अंतरिक्ष की खोज कैसे हुई – अंतरिक्ष की खोज किसने की

अंतरिक्ष यात्रा के बारे में आज से लगभग 1825 वर्ष पूर्व लिखी गई पुस्तक थी-‘सच्चा इतिहास’। इसके रचियता थे यूनान के लेखक लूशियन। परंतू इसमें अंतरिक्ष यात्रा का विषय एक व्यंग्य के रूप मे था, जो तत्कालीन राज्य के दोषो को उजागर करता था। इसमे चंद्रलोक और सूर्य लोक का दिलचस्प वर्णन है, परंतु
यथार्थ से एकदम विपरीत। इसके बाद सैंकडो वर्षो तक इस विषय पर कुछ नही लिखा गया लेकिन आकाश के चांद सितारो की रहस्यमय दुनिया के बारे मे लोगो ने सोचना आरंभ कर दिया था।

 

 

अंतरिक्ष की खोज कैसे हुई

 

पौलैंड के खगोलशास्त्री निकोलस कोपरनिकस ने अपने तथ्यों के आधार पर बताया कि सूर्य सौर-परिवार के केन्द्र में है और पृथ्वी एक ग्रह है। गैलिलियो (इटली) ने सन्‌ 1610 मे एक दूरदर्शी यंत्र का आविष्कार करके अंतरिक्ष के नजारो को बहुत निकट से देखने का सर्वप्रथम प्रयास किया। उन्होने चंद्रमा की सतह पर ऐसे दृश्य देखे, जो इससे पहले संसार के किसी मनुष्य ने नहीं देखे थे। दूरबीन की सहायता से अंतरिक्ष में झांकने वाले वे पहले वैज्ञानिक थे।

 

 

चंद्रमा तथा अन्य ग्रहों के बारे में गैलिलियो ने अनेक खोजें की। परन्तु दुर्भाग्य से उस समय के लोगों ने उनकी महत्वपूर्ण खोजों को नकार दिया। कुछ समझदार लोगो ने ही उनकी खोजों पर ध्यान दिया और तभी से अंतरिक्ष यात्रा की संभावनाओं पर
वैज्ञानिको में विचार-विमर्श किया जाने लगा। अंतरिक्ष के बारे में नई-नई बात्ते लिखी जाने लगी।

 

 

इग्लैंड के विल्किन्स नामक एक ईसाई ने सन 1638 में चंद्र-यात्रा पर एक पुस्तक लिखी और चंद्र यात्रा के लिए चार तरीके भी सुझाये। पहला तरीका था-दिव्य आत्मायें मनुष्य को चांद तक ले जा सकती हैं। दुसरा- विशाल व शक्तिशाली पक्षी यह कार्य कर सकते हैं। तीसरा- मनुष्य स्वयं पंख धारण कर यह यात्रा कर सकता है। और चौथा तरीका था उड़न मशीन का, जो मनुष्य को चांद तक पहुंचा सकता है।

 

 

अंतरिक्ष की खोज
अंतरिक्ष की खोज

 

प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इस के बाद अंतरिक्ष सबंधी अनेक तथ्य प्रस्तुत किए और गति संबंधी नियमों का प्रतिपादन कर एक नये अध्याय की शुरूआत की। उन्होने सिद्ध किया कि ज्यों-ज्यों हम पृथ्वी से परे चलते जाते हैं, गुरुत्वाकर्षण घटता जाता
है। न्यूटन ने बताया कि ब्रह्मांड के सब पदार्थ तारें से लेकर धूल कण तक सब एक दूसरे को आकर्पित करते हैं। यह अदृश्य आकर्षण ही गुरुत्वाकर्षण कहलाता है।

 

 

अंतरिक्ष यात्रा के लिए न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम (Low of gravitation ) बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। क्योंकि उसी से यह मालूम किया जा सका कि पृथ्वी के आकर्षण बंधन से अंतरिक्ष यान को मुक्त करने के लिए कितने बल का मुकाबला
करना आवश्यक है। न्यूटन के गति संबंधी तीनों नियम भी अंतरिक्ष यात्रा के लिए बडे महत्वपूर्ण साबित हुए।

 

 

 

लगभग 475 वर्ष पूर्व चीन के वान-हू नामक व्यक्ति ने अग्नि-रॉकेट का निर्माण किया। उसने एक कुर्सीनुमा यान से इस प्रकार के 47 रॉकेटों को एक साथ बांधा, जिनमें विस्फोटक पदार्थ भरे हुए थे। उसका विचार था कि वह रॉकेटों की सहायता
से ऊपर उड़ने लगेगा। परंतु जब रॉकेटों मे आग लगायी गई, तो तेज धमाकों की आवाज के साथ रॉकेट उसे लेकर आकाश की ओर उठे और कछ क्षणो बाद ही वान-हू को धरती पर गिरा दिया। वान-हू की तत्काल मृत्यु हो ‘गई। वान-हू का प्रयोग असफल तो रहा, लेकिन अंतरिक्ष यात्रा के लिए रॉकेट जैसे यान की उपयुक्तता का संकेत वैज्ञानिकों को अवश्य मिल गया।

