अंकगणित किसे कहते है — अंकगणित की खोज कैसे हुई

जो अंकगणित प्रणाली आज संसार में प्रचलित है, उसे विकसित और पूर्ण होने मे शताब्दियां लगी है। यद्यपि इसका आविष्कार और प्रयोग, भारत की कुछ गणित पुस्तकों में, ईसा की प्रथम ‘शताब्दी में ही मिलता है, किन्तु भारत में भी जनसाधारण के बीच इसका प्रचलन ईसा की छठी शताब्दी तक नहीं हुआ था। भारत से यह प्रणाली अरब देशों में गयी, इसीलिए अरबी में अंकों को हिदसा कहते हैं और अरबों द्वारा बारहवीं शताब्दी में इसका प्रचलन यूरोप में हुआ। अत: वहां पर इसे ‘अरब अंक’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा।

 

 

अंक लेखन की आधुनिक प्रणाली को जिसमें 9 अंकों और शून्य चिह्न का प्रयोग होता है, विज्ञान के सभी जानकारों ने इसे मानव-बुद्धि की एक महत्वपूर्ण अनोखी उपलब्धि माना है। वस्तृतः इस अंक प्रणाली ने ही, हमारे पूर्वजों के लिए ऐसा पथ निर्मित कर दिया था, जिस पर गणित संबंधी खोजों की प्रगति बड़ी तीव्रता
से हुई और इसी के परिणामस्वरूप 15वी शताब्दी तक अंक गणित और बीजगणित के क्षेत्र में भारत समस्त संसार मे अग्रगण्य रहा।

 

 

अंकगणित की खोज कैसे हुई

 

आधुनिक अंक प्रणाली के आविष्कार से पूर्व समस्त राष्ट्र इकाइयों, दहाईयों इत्यादि के लिए विभिन्‍न चिह्नो का प्रयोग करते थे। इकाई प्रदर्शित करने लिए 9चिह्न, दहाई के लिए पृथक 9 चिह्न, सैकड़े के लिए अन्य 9 चिह्न तथा हजार के लिए भिन्‍न प्रकार के 9 चिह्न थे। इस प्रकार हजार या इससे बडी कोई संख्या लिखने के लिए बहुत से अंक चिन्हों का प्रयोग करना पड़ता था। इस प्रकार के अंकन को रोमन प्रणाली कहते हैं। अब भी इनका प्रयोग बहुत-सी घड़ियों में पाया जाता है।

 

 

अंकगणित
प्राचीन अंकगणित प्राणली

 

स्थानीय मान वाले चिन्हों की विशेषता यह है कि बड़ी से बडी संख्या भी न्यूनतम स्थानों में लिखी जा सकती है। इस प्रणाली में अभाव-सूचक शून्य चिह्न का बहुत बड़ा महत्व है। इस शून्य का प्रयोग, इस प्रणाली में, एक विशेष अंक के रूप में होता है, सर्वथा अभाव के स्थान मे नही। इस प्रणाली में शून्य को एक मूर्त महत्व शक्ति और पद प्राप्त है।

 

 

हिन्दू दर्शन में इस सृष्टि की उत्पत्ति शून्य से मानी गयी है, जिसे ‘शून्याकाश’ के नाम से संबोधित किया गया है। जिस प्रकार हिन्दू मस्तिष्क द्वारा ऐसा महत्वपूर्ण दार्शनिक सिद्धांत प्रस्तुत किया गया, उसी प्रकार हिन्दू मस्तिप्क ने ही गणित में भी शून्य की धारणा की पुष्टि की और उसे न केवल एक ठोस मूल्य प्रदान किया, वरन् उसे एक असीम शक्ति भी दी।

 

 

इस प्रणाली के जन्म का आधार, बोलचाल में संख्याओं का प्रयोग है। जैसे जब हम 456 कहते हैं तो उसका तात्पर्य होता है 4 सौ, 5 दस और 6 एक। सख्या में हम देखते हैं कि, वे ही अंक स्थान भेद से विभिन्‍न मान के हो जाते हैं। स्थानीय मान की यह भावना वस्तुतः हिन्दू दर्शन से ली गई है,जिसका यह एक सिद्धांत ही है कि किसी भी वस्तु का मूल्य उसके आसपास की वस्त॒ओं के साथ, उसके संबध और विश्व में उसकी अपेक्षाकृत स्थिति द्वारा निश्चित किया जाता हैं। कछ विद्वान इसका श्रेय भारत को देते थे, तो कछ यूनानियों, अरबों या तिब्बतियों को, पर अब सभी ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस प्रणाली का जन्म भारत मे ही हुआ।

 

 

