं ने उनकी स्तुति की। यह स्तुति दुर्गा सप्तशती में इस प्रकार है —

 

त्वं खाहा त्वं ख॒धा त्वं हि षटठकारः स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षेरे नित्य त्रेधाना त्रात्मिका स्थिता ॥
अर्ध मात्रा स्थिता नित्या आनुद्चार्या विशेषतः ॥

 

अर्थात्‌ हे देवी ! तुम्ही स्वाहा , तुम्ही स्वधा और तुम्ही षट्कार हो।स्वर भी तुम्हारे स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार और मकार इन तीनों मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दु रूपा अर्द्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता है वह भी तुम्ही हो।

 

वराह पुराण की कथा का भौगोलिक स्तर पर जब हम विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि वेतवा भोपाल के ऊपर से अपने आदि श्रोत से प्रारम्भ होकर हमीरपुर में यमुना में मिल जाती है। उसकी इस सम्पूर्ण यात्रा में सैदनगर को छोड़कर अन्य कोई माँ का ऐसा स्थान नहीं है। फलस्वरूप इस क्षेत्र के विषय में वराह पुराण की उक्त कथा से बहुत अधिक सांनिध्य प्रतित होती है।

 

वास्तव में अक्षरा तीर्थ सिद्धपीठ श्रेणी की एक कड़ी यूं बन जाती है क्योंकि यह सृष्टि के आदि क्रम से जुड़ा हुआ है। भारतीय साहित्य में गुरूरे ब्रह्मा, गुरूरे विष्णु, गुरूरे देवौ महेश्वरः कहा गया है किन्तु यह बात उतनी सहज नहीं है। जब हम ब्रह्मा , विष्णु और महेश को उनके कार्य के अनुसार अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि गुरू अपने शिष्य के अज्ञान का जब निवारण करता है तब वह महेश का कार्य करता है। मिथ्या अहं को काटते हुए जब गुरू अपने शिष्य के मन के यथार्थ ज्ञान की रक्षा करता है तब वह विष्णु का कार्य करता है और जब अज्ञान हटाते हुए व ज्ञान की रक्षा कते हुए वह जब नयी बातों का शिक्षण करता है तब वह ब्रह्मा का कार्य करता है। आदि जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा है कि:–

 

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शकः प्रभावितुम्‌ ” अर्थात्‌ भगवान अपनी शक्ति से शबलित होकर ही अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं अन्यथा नहीं। फिर ब्रह्मा, विष्णु व महेश की भी अपनी शक्तियाँ हैं जो महासरस्वती, महालक्ष्मी तथा महाकाली के नाम से जानी है। ये तीनों शक्तियाँ ही सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण की सूचक हैं। इन शक्तियों के अभाव में कोई भी नहीं रह सकता है।

 

न शिवेन बिना देवी न देव्याश्य बिना शिवः।
नानयोन्तरम॑ किमििच्चन्द्र चन्द्रिकयोरिव ।।

यही तीनों महा शक्तियाँ महात्रिकोण में त्रय रूप में स्थित हैं

इच्छादि शक्तिन्नितयं पशोः सत्वादिसज्ञकम्‌।
महत्‌ व्यद्न॑ चिन्तयानि गुरूवक्जा दनुत्तरात ॥

और इन्हीं तीनों महाशक्तियों के महात्रिकोण से ” श्री यन्त्र ” का पूजन का विधान है जिसमें इनकी स्थिति को भी स्पष्ट किया गया है –

 

महालक्ष्मी पूर्व भागे, महाकाली च दक्षिणे ।
महासरस्वती पश्च कोण यंत्रस्य संस्थिता॥

 

अर्थात्‌ महालक्ष्मी त्रिकोण के पूर्व भाग में महाकाली त्रिकोण के दक्षिणी भाग में तथा महा सरस्वती त्रिकोण के पश्चिमी भाग में स्थित होती हैं। अस्तु सिद्धपीठ के लिए महा त्रिकोण में शक्तियों की प्राण प्रतिष्ठा परमावश्यक है। अक्षरा देवी सिद्ध पीठ का अवलोकन करने से महा त्रिकोणीय स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इस सिद्धपीठ पर भी पूर्व भाग में महालक्ष्मी स्वरूपा अक्षरांचल पर्वत पर माँ अक्षरा का स्थान है, दक्षिण में सिद्धाबली पर्वत श्रृंखला पर महाकाली स्वरूपा माँ रक्त दन्तिका का स्थान है और पश्चिमी भाग में डीकांचल पर्वत श्रंखला पर वेतवा के उस पार डिकौली ग्राम में माँ सरस्वती का स्थान है। इसी डीकांचल पर्वत श्रंखला पर 64 योगनियों के भी स्थान हैं जो कि अत्यन्त दुर्लभ हैं। इसी सारी स्थिति में अक्षरा तीर्थ मात्र एक तीर्थ ही नहीं वरन एक सिद्धपीठ प्रमाणित होता हैं।

 

 

अक्षरा देवी सिद्ध पीठ का वास्तुशिल्प

 

माँ अक्षरा देवी सिद्ध पीठ का यह स्थान पश्चिमा भिमुख है। इसका गर्भगृह चौकोर है जिसके ऊपर विमान तथा कलश स्थापित है। माँ अक्षरा देवी का स्वरूप त्रिशूल के अग्र भाग की भाँति पिण्डीय स्वरूप में है। इस गर्भगृह के पश्चिम में अराधना मण्डप तथा उत्तर में भगवान शंकर का स्थान है। इस गर्भगृह के दक्षिण में वरान्डिका है जिसकी दक्षिणी भुजा से संग्लन चबूतरे पर नरसिंहावतार की विशाल मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस मंदिर के पश्चिम में शंखाकार स्वरूप में प्रकृति द्वारा निर्मित एक कुण्ड है जिसकी गहराई के विषय में कोई वास्तविक ज्ञान नहीं है। कहा जाता है कि वर्ष में एक बार जीवन को अमरत्व प्रदान करने वाले आयुर्वेदिक शेलोदक का प्रादुर्भाव इस कुण्ड में होता है। इस मंदिर के उत्तर में एक विशाल तालाब है जिसके दक्षिणी सिरे पर सुन्दर मजबूत पक्के घाट बने हैं। इस तालाब के दक्षिणी किनारे पर कालपी के खत्रियों द्वारा निर्मित एक धर्मशाला थी जो कि अब रखरखाव के अभाव में धूल धूसरित हो रही है।

 

 

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