 

 

 

चीनियो ने मंगोलों पर युद्ध मे (सन्‌ 1232) अग्नि-रॉकेटो का उपयोग किया था। सन्‌ 1805 में ब्रिटिश सेना के एक अफसर विलियम कांग्रीव ने गन पाउडर से युक्त रॉकेट के निर्माण का कार्य आरंभ किया। उनके विचार में यदि इस तरह के बडे रॉकेटों को बेहतर रूप मे बनाया जा सके, तो ये समुद्री युद्ध में बडी महत्वपूर्ण

 

 

भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रीव द्वारा निर्मित रॉकेंटों का उपयोग सन्‌ 1812 में अमेरिका में युद्ध में हुआ। रूस के कान्स्टैण्टिन जिओल्कोवस्की नामक वैज्ञानिक ने सन 1898 में रॉकेट द्वारा
ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष का अन्वेषण नामक पुस्तक लिखी। यह पुस्तक अंतरिक्ष यात्रा के नए विज्ञान की आरंभिक कड़ी थी।

 

 

सन 1920 में जर्मनी तथा अमेरिका के वैज्ञानिकों ने द्रव ईंधन वाले रॉकेटो का निर्मांण किया। द्रव ईंधन के उपयोग की बात जिओल्कोवस्की ने की थी। तब उनकी बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था। अमेरिका के राबर्ट गोडार्ड ने भी रॉकेट निर्मांण की दिशा मे महत्वपूर्ण कार्य किया। गन-पाउडर युक्‍त रॉकेटों के बारे मे उसे मालूम ही था। उन्होंने द्रव ईंधन का रॉकेट में प्रयोग आरंभ किया। उन्होने निष्कर्ष निकाला था कि ठोस ईंधन की जगह
द्रव इंधन से ज्यादा शक्ति प्राप्त की जा सकती हैं।

 

अंतरिक्ष की खोज किसने की

 

गोडार्ड ने जिस द्रव ईंधन का उपयोग किया था, वह गैसोलीन था जो पेट्रोलियम से प्राप्त होता हैं। गैसोलीन को द्रव आक्सीजन में जलाया गया। आक्सीजन गैस दवाव पर ठंडा करने से द्रव में बदल जाती है, जिसे लॉक्स (Lox) कहते हैं।

 

 

सन्‌ 1926 में गोडार्ड ने अपने प्रथम द्रव ईंधन युक्‍त रॉकेट का परीक्षण किया। परंतु यह रॉकेट ज्यादा ऊंचा न जा सका। सन्‌ 1929 में योडार्ड ने एक दूसरा बेहतर रॉकेट उडाया। यह रॉकेट लगभग 90 फूट की ऊंचाई तक गया परंतु नियंत्रण के अभाव में रॉकेट एक ओर झुक कर पृथ्वी की ओर तेजी से आकर गिर जाते थे।

 

 

गोडार्ड ने जाइरोस्कोप (Gyroscope) का उपयोग कर रॉकेट के नियंत्रण की समस्या भी हल कर ली। जाइरोस्कोप एक भारी चक्र है जो अपने केन्द्रीय दण्ड के चारों ओर तेजी से घूमता हैं और दण्ड को एक ही दिशा में रहने को बाध्य करता है। गोडार्ड द्वारा छोड़ा गया अंतिम रॉकेट 550 मील प्रति घंटे की गति से सवा मील की ऊचाई तक पहुंचा था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय गोडार्ड अमेरिका की नौ सेना में नियुक्त हो गए। उन्होंने रॉकट वर्धकों की योजना बनायी। इससे छोटे से छोटे स्थानों से भी भारी बमवर्षक विमानों को उड़ाया जा सका। गोडार्ड द्वारा जर्मनी में तैयार किया गया रॉकेट बी1 और बी-2 भावी अंतरिक्ष यान के जनक थे। हालाकि इन्हे युद्ध में उपयोग करने के लिए बनाया गया था।

 

 

 

जर्मनी के हर्मन ओवर्थ नामक गणित के एक अध्यापक ने एक पुस्तक लिखी-अतरिक्ष यात्रा के साधन’। इसमे उन्होंने बताया कि पृथ्वी के ऊपरी वायुमडल के अन्वेषण के लिए किस तरह द्रव ईंधन युक्त रॉकेटो का इस्तेमाल किया जा सकता है। गोडार्ड ने भी यह धारणा वयक्‍त की थी। परंतु हर्मन ओवर्थ ने एक ऐसे अंतरिक्ष यान के बारे में सुझाया था, जो पृथ्वी से परे दूसरे ग्रहों पर भी भेजे जा सकते थे। वे पहले व्यवित थे, जिन्होंने अंतरिक्ष यात्रियों के लिए अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की बात की थी।

 

 

जर्मनी के एक इंजीनियर वर्नर वॉन ब्रोन (Werner von Braun) जो रॉकेट इंजीनियरी के विशेषज्ञ थे, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी से अमेरिका चले गए और वहा उन्होंने अंतरिक्ष अभियान दल का नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व में अमेरिका अपना पहला उपग्रह एक्सप्लोरर- 1 अंतरिक्ष में पहंचाने में सफल हुआ।
वर्नर वॉन ब्रोन के नेतृत्व में ही सेटर्न नामक उस रॉकेट का निर्माण भी हुआ, जो सबसे पहले मानव को चांद की धरती पर ले गया।