किसी खोज के संबंध मे, किसी व्यक्ति अथवा किसी राष्ट्र का स्वत्व स्थापित करने के लिए दो बातो पर विचार करना पड़ता है। प्रथम बात यह है कि क्या उस खोज की उन्हें आवश्यकता थी और दूसरी यह कि वह खोज सर्वप्रथम प्रयोग मे कहा लाई गई। हिन्दू, बौद्ध व जैन धर्म तथा दर्शन ग्रंथों से यह सिद्ध हो जाता है कि भारतीयों को वस्तुत: इसकी आवश्यकता थी। जबकि संसार के दूसरे राष्ट्र दस हजार से बडी कोई संख्या लिख सकने मे असमर्थ थे।

 

 

शून्य का प्राचीनतम उल्लेख ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व के ‘रचना-पिगल’ के छंद-सूत’ मे हुआ है। शून्य चिह्न का प्रयोग संस्कृत नाटक ‘स्वप्नवासवदत्तम’ में भी हुआ हैं।अंको के स्थानीय मान का भी उल्लेख हिन्दू ग्रंथो में किया गया है। ‘पातजलि
योगसूत्र’ के ‘व्यास-भाष्य’ मे उक्त मिलती है कि “वही सख्या इकाई के स्थान पर एक, दहाई के स्थान पर दस और सैंकडें के स्थान पर सौ होते हैं। ऐसा ही कथन शंकराचार्य के ‘शारीरिक भाष्य’ मे भी पाया जाता है।

 

 

हिन्दुओं के प्राचीनतम गणित तथा ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में भी इस प्रकार के स्थानीय मान वाले प्रयोग हुए हैं। ईसा की तीसरी शताब्दी में लिखे गए ज्योतिष ग्रंथ ‘बखशाली’, पांचवी शताब्दी में लिखे गए ‘आर्य भट्‌टीय’ तथा छठी शताब्दी में लिखी गई ‘पंचसिद्धांतिका’ में इस प्रणाली के कितने ही प्रयोग मिलते हैं।
अंकगणित के भारत में ही सर्वप्रथम प्रयोग किए जाने का सबसे प्रबल प्रमाण शिलालेख और ताम्रपत्र हैं।

 

 

595 ई., 646 ई., 674 ई., 725 ई., 636 ई. तथा 793 ई. के शिलालेखों में अंकगणित के प्रयोग मिलते हैं। सुमात्रा के पालेम और हिंद-चीन के संवोर नामक स्थानों पर हिन्दी राजा की विजय
के शिलालेख हैं। उन पर भी उनकी तिथि एक संवत्‌ 605 अंक प्रणाली में दी गई है-अर्थात्‌ 688 ई ।

 

 

भारत की इस प्रणाली का उल्लेख पाश्चात्य तथा अरबी लेखकों ने भी किया है। सीरिया के विद्वान सरवेरूस सेबोख्त ने 622 ई. में लिखे अपने ग्रंथ में लिखा है—-
सीरी जाति से सर्वथा भिन्‍न हिन्दुओं के विज्ञान एवं गणित-ज्योतिष के सूक्ष्म
अनुसंधान यूनानियों और बेबीलोनियनों के अनुसंधानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण गई हैं और उनका गणित तो बर्णनातीत है। समस्त गणना केवल 9 चिहनों द्वारा की गई है।
इब्न-वहशीय (855 ई.), जहीज (860 ई.) तथा अब्दुल अल-मसूदी (943 ई.) आदि अरबी के ख्यातिप्राप्त लेखकों ने भी अंक लिपि की हिन्दू उत्पत्ति का समर्थन किया है। में अंक-लिपि के स्थानीय मान का उदाहरण 8वीं-9वी शताब्दी से पूर्व विश्व में
अन्यत्र कही भी नहीं मिलता।

 

 

हमारे यह लेख भी जरूर पढ़े

 

 

 