 

 

वर्नर ब्रोन को बचपन से ही अंतरिक्ष के अजीबो-गरीब नजारे देखने का शौक था। बचपन मे उनकी मां ने उन्हें एक छोटी-सी दूरबीन लेकर दी थी। तभी से उनमें अंतरिक्ष के प्रति विशेष रूचि जागी और वे देखते-देखते संसार के प्रसिद्ध वैज्ञानिक बने गए।

 

 

4 अक्टूबर, सन्‌ 1957 को उस समय सारे संसार मैं तहलका मच गया, जब रूस ने अपना प्रथम उपग्रह स्पुतनिक अंतरिक्ष में छोड़ने में सफलता पाई। मानव निर्मित यह छोटा-सा चंद्रमा डेढ़ घंटे में पृथ्वी का एक चक्कर लगा रहा था। सोवियत संघ
ने इस प्रथम उपग्रह को पृथ्वी से सैंकड़ों मील दूर अंतरिक्ष में स्थापित क्रिया था। इसके बाद ही 31 जनवरी, सन्‌ 1958 को अमेरिका ने एक्सप्लोरर-1 उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा।

 

 

इसके बाद रूस और अमेरिका ने एक के बाद एक अनेक उपग्रह (Satellite) अंतरिक्ष में भेजे और अंतरिक्ष के बारे में नई-नई जानकारियां हासिल कीं। ये जानकारियां चंद्र यात्रा के लिए बहुत आवश्यक और महत्वपूर्ण थीं। स्पुतनिक-1 के छोडे जाने के ठीक एक माह बाद रूस ने स्पुतनिक-2 अंतरिक्ष में छोड़ा, जिसमें लायका नामक एक कूतिया को अंतरिक्ष में भेजा गया। अंतरिक्ष में जाने वाला यह पृथ्वी का पहला प्राणी था। लायका लगभग एक सप्ताह तक अंतरिक्ष में रही। उसने सिद्ध कर दिखाया कि अंतरिक्ष की विपरीत परिस्थितियों मे विशेष व्यवस्था के जरिये प्राणी जीवित रह सकता है।

 

 

बहुत से उपग्रहों ने अंतरिक्ष से पृथ्वी के भिन्न-भिन्न स्थानों के चित्र और सूचनाए भेजकर पृथ्वी के ऊपरी वायूमंडल की जानकारियां दी। पृथ्वी के विभिन्‍न स्थानों, देशों आदि के नकशों में संशोधन अंतरिक्ष से भेजे गए चित्रों के अनुसार किए गए। रेडियो, टेलीविजन तथा टेलीफोनों की संचार व्यवस्था मे क्रांतिकारी सुधार हुए और संचार व्यवस्था को एक नया आयाम मिला। इस प्रकार मुख्य रूप से चार प्रकार के उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ा गया-प्रेक्षण उपग्रह, मौसम उपग्रह, संचार उपग्रह तथा मानव निर्मित मार्ग निर्देशक्क उपग्रह, जो अन्य ग्रहों, तारों की जानकारी देते हैं।

 

 

प्रेक्षण उपग्रहों से पृथ्वी के असंख्य ऐसे स्थानों की ठीक-ठीक जानकारी और चित्र प्राप्त हो सके, जो अब तक अंधेरे में थे। पृथ्वी के विभिन्‍न क्षेत्रों के नये मानचित्र प्राप्त किए जा सके तथा अनेक क्षेत्रों के मानचित्रों में सुधार किए गए। पृथ्वी के खनिज क्षेत्रो, बर्फीली क्षेत्रो, वनों, पर्वतों, ज्वालामुखियों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकी। समुद्री क्षेत्रों का अध्ययन किया गया।

 

 

मौसम उपग्रहों ने मौसम संबंधी जानकारी जैसे तूफान, भूकम्प, हवा, वर्षा आदि की पूर्व जानकारी देकर समय पर सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हर मिनट में बदलते मौसम की जानकारी प्राप्त करना इन उपग्रहों से सरल हो गया। इस प्रकार पृथ्वी के विभिन्‍न क्षेत्रों में मौसम व्यवस्था को नियंत्रित किया जा
सका।

 

 

संचार उपग्रहों ने संचार के नये मानदंड स्थापित किए। जहा संचार व्यवस्था में वर्षों लगते थे, इनकी मदद से चुटकियों में काम हो गया। एक उपग्रह से असंख्य टेलीफोन लाइनों का सचालन, टेलीविजन और रेडियो प्रसारण संभव हो गया। पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने के टेलीविजन कार्यक्रम देखना संभव हो गया। अन्य ग्रहों की खोज के लिए अन्य विशेष प्रकार के उपग्रह यान छोड़े गए हैं, जो अन्य ग्रहों के बारे में नई-नई जानकारियां दे रहे हैं।

 

 

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