प्लास्टिक
प्लास्टिक का अर्थ है- सरलता से मोड़ा जा सकने बाला। सबसे पहले प्लास्टिक की खोज अमेरिका के एक वैज्ञानिक जान बैसली Read more
रबड़
रबड़ आधुनिक सभ्यता की बहुत बड़ी आवश्यकता है। यदि हम रबर को एकाएक हटा लें, तो आज की सभ्यता पंगु Read more
उल्कापिंड
हवार्ड वेधशाला (अमेरिका) के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री ह्विपल ने उल्कापिंड की खोज की तथा उन्होंने इसके प्रकुति-गुण, आकार, गति पर अनेक खोजें Read more
निऑन गैस
निऑन गैस के बढ़ते हुए उपयोग ने इसकी महत्ता को बढा दिया है। विज्ञापन हेतु भिन्न रंग के जो चमकदार Read more
ध्वनि तरंगें
हमारे आसपास हवा न हो, तो हम किसी भी प्रकार की आवाज नहीं सुन सकते, चाहे वस्तुओं में कितना ही Read more
धातुओं
वास्तव में वर्तमान सभ्यता की आधाराशिला उस समय रखी गई जब धातु के बने पात्र, हथियार तथा अन्य उपकरणों का Read more
रेडियो तरंगों की खोज
हम प्रतिदिन रेडियो सुनते है लेकिन हमने शायद ही कभी सोचा हो कि रेडियो सैकडों-हजारो मील दूर की आवाज तत्काल Read more
अवरक्त विकिरण
ब्रिटिश खगोलविद सर विलियम हर्शेल ने 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में एक प्रयोग किया, जिसे अवरक्त विकिरण (infra red radiation) की Read more
अंतरिक्ष किरणों की खोज
अंतरिक्ष किरणों की खोज की कहानी दिलचस्प है। सन्‌ 1900 के लगभग सी.टी,आर. विल्सन, एन्स्टर और गीटल नामक वैज्ञानिक गैस Read more
प्रकाश तरंगों
प्रकाश तरंगों की खोज--- प्रकाश की किरणें सुदूर तारों से विशाल आकाश को पार करती हुई हमारी पृथ्वी तक पहुंचती Read more
परमाणु किरणों
परमाणु केन्द्र से निकली किरणों की खोज- कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं कि यदि उन्हें साधारण प्रकाश या अन्य प्रकार Read more
एक्सरे
सन्‌ 1895 के एक सर्द दिन जर्मनी के वैज्ञानिक राण्ट्जन (Roentgen) फैथोड किरण विसर्जन नलिका (Cathode ray discharge tube) के साथ Read more
इलेक्ट्रॉन
इंग्लैंड के वैज्ञानिक जे जे थाम्सन ने सन्‌ 1897 में इलेक्ट्रॉन की खोज की। उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया कि Read more
धूमकेतु
अंतरिक्ष में इधर-उधर भटकते ये रहस्यमय धूमकेतु या पुच्छल तारे मनुष्य और वैज्ञानिकों के लिए हमेशा आशंका, उलझन तथा विस्मय Read more
पेड़ पौधों
इस समय हमारे भारतीय वैज्ञानिक सर जगदीशचंद्र बसु ने यह सिद्ध किया कि पेड़ पौधों में भी जीवन होता हैं, सारे Read more
मस्तिष्क
सन्‌ 1952-53 में अमेरिका के मांट्रियल न्यूरॉलॉजिकल इंस्टीट्यूट में एक 43 वर्षीय महिला के मस्तिष्क का आपरेशन चल रहा था। उसके Read more
एंटीबायोटिक
आधुनिक चिकित्सा के बढ़ते कदमों में एंटीबायोटिक की खोज निस्संदेह एक लंबी छलांग है। सबसे पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलीन थी, जिसकी अलेग्जेंडर Read more
तेल
धरती की लगभग आधा मील से चार मील की गहराई से जो गाढा कीचड़ मिला पदार्थ निकलता है, उसी को Read more
प्लूटो ग्रह
प्लूटो ग्रह की खोज किसने की और कैसे हुई यह जानकारी हम अपने इस अध्याय में जानेंगे। जैसा हमने पिछले Read more
नेपच्यून ग्रह
नेपच्यून ग्रह की खोज कैसे हुई यह हम इस अध्ययन में जानेंगे पिछले अध्याय में हम यूरेनस ग्रह के बारे Read more
यूरेनस ग्रह
बुध, शुक्र, बृहस्पति मंगल और शनि ग्रहों की खोज करने वाले कौन थे, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो पाया Read more
बुध ग्रह
बुध ग्रह के बारे में मनुष्य को अब तक बहुत कम जानकारी है। मेरीनर-10 ही बुध ग्रह की ओर जाने Read more
बृहस्पति ग्रह
बृहस्पति ग्रहों में सबसे बड़ा और अनोखा ग्रह है। यह पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है। अपने लाल बृहदाकार धब्बे Read more
मंगल ग्रह
मंगल ग्रह के बारे में विगत चार शताब्दियों से खोज-बीन हो रही है। पिछले चार दशकों में तो अनंत अंतरिक्ष Read more
शुक्र ग्रह
शुक्र ग्रह तथा पृथ्वी सौर-मंडल में जुड़वां भाई कहे जाते हैं, क्योंकि इन दोनों का आकार तथा घनत्व करीब-करीब एक-सा Read more
चांद की खोज
जुलाई, सन्‌ 1969 को दो अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों नील आर्मस्ट्रांग और एडविन आल्डिन ने अपोलो-11 से निकलकर चांद पर मानव Read more
सौर वायुमंडल
सूर्य के भीतर ज्वालाओं की विकराल तरंगे उठती रहती हैं। सूर्य की किरणों की प्रखरता कभी-कभी विशेष रूप से बढ़ Read more
सूर्य की खोज
दोस्तों आज के अपने इस लेख में हम सूर्य की खोज किसने कि तथा सूर्य के रहस्य को जानेंगे कहने Read more
अंतरिक्ष की खोज
अंतरिक्ष यात्रा के बारे में आज से लगभग 1825 वर्ष पूर्व लिखी गई पुस्तक थी-'सच्चा इतिहास'। इसके रचियता थे यूनान Read more

Add a Comment